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रुस-यूक्रेन युद्ध: मोदी-पुतिन की बातचीत का कैसा होगा असर?

रुस ने यूक्रेन पर हमला करके दुनिया को हिलाकर रख दिया है, लेकिन भारत के लिए चिंता की बात ये है कि हमारे 18 हज़ार से ज्यादा नागरिक यूक्रेन में फंसे हैं, जिन्हें सुरक्षित निकालना इस वक्त मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. चूंकि हवाई क्षेत्र बंद है, इसलिये सरकार वैकल्पिक उपाय तलाश रही है. ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि यूक्रेन के तकरीबन सभी शहरों में हो रहे रुसी हमलों के धमाकों की गूंज ने भारतीयों को डरा दिया है, लिहाज़ा वे जल्द सुरक्षित स्वदेश लौटने को बेताब हैं.

इस बीच यूक्रेन ने भारत से दखल देने की गुहार लगाई है, लेकिन भारत के लिए मुश्किल ये है कि कूटनीतिक लिहाज से वह खुलकर किसी का साथ नहीं देना चाहता, इसलिये फिलहाल हमारी भूमिका तटस्थ बनी हुई है. उधर चीन ने यूक्रेन में रूस की सैनिक कार्रवाई को 'हमला' बताने से इनकार कर दिया है. जाहिर है कि चीन का ये रुख आग में घी डालने जैसा है, जो अमेरिका और अन्य नाटो देशों को रूस के खिलाफ और ज्यादा उकसायेगा.

अमेरिका ने फिलहाल रुस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के सिवा कोई और कार्रवाई नहीं की है. इसलिये सवाल उठ रहा है कि अफगानिस्तान की तरह ही अमेरिका क्या यूक्रेन में अपनी सेनाएं भेजेगा? फिलहाल अमेरिका ने इस बारे में कोई एलान नहीं किया है, लेकिन अन्तरराष्ट्रीय सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका इस समय रुस से आर-पार की लड़ाई छेड़ने से बचेगा, क्योंकि वह जानता है कि रुस भी एक महाशक्ति है और उसकी सैन्य ताकत को कम करके नहीं आंका जा सकता.

रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन रूस के खिलाफ कुछ और प्रतिबंध तो लगा सकते हैं, लेकिन यूक्रेन में अपनी सेना भेजने की रिस्क लेने से बचेंगे, क्योंकि इससे अमेरिका को भारी मात्रा में जानमाल का नुकसान होगा. रक्षा मामलों के विशेषज्ञ रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी के अनुसार अमेरिका समेत अन्य सभी पश्चिमी देश रूस की अत्याधुनिक सैन्य ताकत से बखूबी वाकिफ़ हैं, इसलिये वे अपना भारी नुकसान होने की आशंका के डर से ही यूक्रेन में अपनी सेनाएं भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. वे फिलहाल वेट एंड वॉच की नीति अपनाते हुए इसी उम्मीद में हैं कि संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक दबाव के चलते हो सकता है कि पुतिन इस जंग को और आगे न बढ़ाएं, लेकिन रूस के तेवरों से ऐसा नहीं लगता.

न्यूज एजेंसी रायटर्स के मुताबिक यूक्रेन की सेना का कहना है कि रूस ने यूक्रेन पर 30 से अधिक हमलों के साथ नागरिक और सैन्य बुनियादी ढांचे पर हमला किया, जिसमें कलिब्र क्रूज मिसाइल भी शामिल है. उधर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि हम यूक्रेन के साथ है. रूस की कार्रवाई बर्बरतापूर्ण है. ये सिर्फ यूक्रेन पर नहीं, लोकतंत्र पर हमला है. हम यूक्रेन की संप्रभुता की रक्षा करेंगे. उन्होंने कहा कि इस युद्ध में हम वो करेंगे जो करना चाहिए. इधर दिल्ली में यूक्रेन के राजदूत डॉ आइगर पोलिखा ने भारत से हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने पीएम मोदी से पूरे मामले में दखल देने की अपील करते हुए भारत-रूस के मजबूत संबंधों का हवाला दिया है.

डॉ पोलिखा ने एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा है कि पीएम मोदी दुनिया के सबसे ज़्यादा सम्मानीय और ताक़तवर नेताओं में से एक हैं. उन्होंने कहा कि “हम इस मौके पर ये अपेक्षा कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी तरह पुतिन पर प्रभाव डालने की कोशिश करें. इसके साथ ही पीएम मोदी अगर यूक्रेन के समर्थन में कोई बयान देते हैं या कारगर ढंग से मदद करते हैं तो यूक्रेन इसके लिए शुक्रगुज़ार रहेगा.”

हम अपने सभी मित्र देशों की ओर से मदद मांग रहे हैं ताकि इस युद्ध को रोका जा सके. यूक्रेन एक शांतिप्रिय देश है. वे लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन शांति सबसे अच्छा समाधान है. हम अपने सभी साझेदारों से कह रहे हैं कि वे किसी तरह हमारी मदद करें. अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक इसमें कोई शक नहीं कि पुतिन और मोदी के रिश्ते काफी अच्छे हैं और पिछले सात साल में दोनों देशों की मित्रता और भी गहरी हुई है. ऐसे में अगर पीएम मोदी शांति कायम करवाने के लिए पुतिन से बातचीत की पहल करते हैं तो संभव है कि पुतिन भीषण युद्ध को आगे बढ़ाने की बजाय दूसरे विकल्प को मानने पर तैयार हो जाए, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या पीएम मोदी शांतिदूत की भूमिका निभाने के लिए तैयार होंगे? 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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