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Narendra Modi से मुकाबले के लिए क्या 'फाइटर दीदी' को उतारेगा विपक्ष?

2024 Lok Sabha Elections: जो लोग ममता बनर्जी के सियासी इतिहास से वाकिफ हैं, तो वे ये भी अवश्य जानते होंगे कि अपनी अलग पार्टी बनाने और बंगाल की सत्ता में आने से पहले ही कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने अपनी इमेज एक ऐसी फाइटर लीडर' की बना ली थी, जिसने अपने दम पर वामपंथियों से लोहा लेकर उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया. ममता की राजनीति बड़े दलों से थोड़ी अलग इसलिए है कि उन्हें सड़कों पर उतरकर लड़ना और उसके जरिये आम जनता को सीधे अपने साथ जोड़ने की कला बखूबी आती है.

लोकसभा चुनाव होने में अभी ढाई साल का वक़्त बचा है लेकिन बंगाल से बाहर निकलकर वे अन्य दलों के नेताओं से जैसी मुलाकातें कर रही हैं, उसके सियासी अर्थ यही निकाले जाएंगे कि वे खुद को 2024 के लोकसभा चुनाव में पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट कर रही हैं, जो काफी हद तक सही भी है. चूंकि बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत वैकल्पिक ताकत बनने में कांग्रेस नाकाम होती दिख रही है. लिहाज़ा, ममता की रणनीति यही है कि अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर वे इस मकसद को पूरा कर सकती हैं. जाहिर है कि ममता यह भी जानती हैं कि सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस उनकी उम्मीदवारी पर न तो इतनी आसानी से मुहर लगाएगी और न ही  उनके नेतृत्व में अगला लोकसभा चुनाव लड़ने को ही राजी होगी. लेकिन राजनीति नंबरों का खेल है जिसमें जो जीता वही सिकंदर.

दरअसल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल समेत आठ राज्यों की तकरीबन दो सौ लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता है. इन सीटों पर कांग्रेस नंबर गेम में बीजेपी के मुकाबले काफी पीछे है और उसके कुल 53 सांसद हैं. यदि ममता की टीएमसी समेत यूपीए में शामिल तमाम अन्य क्षेत्रीय दलों की सीटों की तुलना की जाए, जिसमें सपा जैसे कुछ गैर यूपीए दलों को भी जोड़ा जाए, तो उसका पलड़ा कांग्रेस से बहुत भारी है.

ऐसे में कांग्रेस को छोड़ यूपीए के बाकी सभी दलों ने अगर ममता को पीएम पद का उम्मीदवार बनाना तय कर लिया, तब कांग्रेस के पास भी उसे मानने के सिवा कोई और चारा नहीं बचेगा. ममता उसी रणनीति को ध्यान में रखकर ही अपनी सियासी जमीन मज़बूत करने में जुटी हैं, जिसे लेकर आज उन्होंने मुम्बई में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और शिव सेना सुप्रीमो व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से अलग-अलग मुलाकात की.

ममता की इन मुलाकातों से कांग्रेस की टेंशन बढ़ना स्वाभाविक है लेकिन उसे परेशान होने की बजाय अपने गिरेबां में झांकते हुए ये देखना होगा कि उन 200 लोकसभा सीटों पर पार्टी को कैसे मजबूत किया जाए जहां बीजेपी से उसका सीधा मुकाबला है. क्योंकि कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का मकसद तो एक ही है-2024 में बीजेपी को सत्ता से हटाना.

लिहाज़ा एक मजबूत व वैकल्पिक ताकत बनने की पहल अगर ममता कर रही हैं और चुनावों से पहले सामूहिक नेतृत्व की कमान भी उनके हाथ में आती है, तो इससे कांग्रेस को आखिर परेशान क्यों होना चाहिए. ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा कि विपक्ष को बहुमत मिलता भी है या नहीं. अगर मिल भी गया तो सबसे ज्यादा सीटें लेने वाली पार्टी ही पीएम पद पर अपना दावा ठोकेगी.

ताकतवर विपक्ष की भूमिका निभाने में अपने ढुलमुल रवैये को लेकर ही आज ममता ने इशारों में ही कांग्रेस को नसीहत दी है. उन्होंने नाम लिए बगैर राहुल गांधी पर ये कहकर निशाना साधा कि "अगर कोई कुछ करते नहीं हैं, विदेश में रहते हैं, तो ऐसा कैसे चलेगा." उन्होंने कहा कि इसलिए हमें कई दूसरे राज्यों में जाना पड़ा. ममता के इस बयान पर शरद पवार ने कहा कि "सीधी बात है. आज पश्चिम बंगाल में ममता की जो जीत हुई है, वो फील्ड में रहकर ही हुई है. लाखों कार्यकर्ताओं की मेहनत से ही जीत हुई है. हम उनके बयान का स्वागत करते हैं." पवार के इस बयान के मायने साफ हैं कि विपक्ष अब ममता को ही अपना कर आने की रणनीति बनाने के मूड में है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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