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वीजा सेवाओं की आंशिक बहाली से नहीं लगाएं बहुत कयास, कनाडा करे आतंक पर प्रहार, तभी बनेगी बात

जी-20 के बाद से भारत और कनाडा के संबंधों में, खासकर पिछले एक महीने में काफी तनातनी रही है. दोनों ही तरफ से काफी तल्खी देखने को मिली है. अभी चार-पांच दिनों पहले भारत ने कनाडा के राजनयिकों को वापस भेजा है. उसके पहले भारत ने वीजा सेवाएं बंद कर दी थीं. ये सारे फैसले बहुत सख्त और शक्ति से लैस फैसले हैं, अगर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को हम देखते हैं. दोनों देशों के संबंध बहुत खराब होते जा रहे हैं, यह इसका भी संकेत था. अब जब भारत ने वीजा सेवाएं दुबारा जब बहाल की हैं तो भारत ये चाहता है कि कनाडा से उसके संबंध ठीक हों और फिर से गर्मजोशी आए.

कनाडा की घरेलू राजनीति है जिम्मेदार

वीजा सर्विस को बहाल करने से हालांकि बहुत सारी अटकलें लगानी नहीं चाहिए, क्योंकि वीजा के जो प्रकार होते हैं, वो अगर हम देखें तो 24 प्रकार के होते हैं, उसमें से केवल 4 को ही भारत ने बहाल किया है. ओटावा में भारतीय उच्चायोग ने जो प्रेस-रिलीज दिया है, उसके मुताबिक भारत ने केवल एंट्री वीजा, बिजनेस वीजा, मेडिकल वीजा इत्यादि को लागू किया है, बाकी 20 कैटेगरी अभी बाकी ही है. कनाडा के साथ संबंधों को ठीक करने में भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन वह अपनी संप्रभुता से कभी समझौता नहीं करेगा. यह एक पहल है, उससे अधिक कुछ और नहीं. 

लगभग 17 लाख भारतीय मूल के लोग कनाडा में रहते हैं. उनका वहां की राजनीति और संस्कृति पर अच्छा प्रभाव है. उनको लुभाने के लिए ही ट्रूडो खालिस्तानी आतंकियों को कवर फायर देते हैं और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर बेबुनियाद आरोप लगाते हैं. इसके पीछे उनकी अपरिपक्वता भी है. वहां कंजर्वेटिव पार्टी के नेता जो विपक्ष में है, भी यही बोल रहे हैं कि जस्टिन ट्रूडो की अपरिपक्व राजनीति ही कनाडा को पूरी दुनिया में बदनाम करवा रही है. इसके कारण भी हैं. जब ट्रूडो संसद में भारत की सुरक्षा एजेंसी को निज्जर की हत्या के पीछे बताते हैं, तो उसके बाद उन्हें कुछ सबूत भी मुहैया कराने चाहिए थे, जो उन्होंने नहीं करवाए. यह बताता है कि ऐसा बस उन्होंने या तो बस कहने के लिए कह दिया, या अपरिपक्वता में किसी देश पर इतने गंभीर आरोप लगा दिए. 

ट्रूडो हैं अपरिपक्व राजनेता

कभी ट्रूडो वहां की संसद में नाजी सेना में रहे व्यक्ति को बुलाकर सम्मानित करने लगते हैं. वहां की अर्थव्यवस्था भी संकट में है और ट्रूडो कनाडा की जनता को असली मुद्दों से भटकाने के लिए ये सब कर रहे हैं. वह सोच रहे हैं कि कनाडा में खालिस्तान समर्थक लोगों को कवर-फायर देकर उन्हें भारतीय मूल के सिख लोगों के वोट भी मिल जाएंगे. यह उनकी सोच है, लेकिन इससे भारत-कनाडा संबंधों में कड़वाहट आ रही है, यह वह भूल जाते हैं. इसी कारण वह हमास को तो आतंकी करार देते हैं, लेकिन खालिस्तानियों को कवर-फायर देते हैं. भारत अपने राजनयिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है. भारतीय दूतावासों पर जिस तरह से हमले हुए हैं, जिस तरह भारतीय राजनयिकों को हत्या की दिनदहाड़े धमकी मिल रही है, जिस तरह सिख फॉर जस्टिस के नेता पन्नू खुलेआम एक संप्रदाय विशेष के लोगों को भाग जाने या मरने के लिए तैयार रहने की धमकी दे रहे हैं, वह भारत के लिए बहुत चिंताजनक है.

