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कर्नाटक में क्यों खत्म किया गया मुस्लिम आरक्षण? जानें बढ़ेगा ध्रुवीकरण या खिसकेगी BJP सरकार?

कर्नाटक की बोम्मई सरकार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य में अल्पसंख्यकों को मिलने वाले 4 फीसदी आरक्षण को खत्म कर उसे EWS (Economic Weaker Section) कोटे में लाने का फैसला किया है. पहले से ही राज्य में टीपू सुलतान और सावरकर मुद्दे पर काफी विवाद होता रहा है. ऐसे में जबकि एक-दो दिन के अंदर चुनाव की तारीखों का ऐलान होने वाला है, मुझे लगता है कि कर्नाटक सरकार की तरफ से लिया गया ये फैसला पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है. बीजेपी दक्षिण भारत में लगातार अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है. तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, पुडुच्चेरी और बाकी जगहों पर बीजेपी अपनी पैठ मजबूत करने के लिए ये सियासी दांव खेला है.

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद कहा है कि कांग्रेस एक राजनीतिक मजबूरी के तहत जान बूझकर 4 फीसदी मुस्लिम आरक्षण लेकर राज्य में आई थी, जो असंवैधानिक कदम था. दूसरी बात ये है कि आखिर कर्नाटक  की बोम्मई सरकार की तरफ से अचानक ये फैसला क्यों किया गया है? दरअसल, एक-दो दिन में चुनाव आयोग कर्नाटक चुनाव को लेकर तारीखों का ऐलान करेगा. ऐसे में एक तरफ जहां कांग्रेस ने चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए 2 हजार देंगे, 3 हजार देंगे, ओल्ड पेंशन स्कीम फिर बहाल करेंगे, जैसे रिझाने वाले वादे किए और जो संभव नहीं हो कांग्रेस की तरफ से ऐलान किया जा रहा था. 

बीजेपी का 'चुनावी दांव'

तमिलनाडु-कर्नाटक में रिटायर्ड आर्मी मेन की संख्या काफी ज्यादा है. उधर जाकर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी की तरफ से बार-बार ये कहा जा रहा है कि ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर आएंगे. ओल्ड पेंशन स्कीम कांग्रेस की सरकार ही लेकर आई थी. इसलिए, कांग्रेस की तरफ से ये कहा जा रहा है कि जैसे 2003 के पहले पेंशन मिल रही थी, ठीक वही बहाल करेंगे. ऐसे मुफ्त चुनाव घोषणाएं कांग्रेस की तरफ से काफी तेजी के साथ की जा रही थी. इसी को रोकने के लिए बीजेपी की तरफ से ये राजनीति से प्रेरित एक बड़ा कदम है.

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण बड़ा मुद्दा रहा है. ऐसे में बीजेपी की तरफ से ये सिग्नल भेजा गया है कि अगर इस बार हम आ जाएंगो तो 2 फीसदी वोकलिंगा और 2 फीसदी लिंगायत को ये आरक्षण बांट देंगे.

क्या होगा राजनीतिक असर?

जिस तरह यूपी, बिहार में ठाकुर-ब्राह्मण और भूमिहार का दबदबा रहा है, ठीक उसी तरह से दक्षिण भारत खासकर कर्नाटक में वोकलिंगा और लिंगायत समुदाय का काफी दबदबा है. कुल वोट का 13 फीसदी लिंगायत का वोट है जबकि करीब 10 फीसदी वोट वोकलिंगा का है. इन दोनों समुदाय की आरक्षण की मांग काफी पुरानी है. ये लोग करीब 20 फीसदी आरक्षण की मांग करते आए हैं. ऐसे में बोम्मई सरकार के इस फैसले के बावजूद वोकलिंगा और लिंगायत समुदाय के लोग असंतुष्ट हैं. उनका ये कहना है कि हमने 20 फीसदी आरक्षण की मांग की थी और आपने 2 फीसदी आरक्षण दिया. इसके बाद उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया. हुबली में पत्थरबाजी भी शुरू कर दी. इसलिए उनके गुस्से को ठंडा करने के लिए ये आरक्षण दिया गया है. जरूर इससे ध्रुवीकरण बढ़ेगा.

