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भारत को पाकिस्तान के नए पीएम शहबाज शरीफ से ज्यादा उम्मीदें क्यों नहीं करनी चाहिए?

शहबाज शरीफ पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री बन गए हैं. क्या भारत को इस बात से खुश होना चाहिए या दुखी? इसका जवाब है कि न खुश होना चाहिए और न ही दुखी. वो इसलिए क्योंकि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री कोई भी हो, चलती वहां पर सेना की ही है. नई सरकार बनने पर भी भारत और पाकिस्तान के रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आता, सिर्फ उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. दोनों देशों के रिश्तों में मूल रूप से जो समस्या आजादी के वक्त थी वही आज भी है. चाहे वो इमरान खान हों, नवाज शरीफ हों या फिर अब शहबाज शरीफ, भारत के लिए ये सब सिर्फ अलग-अलग चेहरे हैं, इससे ज्यादा और कुछ नहीं. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि शहबाज शरीफ ने भी गद्दी संभालते ही वही बातें शुरू कर दी हैं जो उनके पहले के वजीर-ए-आजम किया करते थे. इस लेख में दिए गए तर्कों से साबित हो जाएगा कि भारत को शहबाज शरीफ से ज्यादा उम्मीदें क्यों नहीं लगानी चाहिए.

शाहबाज शरीफ ने प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह वही पुराना कश्मीर राग छेड़ दिया है. उन्होंने भारत के साथ बातचीत के मुद्दे पर कहा कि वो भारत के साथ शांति चाहते हैं, लेकिन पहले कश्मीर का मुद्दा सुलझाना होगा. सारी बात यहीं पर अटक जाती है. भारत का रुख बरसों से साफ है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और पाकिस्तान का इससे कोई लेना-देना नहीं है. अगर किसी तरह की बातचीत भी करनी है तो पाकिस्तान को पहले सरकार समर्थित आतंकवाद पर लगाम लगानी होगी. जाहिर है पाकिस्तान ऐसा करेगा नहीं और बात वहीं की वही धरी रह जाएगी.

फर्ज कर लेते हैं कि शहबाज शरीफ निजी तौर पर एक अमनपसंद व्यक्ति हों और दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण संबंध चाहते हों लेकिन वो चाहकर भी ऐसा कर नहीं पाएंगे क्योंकि पाकिस्तान में सेना के डर से हर राजनीतिक दल की मजबूरी है कि वो कश्मीर मुद्दे को हमेशा उठाते रहे. पाकिस्तानी सेना इसी मुद्दे के दम पर अपने गरीब मुल्क के बजट से बरसों से भारी-भरकम पैसे ऐंठती रही है. भारत के साथ तनावपूर्ण संबंध ही उसके अस्तित्व का आधार है. ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पाकिस्तानी सेना किसी भी हद तक जा सकती है, उनके लिए चुने हुए प्रधानमंत्री या सरकारों के कोई मतलब नहीं है, वो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिखाने के लिए सिर्फ एक मुखौटा हैं. इसके अलावा किसी भी पाकिस्तानी नेता का नैतिक कद भी इतना बड़ा नहीं है कि वो इसके खिलाफ आवाज उठा सके. शाहबाज शरीफ का भी नहीं. उन पर खुद भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हुए हैं. दूसरा उनकी पार्टी और बड़े भाई नवाज शरीफ के रिश्ते भी सेना के साथ बेहद कड़वाहट भरे रहे हैं. ऐसे में सेना के साथ अच्छे संबंध बनाकर रखना उनकी मजबूरी है। इसलिए शाहबाज शरीफ के कार्यकाल में कुछ अलग कुछ होगा, ऐसा लगता नहीं है. कम से कम भारत के लिहाज से तो बिल्कुल नहीं लगता.

शहबाज शरीफ जिन लोगों के दम पर प्रधानमंत्री बने हैं उनके खुद के दामन बहुत दागदार हैं. चाहे वो पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के आसिफ अली जरदारी और बिलावल भुट्टो हों या फिर जमीयत उलेमा-ए-फज्ल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान. सभी विवादित लोग हैं. भारत के बारे में भी इनकी सोच जग-जाहिर हैं. शहबाज शरीफ को इनके साथ मिलकर सरकार चलानी है. ऐसे में उनसे कुछ नया करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

