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केजरीवाल सरकार केवल जानती है आरोप लगाना, नाटक-प्रपंच इनके हथियार, काम करने से नहीं सरोकार

इस बीच ही आपसे बात करते हुए खबर आ गई है कि माननीय एलजी ने बिजली सब्सिडी की फाइल पर साइन कर दिए हैं. अब मैं ये पूछना चाहता हूं कि आखिर चार घंटे पहले माननीय एलजी के पास फाइल पड़े होने की बात करने की नोटंकी की क्या जरूरत है? वैसे, आपको मैं ये भी बता दूं कि बिजली मंत्री सुश्री मार्लेना की प्रेस वार्ता के बाद माननीय उपराज्यपाल ने अपना बयान जारी कर दिया था. देखिए, ये सरकार सिवाय नाटक कुछ नहीं जानती. माननीय राज्यपाल ने तो बिजली मंत्री को सलाह दी थी कि उनको एलजी के खिलाफ बिना बात राजनीति और निराधार झूठे आरोप लगाने से बचना चाहिए. केजरीवाल और उनके मंत्रियों को झूठे बयानों से लोगों को गुमराह करना बंद करना चाहिए. आखिर इस संबंध में फैसला 4 अप्रैल तक दिल्ली सरकार ने क्यों लटकाए रखा, जबकि समय सीमा 15 अप्रैल थी?  एलजी को 11 अप्रैल को ही फाइल भेजी गई. 13 अप्रैल को चिट्ठी लिख, आज प्रेस कांफ्रेंस का नाटक करते इन लोगों को शर्म आनी चाहिए.

सब्सिडी में भी झोल है

केजरीवाल सरकार केवल राजनीति करती है, और कुछ नहीं. जब इन्होंने सब्सिडी दी थी, तब भी वह छलावा ही था. इन्होंने जो सरचार्ज रखा है, बिजली कंपनियों के साथ मिलकर, वह जनता के साथ पूरी तरह से धोखा है. आप देखेंगे कि इन लोगों ने इतनी तरह-तरह के सरचार्ज, सिक्स चार्ज रखे हैं कि वह सब्सिडी केवल धोखा है. ऊपर से जैसे ही 200 यूनिट से ऊपर ये बढ़ता है, वैसे ही ये लोग उसको डबल कर देते हैं, तो सारी चीजें इतनी धोखे की हैं, ऊपर से लोगों को भ्रमित कर रहे के केजरीवाल और उनके मंत्री मौज कर रहे हैं.

इनकी और बिजली कंपनियों की मिलीभगत

अभी 28 मार्च को इन्हीं बिजली मंत्री सुश्री मार्लेना ने जो घोषणा की बिजली कंपनियों का ऑडिट कराने की, वह भी मजेदार है. आपको याद होगा कि ये लोग जब पहली बार 2013 में सत्ता में आए थे, तो कहा था कि पिछली जो कांग्रेस की शीला दीक्षित की सरकार थी, उनकी बिजली कंपनियों के साथ साठगांठ थी और वे ऑडिट नहीं कराती थीं, हम लोग वह काम करेंगे. पूरे दस साल बीत गए, 2013 से 2023. ऑडिट नहीं हुआ. अब 28 मार्च को ये फिर जागे हैं और बिजली मंत्री ने कहा कि ऑडिट करवाएंगे.

जैसे ही ये सीएजी से ऑडिट करवाने की बात करने लगीं तो बिजली कंपनियों ने इन पर दबाव बनाया. वे कहने लगे कि या तो ऑडिट करवा लें या सब्सिडी दे दो. क्यों? क्योंकि ऑडिट में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता. जैसे ही कंपनियों ने दबाव बनाया, तो ये नाटक शुरू हो गया. उन्हें एलजी महाशय के फैसले ने हालांकि फेल कर दिया है.  

दिल्ली के हरेक काम में ही घपला है

अभी माननीय हाईकोर्ट ने भी इनको फटकार लगाई थी. चाहे वो विश्वविद्यालयों में नियुक्ति का मामला हो, या स्कूलों का निर्माण हो, इनके मंत्री फाइल लेकर बैठे रहते हैं. कई फाइलें इनके मंत्री के पास, केजरीवाल सरकार के पास पड़ी रहती हैं और ये लोग एलजी साहब को या केंद्र सरकार को दोषी बताते रहते हैं.

उस पर माननीय एलजी ने एक पत्र भी लिखा था और लोगों को जानकारी भी दी थी. जो चीफ सेक्रेटरी हैं दिल्ली के, उन्होंने भी यही कहा था कि वास्तविक जो स्थिति है, वह बताया जाए.

चाहें तो कोई भी आरटीआई लगा ले

देखिए, इनका काम ही है केवल आरोप लगाना. तो मार्लेना ने अगर उपराज्यपाल सक्सेना को आरोपित कर दिया तो क्या नई बात है? जिनको भी लगता है, वो आरटीआई लगा लें. एलजी साहब ने भी तो स्थिति साफ कर ही दी है. मैं फिर कह रहा हूं. जैसे ही इन्होंने 28 मार्च को इन्होंने सीएजी से ऑडिट कराने की घोषणा की, तभी से बिजली कंपनियां इन पर दबाव बनाने लगीं. क्यों? क्योंकि ऑडिट से साफ हो जाएगा कि जो बिजली कंपनियां हैं, प्राइवेट वे किस तरह केजरीवाल सरकार के साथ मिलकर दिल्ली की जनता को लूट रही हैं. कोरोना काल में भी जो कंपनियां, जो ऑफिस बंद रहे, वहां के लोगों ने भी 60-60 हजार, 80 हजार तक बिल दिया है. केजरीवाल सरकार ने उनको राहत नहीं दी. जब ऑडिट होगा तो ये सब सामने आ जाएगा.

घोटालों की सरकार है ये

अभी तक ये लोग डिजिटल, हवाला, से लेकर शराब नीति से घोटाले को लेकर फंसे पड़े हैं. अब ये जिस बिजली को लेकर कूद रहे थे, उसके भी एक घोटाले में फंसेंगे. इसका कारण केवल केजरीवाल सरकार हैं. मैं तो ऑडिट की मांग कराता हूं. ये नहीं कराएंगे ऑडिट. ये सारा खेल केजरीवाल सरकार का है. अभी शराब नीति को लेकर सीबीआई ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी तलब कर ही लिया है. अब देखिएगा, इन लोगों का कोई नया नाटक आ जाएगा. वही राग बार-बार. केंद्र सरकार और एलजी काम नहीं करने देते. अरे, आपकी मंशा होगी तब तो काम करेंगे, मंशा तो है ही नहीं.

[ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है.]

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