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नहीं चाहिए ऐसी जानलेवा धार्मिकता...

रामनवमी पर इंदौर के बेलेश्वर झूलेलाल मंदिर में 36 लोगों की मौत, वहीं पाटन में बागेश्वर धाम के आयोजन में एक बच्ची की दम घुटने से मौत और महाशिवरात्रि पर सिहोर के कुबेरेश्वर धाम के आयोजन में तीन लोगों की मौत हुई थी. लगातार चल रहा मौतों का ये सिलसिला हमें बता रहा है कि पिछले कुछ सालों में देश भर में बढ़ रही धार्मिकता की हमारा समाज कितनी बड़ी कीमत चुका रहा है. शायद ये अब हम सबको अहसास हो रहा है कि अचानक हमारे आस पास के मंदिरों में भीड बढने लगी है. सूने पड़े मंदिरो में सोमवार की सुबह जल चढ़ाने आने वालों की संख्या बढ गयी है. मंगलवार और शनिवार को आपके मोहल्ले के हनुमान मंदिर पर हनुमान चालीसा का कई घंटों का अखंड पाठ होने लगा है. रामनवमी पर निकलने वाले लंबे जुलूस. नवरात्रि पर निकलती चुनरी यात्राएं. महाशिवरात्रि पर सड़कों पर शिव बारात की यात्राएं. 

शहर में हर कुछ दिनों में होने वाली कथाएं और उनके विशाल पंडाल. कथावाचकों की विशाल शोभायात्राएं और साधु तपस्वी से ज्यादा उनका मान सम्मान होना. अलग अलग जगहों पर बने धाम के नाम पर मंदिरों में लगने वाली भारी भीड़ और वहां होने वाली अव्यवस्थाओं को धर्म के नाम पर सहन करना. बता रहा है कि मेरा देश बदल रहा है और कुछ ज्यादा ही धार्मिक हो रहा है.  

इंदौर हादसे की जड़ में भी यही बढती धार्मिकता है. जब शहर के सर्वोदय नगर के बेहद छोटे से शंकरे मंदिर में नवरात्रि की नवमी के रोज दुर्गा प्रतिमा के सामने हवन करने पटेल नगर और स्नेह नगर के लोग उमड़ पड़े, बिना ये जाने की जिस छोटी सी जगह पर बैठकर वो हवन की पूर्णाहुति कर रहे हैं. वहां उनको अपनी जिंदगी की आहुति देनी पड़ जायेगी. दरअसल, पटेल नगर के पार्क के सामने की जमीन पर एक छोटा सा महादेव का मंदिर था, जिसे श्री बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर ट्रस्ट चलाता था. मंदिर से सटी ही बावडी थी जिसका उपयोग पार्क के पौधों को पानी देने के लिये किया जाता था. मगर टस्ट की नजर बावड़ी पर थी और कुछ साल में जैसे ही इस बावड़ी का पानी कम हुआ तो इसे लोहे के गर्डर पर सीमेंट बिछाकर ढ़क कर मंदिर का जीर्णोद्धार का नाम दे दिया गया. 

अब ये मंदिर शिव मंदिर के साथ ही दुर्गा मंदिर भी हो गया. बावड़ी को ढक कर उसके तीन तरफ देवी देवताओं की मूर्तियां रख दी गयीं. बात इतने पर ही नहीं रूकी. कुछ सालों में ही इस मंदिर के पास ही दूसरा बड़ा मंदिर भी ट्रस्ट बनाने लगा अब इसका जब स्थानीय रहवासियों ने विरोध किया तो नगर निगम ने ट्रस्ट को नोटिस भेजे मगर ट्रस्ट से जुडे नेताओं की पैठ बीजेपी में बढ़ते ही ये नोटिस नकारा साबित हो गये. पार्क की जमीन पर पहले छोटा मंदिर फिर उससे लगा पार्षद कार्यालय वहीं एक बड़ा मंदिर और मंदिर के चारों तरफ की फेंसिंग भी लगा कर बडी जमीन कब्जे में कर ली गयी. यह सब चूंकि पार्क की जमीन पर हो रहा था तो विरोध भी हल्का ही हुआ. 

