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कौन दिग्गज खत्म कर पाएगा यूपी में कांग्रेस का सियासी वनवास ?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान किसके हाथ आएगी...कौन मिशन 2022 की उम्मीदों पर खरा उतरेगा इसका फैसला तो होना है...लेकिन जैसा कि पार्टी पहले से संकेत दे चुकी है कि युवाओं को तरजीह देगी..

उत्तर प्रदेश...सियासत के लिहाज से देश का वो सूबा...जो तय करता है देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा...और सियासी बिसात पर बाजी कौन मारेगा...लेकिन इसी उत्तर प्रदेश में देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की जमीन बंजर हो चुकी है...90 के दशक में आखिरी बार बहुमत की फसल काटी थी...उसके बाद से कांग्रेस का न केवल रकबा घटता गया...बल्कि जमीन ही बंजर होती चली गई...कांग्रेस ने इसे लेकर प्रयोग भी खूब किए...लेकिन कामयाबी हाथ नहीं आई...

उसने अपना आखिरी तुरूप का पत्ता भी चल दिया है...गांधी परिवार की प्रियंका के हाथ में यूपी की कमान है...अब मिशन 2022 उनके सामने हैं...और उससे पहले 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव... प्रियंका उत्तर प्रदेश को लेकर खासी सक्रिय हैं...लेकिन कमजोर संगठन कांग्रेस के लिए खुद चुनौती है...लिहाजा तलाश की जा रही है यूपी के नए अध्यक्ष की...कौन बनेगा इसे लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है...पार्टी ने बड़े फेरबदल के संकेत दिए हैं...अब वो युवाओं पर भरोसा करना चाहती है...सूत्रों की मानें तो नई कांग्रेस कार्यकारिणी न केवल छोटी होगी...बल्कि युवाओं से भरी होगी...प्रियंका को भी पूरे उत्तर प्रदेश का जिम्मा दिया जा सकता है...इससे पहले उन्हें केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई थी...दावा किया जा रहा है कि नई टीम में युवा और ऊर्जावान चेहरों को जगह दी जाएगी...चुनाव में शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस ने अपनी जिला इकाई भंग कर दी थी...पार्टी पिछले तीन महीनों से संगठन के लिए काम कर रही है....हालांकि संगठन की अगुवाई कौन करेगा...इसका फैसला होना बाकी है...कई अहम सवाल कांग्रेस की इस कवायद से उठ रहे हैं...उन पर चर्चा करें..उससे पहले आपको बता देते हैं...कौन-कौन से नाम चर्चा में हैं...

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान किसके हाथ आएगी...कौन मिशन 2022 की उम्मीदों पर खरा उतरेगा इसका फैसला तो होना है...लेकिन जैसा कि पार्टी पहले से संकेत दे चुकी है कि युवाओं को तरजीह देगी...ऐसे में कई नाम जो चर्चा में हैं...उनका जिक्र करना जरूरी है...जिन तीन नामों की बात की जा रही है...उसमें पहला नाम है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का...प्रमोद तिवारी प्रतापगढ़ से ताल्लुक रखते हैं और 9 बार विधायक रह चुके हैं...इसके अलावा राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं...दूसरा नाम इसमें अखिलेश प्रताप सिंह का है....जो पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं में से एक हैं...2012 में देवरिया की रूद्रपुर विधानसभा से विधायक भी रह चुके हैं...इसके अलावा तीसरा नाम जो चर्चा में चल रहा है वो विधायक अजय कुमार लल्लू का है...जो फिलहाल कुशीनगर से विधायक हैं...और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी भी....अजय कुमार फिलहाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका कांग्रेस की तरफ से निभा रहे हैं...

कांग्रेस इन्हीं तीन नामों से किसी को चुनेगी या किसी और को अपनी पसंद बनाएगी...ये साफ होना बाकी है....लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर एक बार फिर दांव खेलने की तैयारी में है...और इसकी वजह है तीनों नेताओं का पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखना...प्रमोद तिवारी जहां पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं...तो वहीं ब्राह्मण चेहरा भी है...जो कांग्रेस परंपरागत वोट बैंक रहा है...दूसरी बात प्रमोद तिवारी 9 बार विधायक रह चुके हैं...यानी सदन से लेकर सड़क तक उनके पास अच्छा खासा तजुर्बा है...तिवारी पर दांव खेल कर कांग्रेस जहां ब्राह्मणों को अपने पाले में कर सकती है...तो वहीं उनके तजुर्बे के जरिए संगठन के ढीले पेंच को कस सकेगी...दूसरी तरफ अखिलेश प्रताप सिंह हैं...जो पार्टी के प्रवक्ता हैं...और राजपूत चेहरा भी...लंबे अरसे से पार्टी का मीडिया के जरिए पक्ष रखते आए हैं...हालांकि एक बार ही यूपी के सदन तक पहुंचे हैं...लेकिन अपनी सधी हुई शैली की वजह से कांग्रेस में अच्छी पैठ रखते हैं...वहीं अजय कुमार लल्लू दो बार से विधायक हैं...तमकुहीराज से अपनी जीत दर्ज कराते आए हैं...अजय कुमार ने मुखर वक्ता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है...साथ ही अपनी आक्रामक शैली की वजह से यूपी की सियासत में चर्चा बटोरते रहे हैं...