इसमें बीजेपी फायदा उठाने की कोशिश करेंगी. केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का खेल है. आपको याद होगा का सलमान खुर्शीद ने 2013 में यूपी के अंदर मुसलमानों के लिए चार फीसदी आरक्षण लेकर आए थे. बीजेपी ने उसका भी विरोध किया था. आज बीजेपी ने 2-2 फीसदी आरक्षण को बांटकर हिन्दुत्व को अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं. ये गृह मंत्री का खुला संदेश है.

टीपू सुलतान विवाद की काट के लिए भी बीजेपी ने कर्नाटक के अंदर ये राजनीतिक पत्ता खेला है. मुझे लगता है कि ये चुनावी मुद्दा आने वाले दिनों में और ज्यादा गर्म होगा. आपको याद होगा, हिजाब मुद्दा में जो विवाद हुआ था उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. लेकिन, आरक्षण को खत्म करने का मतलब ये है कि हिन्दुत्व को बीजेपी ने आगे बढ़ा दिया है. जैसे गुजरात है वैसे ही दक्षिण भारत में कर्नाटक को बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए एक छोटा गुजरात माना जाता है.  

बीजेपी का बड़ा सियासी कदम

भारतीय जनता पार्टी का ये एक तरह से सियासी दांव है. ये एक तरह से पत्ता खेलना है. आप सिक्का मारो, जमीन पर फूले गिरेगा नहीं तो सिक्का तो गिरेगा ही. ये राजनीति का खेल है, कांग्रेस अगर खेल सकती है तो फिर बीजेपी नहीं खेल सकती है क्या? इसलिए मुझे लगता है कि अमित शाह का ये जान बूझकर बहुत सावधानी से लिया गया फैसला है. ये एक खतरनाक खेल है, लेकिन ये खेल कर दिया गया है, चुनाव से ऐन पहले. हिन्दुओं को आगे बढ़ने की संभावना से बीजेपी को राज्य में आगे बढ़ने की उम्मीद है. इसलिए कांग्रेस टक्कर से बीजेपी हट गई है. कांग्रेस की जो स्थिति थी, बीजेपी के इस दांव से वो कमजोर पड़ गई है.

मुझे लगता है कि जिस तरह से तमिलनाडु में नरसिम्हा राव की सरकार के वक्त जयललिता के आक्रोश में आकर तत्कालीन सरकार ने संवैधानिक संशोधन किया था, ठीक उसी तरह कर्नाटक में भी 2024 चुनाव होने के बाद बीजेपी ऐसा एक दो दिन में ऐलान करने वाली है कि कर्नाटक में आरक्षण को लेकर केन्द्र सरकार फैसला करेगी.  

कांग्रेस को उल्टा पड़ सकता है एलान

इधर, कांग्रेस ने ये ऐलान किया है कि अगर वे कर्नाटक में सत्ता में आती है तो ओबीसी मुसलमानों को पहले की तरफ चार फीसदी आरक्षण फिर से बहाल किया जाएगा. लेकिन कांग्रेस को ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है क्योंकि वोकलिंगा और लिंगायत समुदाय के वोटर कांग्रेस के इस ऐलान से छिटक सकते हैं. यही बीजेपी का असल खेल है. मल्लिकार्जुन खड़गे जो हाल में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, उन्हें भी मुसलमानों की तरफ से चार फीसदी आरक्षण लेकर वोकलिंगा और लिंगायत समुदाय को दिया जाना, दुविधा में डाल दिया है. बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र में भी ये रहा है. पांच साल पहले बीजेपी ने तो ये चुनावी वायदे किए थे.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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