नगर निगम के नोटिस के जवाब में ट्रस्ट ने कहा कि ये मंदिर सौ साल पुराना है पार्क से पहले का और जिसका जीर्णोद्धार जनता कर रही है. टस्ट ने यह भी दावा किया कि मंदिर से लगी बावड़ी का बेहतर रखरखाव कर उसे जनता को स्वच्छ पानी देने की कोशिश की जा रही है. ये बावड़ी जो बंद है उसे खोलने की कार्रवाई जल्द की जायेगी. बताया गया कि इस नवरात्रि पर मंदिर से जुडे प्रबंधन ने बोला कि मंदिर की मूर्तियां आने वाले दिनों में नये बन रहे मंदिर में रख दी जायेंगी इसलिये इस बार हवन पूजन भव्य होना चाहिये.

नवमी के रोज हवन का आयोजन मां दुर्गा की मूर्ति के सामने उसी कंक्रीट की छत पर हुआ जिसके नीचे बावडी दबी थी. पटेल नगर सर्वोदय नगर स्नेह नगर के श्रद्धालुओं की भीड़ हवन में शामिल होने के लिये बढी और लोहे के गर्डर डाल कर बनी पुरानी छत सवा ग्यारह बजे भरभराकर गिर गयी. बस फिर क्या था इस छोटे से मंदिर में अफरा तफरी मच गयी. किसी को ये नहीं मालूम कि कितने लोग गिरे हैं और उन लोगों को निकाले कैसे. बावडी की दीवार से सटी सीढियां भी थीं कुछ ने उससे उतरने की कोशिश की मगर वो भी टूट रहीं थीं. पहले पुलिस फिर नगर निगम के बचाव दल के लोग जब आये तो किसी को ये भी नहीं मालूम था कि इस बावड़ी के कुएं की गहराई कितनी होगी, उसमें पानी है या कीचड़ भरा है. छोटी रस्सियां और सीढ़ियां काम नहीं आयीं. शुरुआत में ऊपर गिरे कुछ लोग निकाले गये तो भोपाल तक सरकार को खबर दी गयी कि सब सुरक्षित हैं, 18 लोग निकाल लिये गये हैं और भी जल्द ही निकाल लिये जायेंगे मगर ये क्या जीवित लोग निकलने के बाद जब लाशें निकलने का सिलसिला शुरू हुआ तो खत्म होने का नाम नहीं लिया. 

साठ फीट गहरी अंधेरी संकरी से बावड़ी में जब नगर निगम के प्रयास नाकाफी दिखे इंदौर के पास महू से सेना को बुलाया गया और शवों की जो गिनती 10 से 15 पर आकर अटक गयी थी वो सुबह होते होते 35 तक जा पहुंची. सुबह करीब सवा ग्यारह बजे उस सुनील सोलंकी का आखिरी शव निकला जिसने बचाव कार्य में हिस्सा लिया था. हादसे का शिकार इस मंदिर के सामने पटेल नगर की गली के छह घरों से जब बारह लाशें उठीं तो पत्थर दिल इंसान भी पसीज कर सुबक उठे. ये सारे लोग गुजराती समाज के थे जिन्होंने मंदिर और अतिक्रमण का विरोध किया था. जिसका जवाब  ट्रस्ट के लोगों ने नगर निगम को 25 अप्रैल के पत्र में लिख कर दिया था कि प्राचीन मंदिर के जीर्णोद्धार का विरोध किया गया तो उन्माद फैल जायेगा.

आज मंदिर के आसपास की गलियों में उन्माद तो नहीं शोक फैला है. कांग्रेस नेता कमलनाथ शनिवार को जब इस इलाके में गये तो महिलाओं ने कहा कि इस मंदिर पर बुलडोजर चलना चाहिए जब जब इस मंदिर की घंटी बजेगी हमारा दुख बढेगा. सरकारी जमीन पर जबरिया कब्जा कर स्थानीय जनता के विरोध की अनदेखी कर ऐसे मंदिर बनाकर हम कैसा समाज बनाना चाहते है. इंदौर की दर्दनाक घटना के बाद इस पर गंभीरता से सोचना होगा.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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