अध्यक्ष जो भी बने...लेकिन ये सच है कि उसके लिए चुनौतियों का अंबार है...क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन कागजों में तो दिखता है...लेकिन हकीकत की ज़मीन पर नहीं...कार्यकर्ता और नेता दोनों में उत्साह नहीं दिखाई पड़ता...यही वजह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस अपना खोया रसूख यहां नहीं पा सकी...यहां तक कि गठबंधन और प्रियंका जैसे फैक्टर भी उसकी मदद कर पाने में नाकाम रहे...अब समझिए...2017 से लेकर 2019 के चुनावों में किस तरह की मुश्किलें कांग्रेस ने झेली है....

जाहिर है जब नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं तो नतीजे मनमाफिक हो भी नहीं सकते...कांग्रेस का खराब प्रदर्शन कई सालों से जारी है...2012 में उसके नतीजे थोड़ा बेहतर हुए थे...लेकिन 2017 में फिर कांग्रेस रसातल में पहुंच गई...2017 में जहां कांग्रेस विधानसभा चुनावों में 7 सीट जीत पाई...तो वोट 6.25 फीसदी ही रहा...जबकि 2012 में कांग्रेस का प्रदर्शन पहले के मुकाबले ठीक हुआ...तो उसे 28 सीटें मिल गई...और वोट फीसदी भी बढ़ कर 11.65 पहुंच गया...इससे पहले के दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 2007 में जहां 22 सीट मिली और वोट 8.61 फीसदी मिला...तो 2002 में 25 सीट और वोट शेयर 8.96 फीसदी रहा....

मामले तो कानूनी हैं लेकिन सियासत के इस खेल को और बारीकी से समझने के लिए आपको याद दिलाते हैं चुनावों की...यूपी में 12 सीटों पर चुनाव होने वाले हैं... लोकसभा चुनावों से पहले हुआ सपा और बसपा का गठबंधन टूट चुका है...अब दोनों ही पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला कर चुकी हैं...सपा और बसपा अकेले ही मैदान में उतरेंगी और आमने-सामने होंगी...लेकिन जिन 12 सीटों की बात हो रही है...उसमें बीजेपी के खाते में 9 सीटें दर्ज हैं...एक सीट सपा और एक सीट बसपा के खाते हैं...जिन 12 सीटों पर उपचुनाव होना है...उनमें कानपुर की गोविंदनगर..लखनऊ कैंट, टुंडला, बाराबंकी की जैदपुर, मानिकपुर, बहराइच की बलहा, शामली की गंगोह, अलीगढ़ की इगलास, प्रतापगढ़, रामपुर, घोसी और अंबेडकरनगर की जलालपुर सीट हैं... उप चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा में कांग्रेस अभी काफी पीछे है...सपा ने कुछ उम्मीदवारों का एलान कर दिया है..लेकिन बाजी मारी है बहुजन समाजवादी पार्टी ने... बसपा ने एक सीट छोड़कर सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं...

कुल मिलाकर इस चर्चा से एक बात जो निकल कर आती है वो ये कि सियासत में जीत और हार का पैमाना ही पार्टियों के लिए मायने रखता है । फिर जीत मजहबी आधार पर मिले या जाति के आधार पर, दलों को इससे फर्क नहीं पड़ता । सियासत की दिशा तय करते हैं नतीजे और इन नतीजों को अपने पक्ष में करने की गणित सीधी नहीं होती । 2022 की तैयारियों में जुटी पार्टियों के लिए उपचुनाव इसी गणित का सेमिफाइनल माना जाए तो गलत नहीं होगा । इसमें जहां कांग्रेस के लिए प्रियंका फैक्टर की परीक्षा नए सिरे से है, तो भाजपा के लिए उस इतिहास से बचने का एक मौका जिसमें उपचुनावों के नतीजे उसके खिलाफ जाते रहे । जहां तक बात सपा और बसपा की है, तो दोनों लोकसभा चुनावों में साथ होने के बाद आमने-सामने हैं, ऐसे में अपनी-अपनी ताकत का अंदाजा दोनों को लग जाएगा ।

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