कनाडा की कार्रवाई इस पर नहीं दिख रही थी, इसलिए भारत ने भी जवाबी कार्रवाई की. अभी भारत ने जो वीजा सेवा की बहाली की है, वह भी अपने लोगों के फायदे के लिए अधिक की है. इसमें मेडिकल सुविधाओं के लिए वीजा खोला गया है, कांफ्रेंस के लिए खोला गया है, तो वो अकादमिक और आर्थिक वजहों से लोग आएंगे, लेकिन वह छोटा सा हिस्सा होगा. भारत का लक्ष्य जल्द ही दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, तो बिजनेस के लिए उसको दरवाजे खोलने होंगे. एंट्री-वीजा बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिन भारतीयों के पास ओसीआई (भारतीय मूल के प्रवासी) कार्ड नहीं है, उन लोगों को ये सेवा दी जाती है. कनाडा में बहुत बड़ा तबका गुजरात और पंजाब व अन्य प्रांतों से गए भारतीयों का है. उनको दिक्कत न हो, इसलिए भारत ने ये सेवाएं फिर शुरू की हैं.

स्टिक एंड कैरट पॉलिसी है भारत की

भारत यह चाहता है कि कनाडा से उसके संबंध ठीक हों, हालांकि भारत का ये सीधा मानना है कि उसकी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा. जिस तरह खालिस्तानी आतंकी लगातार भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर रहे हैं, एक के बाद एक आपत्तिजनक बयानबाजी कर रहे हैं, उसके खिलाफ कनाडा की चुप्पी और एक तरह से शह बहुत ही दिक्कत देनेवाली है. भारत का सीधा मानना है कि कनाडा को अपनी धरती पर भारत-विरोधी गतिविधियां बंद करानी होंगी और अगर कनाडा ने ये नहीं किया तो भारत कठोर कार्रवाई भी करेगा, जो पिछले दो महीनों की कार्रवाई से स्पष्ट भी है. तनाव कब तक कम होगा, इसकी अधिक जिम्मेदारी कनाडा की है. खासकर जस्टिन ट्रूडो की सरकार खालिस्तानियों पर किस तरह और कितनी कार्रवाई करते हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. यह भी जाहिर है कि खालिस्तानियों से केवल भारत को नहीं, बल्कि कनाडा को भी खतरा है.

एयर इंडिया के जहाज कनिष्क को 80 के दशक में बम से उड़ाकर खालिस्तानी ये साबित भी कर चुके हैं. दूसरी बात ये है कि कनाडा के जिन राजनयिकों को भारत ने जो भेजा है, उसमें भारत ने तर्क दिया है कि वियना कन्वेंशन के आर्टिकल 11.1 के मुताबिक ही भारत ने उनको वापस भेजा है. वह आर्टिकल कहता है कि अगर दो देशों के बीच समझौता नहीं है और राजनयिकों की संख्या अधिक है, तो वह उनको उनके देश वापस भेज सकता है. भारत को उन राजनयिकों की संख्या के साथ उनके भारत की घरेलू राजनीति में दखल से आपत्ति थी, इसलिए उसने उनको वापस भेज दिया है. निष्कर्ष के तौर पर यही समझना है कि कनाडा आतंक पर जितनी जल्द गंभीरता से कार्रवाई करेगा, दोनों देशों के संबंध उतनी ही जल्दू नॉर्मैल्सी की ओर बढ़ेंगे.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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