भारत के लिए चिंता की बात ये है कि जब वो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने आतंकी हाफिज सईद के आतंकी संगठन जमात उल दावा को करोड़ों रुपए दिए थे. आपको पता है कि हाफिज सईद 2008 के मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड है. जून 2013 में बतौर मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने हाफिज सईद के आतंकी संगठन जमात उल दावा को सरकारी खजाने से करीब 6 करोड़ रुपये दिए थे. यह पैसा जमात-उल-दावा के सबसे बड़े केंद्र मरकज-ए-तैयबा के लिए दिया गया था. इसके अलावा उनकी सरकार ने मरकज़-ए-तैयबा में नॉलेज पार्क की स्थापना और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए भी 35 रुपये आवंटित किए थे. ऐसा माना जाता है कि शहबाज शरीफ और हाफिज सईद के संबंध काफी दोस्ताना हैं. फिलहाल हाफिज सईद पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में टेरर फंडिग के मामले में 36 साल की सजा काट रहा है. हाल ही में उसे दो और मामलों में 31 साल जेल की सजा सुनाई गई है। सवाल है कि क्या शाहबाज शरीफ के पीएम बनने के बाद भी क्या हाफिज सईद जेल में रहेगा या फिर उसके अच्छे दिन आएंगे.

प्रधानमंत्री चुने जाते ही शहबाज के मुंह से भी चीन के लिए शहद टपकने लगा है. उन्‍होंने चीन को पाकिस्‍तान के सुख-दुख का साथी बताया है. उन्होंने ये भी कहा कि कयामत तक पाकिस्‍तान से उसकी दोस्‍ती सलामत रहेगी और कोई इस दोस्‍ती के बीच नहीं आ सकता है. उन्‍होंने चीन-पाकिस्‍तान इकनॉमिक कॉरिडर (CPEC) पर भी तेजी से काम करने की भी बात कही. उनकी ये बातें भारत को परेशान करने के लिए काफी हैं. भारत चीन और CPEC को लेकर अपनी सोच पहले ही साफ कर चुका है. ऐसे में शहबाज यह बातें कहकर भारत के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं. शाहबाज शरीफ राजनीति में नए नहीं है.

उन्हें पता है कि सरकारें कैसे चलती हैं। उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव भी है लेकिन पाकिस्तान में किसी के पास कितना भी राजनीतिक अनुभव क्यों न हो वो अपनी गद्दी को लेकर कोई भविष्वाणी नहीं कर सकता क्योंकि उनके पास सिर्फ गद्दी होती है ताकत नहीं. अपनी पार्टी PMLN का दिमाग माने जाने वाले शहबाज शरीफ के लिए पाकिस्तान की ये कुर्सी आसान नहीं होगी. क्योंकि जिस पाकिस्तान का जिम्मा उन्होंने संभाला है वो पहले से कई मुसीबतों से जूझ रहा है. आर्थिक रूप से उसकी हालत खस्ता है. वो खरबों डॉलर के विदेशी कर्ज के तले दबा है, महंगाई और बेरोजगारी नई ऊंचाइयां छू रही हैं. इसके बीच पाकिस्तान में सदैव बने रहने वाली राजनीतिक अस्थिरता शहबाज की चुनौतियां और बढ़ाएंगी. ऐसे में वो स्वतंत्र रूप से कोई फैसले ले सकेंगे ये संभव नहीं लगता.

अर्थव्यवस्था के साथ ही इमरान ने जाते-जाते शाहबाज के सिर पर विदेश नीति की चुनौती भी लाद दी है. इमरान जिस वक्त इमरान खान आजाद विदेश नीति का राग अलाप रहे थे और अपनी नाकामी का ठीकरा अमेरिका के सिर फोड़ रहे थे, उसी दौरान पाकिस्तानी आर्मी के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने अमेरिका की तारीफ करके बता दिया कि पाकिस्तान की विदेश नीति का बॉस कौन है. इसके अलावा इमरान जिस तरह से जाते जाते भारत की विदेश नीति कि तारीफ कर गए थे उससे सेना और ज्यादा चिढ़ी हुई है. ऐसे में सेना शहबाज को अपने मन से कोई काम करने देगी ऐसा लगता नहीं है.

कुल मिलाकर जैसी स्थिति थी, वैसी ही बनी रहेगी. भारत और पाकिस्तान के बीच जल्द ही संबंध बेहतर होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे. भारत कम से कम अगले छह महीने तक तो वेट एंड वॉच की स्थिति में रहेगा. पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री पर उसकी नजरें गिद्ध की तरह टिकी रहेंगी. इस दौरान उसे पहले की तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम करते रहना चाहिए क्योंकि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान से निपटने का ये तरीका बेहद कारगर साबित हुआ है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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