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महाराष्ट्र: चुनौतियों भरे किले को कैसे फ़तह कर पाएगी शिंदे सरकार?

महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने किला फतह करने का तो संदेश दे दिया है लेकिन आगे ऐसी चुनौतियां हैं, जिससे पार पाना शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस के लिए किसी 'अग्नि परीक्षा' से कम नहीं होगा. शिंदे के साथ शिवसेना से बागी हुए विधायकों की संख्या को देखते हुए ये तो साफ है कि सरकार 4 जुलाई को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करके दिखा देगी. लेकिन सरकार चलाने और महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले अभी इसमें एक कानूनी पेंच भी फंसा हुआ है, जिसका अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट 11 जुलाई को करेगा. 

ये मामला शिव सेना के बागी 16 विधायकों की सदस्यता को अयोग्य ठहराने से जुड़ा है. हालांकि ये सभी विधायक बहुमत परीक्षण के दौरान अपना वोट देंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 11 जुलाई को होना है.

सत्ता खोने के बाद भी कोशिश जारी
सब जानते हैं कि बीते बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में बहुमत साबित करने की बजाय सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक उसी रात शिवसेना के चीफ व्हिप की तरफ से एक और नई याचिका दायर की गई थी कि उन 16 बागी विधायकों को वोट देने से रोका जाए. हालांकि कोर्ट ने उसकी सुनवाई भी 11 जुलाई के लिए ही तय कर दी. उनके मुताबिक कानूनी लिहाज से इस तथ्य को भी देखना होगा कि पहली सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के राज्यपाल इस मामले में पार्टी नहीं थे, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के प्रमुख सचिव को भी नोटिस जारी करके जवाब मांगा है.

तब उद्धव खेमे के चीफ व्हिप की तरफ से कोर्ट में पेश हुए वकील ने मांग की थी कि जिन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता मामले की सुनवाई चल रही है, उनके विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया जाए. उन्होंने ये भी दलील दी थी कि कि उद्धव ठाकरे को शिवसेना के संगठनात्मक चुनाव में अध्यक्ष चुना गया था, इसलिए वे ही असली शिवसेना है. चूंकि शिंदे गुट ने किसी अन्य पार्टी में कोई विलय नहीं किया है, इसलिए उनकी वैधानिकता के बारे चुनाव आयोग ही फैसला कर सकता है. कोर्ट ने जब उस नई अर्जी पर भी 11 जुलाई को ही सुनवाई करने के लिए कहा, तो उनके वकील ने लगभग भड़कते हुए अंदाज़ में कहा था कि-क्या ये डेमोक्रेसी का डांस नहीं चल रहा है? उसके जवाब में कोर्ट ने कहा कि "वे आंख खोलकर बैठे हुए हैं और स्थिति पर उनकी भी पूरी नजर है."

शिंदे सरकार के सामने चुनौती
ये तो हुई कानूनी लड़ाई की बात जिसे लेकर कई कानूनी जानकार मानते हैं कि इसमें शिंदे गुट की जीत होना लगभग तय है. बात करते हैं कि आगे शिंदे सरकार का पाला किस तरह की चुनौतियों से पड़ने वाला है और वे इसका मुकाबला कितनी कामयाबी के साथ कर पाएंगे. दरअसल,सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक हम  एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली सरकार को शिव सेना-बीजेपी गठबंधन की सरकार नहीं कह सकते, बल्कि इसे बीजेपी के समर्थन से शिवसेना के एक बागी गुट की सरकार गठित होना और ये कहना ही ज्यादा सही होगा.

कानून से हरी झंडी मिलने के बाद भी शिंदे सरकार के सामने चुनौतियों का बड़ा पहाड़ दिखाई दे रहा है और सवाल ये है कि वे इसे कितनी आसानी से फतह कर पाएंगे. महाराष्ट्र में फिलहाल दो मुद्दे हावी होकर सामने खड़े हैं. पहला कि ये सरकार मराठाओं को आरक्षण कैसे देगी और दूसरा कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी के लिए वो अपना खजाना किस हद तक खाली करने की हिम्मत जुटा पायेगी. धनगर आरक्षण और राज्य की बदतर होती कानून-व्यस्व्था को पटरी पर लाने के अलावा युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना जैसे कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर जुबानी जमाखर्च से सरकार को लोकप्रियता नहीं मिलने वाली है, बल्कि इसे जमीनी हकीकत में बदलकर दिखाना भी होगा.

चूंकि शिंदे की छवि जमीन पर काम करके उसे अमलीजामा पहनाने वाले नेता की रही है, इसलिए इन सबसे निपटना, उनके लिए किसी कांटों भरे ताज को पहनने से कम नहीं देखा जाना चाहिये. शायद आपको याद होगा कि पिछले ढाई साल से बीजेपी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार के मुखिया को ही सबसे कमजोर बताने के साथ ही ये भी कहती रही है कि ये फैसला न लेने वाली सरकार है. लेकिन अब हालात बदल गए गए हैं और शिंदे-फडणवीस की जोड़ी को अपने फैसलों से उस चमक को दिखाना भी होगा और जनता को ये अहसास भी दिलाना होगा कि दोनों के बीच अहंकार या एक-दूसरे को नीचा दिखाने की लड़ाई भी नहीं है. हालांकि राजनीति में ऐसा कम ही होता है लेकिन देखते हैं कि ये रिश्ता किस मंजिल तक पहुंचता है!

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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