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आखिर क्यों होता है सबसे बड़े अस्पताल का भी इतना बुरा हाल?

सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज मिलना तो दूर की बात है, उनकी मोर्चरी यानी मुर्दाघर का कितना बुरा हाल है, इसका डराने वाला सच सामने आया है. झारखंड की राजधानी रांची में प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल है राजेन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (RIMS). यहां शवों को जिस हाल में रखा जाता है, उसने सरकार के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है. लापरवाही और बदइंतज़ामी का आलम ये है कि परिजनों को सड़ी-गली हालत में शव सौंपे जा रहे हैं. 

पिछले दिनों रांची में एक मशहूर अमेरिकी फोटोग्राफर मार्कस लेदरडेल की मौत हो गई थी. उनके शव को रिम्स की मोर्चरी में रखा गया था, क्योंकि वह यहां अकेले रह रहे थे और उनके परिजनों को अमेरिका से आना था. करीब दस दिन बाद जब उनके परिजनों को शव सौंपा गया तो वह नजारा दिल दहलाने वाला था. मार्कस लेदरडेल के शव का अधिकांश हिस्सा सड़-गल चुका था.

तभी ये खुलासा हुआ कि मोर्चरी का एयर कंडीशनिंग सिस्टम खराब पड़ा हुआ है और अस्पताल प्रबंधन को इसकी जरा भी परवाह नहीं कि शवों के साथ क्या सलूक हो रहा है. मोर्चरी की देखरेख का जिम्मा किसी प्राइवेट कंपनी को सौंपा गया है. उसकी लापरवाही तो है ही, लेकिन सवाल ये है कि अस्पताल प्रशासन ने कभी ये देखने की जहमत क्यों नहीं उठाई कि वो अपना काम ठीक से कर रही है या नहीं. लिहाजा, उस कंपनी से ज्यादा बड़ी लापरवाही तो अस्पताल प्रशासन की बनती है और कौन जानता है कि अमेरिकी नागरिक से पहले और कितने शवों का भी ऐसा ही हाल हुआ होगा.

दरअसल, रिम्स की मोर्चरी को साल 2019 में चालू किया गया था, लेकिन एक अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टर ने शुक्रवार को जब इसकी पड़ताल की तो पता चला कि पिछले छह महीने से यहां बने 50-कम्पार्टमेंट में शव रखने की सुविधा ही बंद है. यहां रखे जाने वाले लावारिस शव अक्सर हमेशा सड़ जाते हैं. इसमें सबसे ज्यादा कर्मचारियों की लापरवाही ही सामने आती है. प्रोटोकॉल के अनुसार ठीक से उनका ट्रीटमेंट नहीं किया जाता है.

इस पड़ताल में ये भी पता चला कि मुर्दाघर को ठंडा रखने के लिए लगे कूलिंग सिस्टम के नौ में से पांच चिलर अभी भी खराब हैं. ज़ाहिर है कि ऐसी हालत में शवों की तो दुर्दशा ही होगी. अस्पताल में नियुक्त आउटसोर्सिंग कर्मचारी भी एयर-कंडीशनिंग खराब होने और सड़ी हुई लाशों का हवाला देकर मोर्चरी की सफाई नहीं करते तो ऐसे में गंदगी के आलम की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है.

मॉर्चरी के एक कर्मचारी ने भी माना है कि शव सड़ रहे हैं, क्योंकि एयर कंडीशनिंग सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है. लावारिस शवों के दाह संस्कार की सुविधा प्रदान करने वाले 'मुक्ति' संस्था के अध्यक्ष प्रवीण लोहिया कहते हैं कि यह समस्या केवल गर्मियों की ही नहीं है, बल्कि उन्हें सर्दियों में भी सड़े-गले शव मिले हैं. मतलब ये कि कुलिंग सिस्टम महीनों से खराब पड़ा है.

पूरे मामले पर रिम्स के डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ शैलेश त्रिपाठी ने ये कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि "हमने इस मुद्दे पर ध्यान दिया है और एजेंसी को इसे तुरंत ठीक करने के लिए कहा गया है." ये तो देश के सिर्फ एक अस्पताल की हक़ीक़त सामने आई है, वह भी इसलिये कि मामला एक अमेरिकी नागरिक के शव का था, जो मीडिया की सुर्खी बन गया. कौन जानता है कि ऐसे न जाने और कितने अस्पतालों का भी यही हाल होगा? लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, उन्हें एक नजर अस्पतालों के मुर्दाघर को देखने की हिम्मत भी जुटानी चाहिये.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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