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बिहार मेंं चढ़़ा हुआ है राजनीतिक पारा, एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों में सीट बंटवारे पर खोला 'खेला'

बिहार में रविवार को पटना के गांधी मैदान में इंडिया अलाइंस कr एक जोरदार रैली हुई. इसमें विपक्षी नेताओं ने सरकार को और भाजपा को खूब खरी खोटी सुनाई. जनविश्वास रैली यकीनन तेजस्वी की थी लेकिन उसमें कई पार्टियां शामिल हुई. जिसको काफी सफल माना जा रहा है. इस रैली से विपक्ष यानी की इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं ने मंच से एकजुटता भी दिखाई. नीतीश पर हालांकि, तेजस्वी हमलावर नहीं थे, लेकिन उनके पिता लालू प्रसाद ने नीतीश और मोदी दोनों पर जमकर हमला बोला. पीएम मोदी पर तो उन्होंने परिवार न होने का भी सवाल पूछ दिया, नीतीश कुमार को भी पलटू राम कहते हुए कहा कि उनसे गलती हो गयी.

इस रैली से बुलंद है इंडिया गठबंधन

एक जो भीड़ का पैमाना होता है. वो भी कहीं न कहीं पूरा होता हुआ दिखा. इसके अलावा गठबंधन के बहुतेरे दलों के बड़े नाम भी शामिल हुए थे, इससे तेजस्वी और राहुल के हौसले बुलंद हैं. अखिलेश यादव ने भी बिहार की हालिया शिक्षक भर्ती का जय-जय कार किया.उन्होंने पीएम मोदी पर नौकरियों छीनने और तेजस्वी पर नौकरियां देने का बखान किया. राहुल तो लगातार जातीय सर्वे, नयी आरक्षण सीमा और नौकरियों का बिहार में मुद्दा उठा ही रहे हैं. ठीक इसके एक दिन पूर्व बिहार के औरंगाबाद और बेगूसराय दोनों जगहों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो रैलियां कीं. इसमें बिहार के मुख्यमत्री नीतीश कुमाार भी शामिल रहे. इस क्रम में पीएम मोदी ने करीब छह हजार करोड़ रुपये के लागत के योजनाओं का शिल्यान्यास और उद्घाटन किया.  

इन दो दिनों के रैली में एक बड़ी दिलचस्प बात दिखी. एनडीए का हिस्सा माने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान कहीं नहीं दिखे ना तो एनडीए के साथ दिखे. ना ही इंडिया गठबंधन की रैली  में वो दिखे. राजनीतिक हल्कों में कयास लगाया जा रहा है कि ऐसा क्या कुछ हुआ कि एनडीए के हिस्सा के दोनों नेता वहां नहीं पहुंचे, कहीं किसी बात को लेकर उनमें नाराजगी तो नहीं हैं. बड़ा प्रश्न तो यह भी बना है कि क्या जदयू और नीतीश कुमार के आने के बाद से एनडीए में एकजुटता है. या फिर विपक्ष के नेताओं द्वारा इसमें सेंधमारी की जा सकती है. सीट बंटवारे को लेकर क्या कुछ समीकरण बनता है. क्योंकि एनडीए के घटक दलों के द्वारा सीटों पर क्या बात बनती है यह जानना भी महत्वपूर्ण हो जाता है.  

40 सीटों में एनडीए को होगी मुश्किल 

बिहार में एनडीए के साथ जदयू, राजलोपा, लोजपा (चिराग गुट), लोजपा  (पशुपति पारस गुट), हम और भाजपा है. बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें है. इसमें किस समीकरण पर बात बनती है यह भी जानना बड़ा दिलचस्प है. तब जब जीतन राम मांझी हिस्सेदारी मांग रहे हों. बिहार की राजनीतिक गलियारों की बात करें तो बात सामने आ रही है कि लोजपा (चिराग गुट), लोजपा (पशुपति पारस गुट) दोनों गुटों को  मिलाकर एक ही बना दिया जाए, जैसा वह रामविलास पासवान के जमाने में ते. उसके बाद लोजपा को छह सीटें दी जाने की बात बनती दिख रही है. जबकि एक राज्यसभा की सीट पर भी बात बनती दिख रही है. हालांकि, बात है कि कुल बची 34 सीटों में से क्या 17-17 पर भाजपा और जदयू के बीच में बात बनेगी. पिछली बार भी यही आंकड़ा रहा था,जिसमें एनडीए ने 40 में से 39 सीटों को जीता था. एक सीट जदयू हार गई थी. जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को कैसे एडजस्ट किया जाता है यह भी देखना होगा.

नीतीश फिर उसी घाट पर

माना जाता है कि नीतीश कुमार इसके पक्षधर दिखे हैं कि बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हो. नीतीश कुमार की एक अलग ही छवि रही है, वो किसी पर भरोसा नहीं करते. चाहे उनकी पार्टी के आरसीपी सिंह रहें हो या ललन सिंह. या फिर किसी दूसरे पार्टी के नेता रहें हो. एनडीए में आने के बाद भी उनको भरोसा नहीं है. भाजपा के बिहारी नेताओं का मन नहीं था कि नीतीश कुमार फिर से एनडीए का हिस्सा बनें.  नीतीश कुमार और जदयू अब कहीं न कहीं धीरे धीरे कमजोर होते जा रहे हैं. तो नीतीश कुमार ये चाहेंगे कि एक साथ चुनाव हो तो उनके मुख्यमंत्री के पद पर कोई खतरा नहीं आ पाएगा.  

महागठबंधन छोड़ने के नीतीश कुमार के दो ही कारण समझ में आते हैं, जिसमें पहली यह मांग रही होगी कि लोकसभा में उनकी सीटों की संख्या उतनी ही बरकारर रखी जाए जितनी पहले थी. दूसरा कि अगले पांच सालों तक मुख्यमंत्री के कुर्सी पर भाजपा कुछ नहीं बोलेगी. दोनों में सहमति नहींं बन पाई है. इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार को पीएम पद के लिए नहीं चुना गया तो फिर बाद में संयोजक बनाया गया. फिर नीतीश कुमार को उसमें कोई फायदा ना दिखता दिख उन्होंने एनडीए का दामन थाम लिए. क्योंकि लोकसभा में अपनी शक्ति को बरकरार रखने के लिए एक एनडीए में आना ही रास्ता था. और दूसरी बात यह भी थी कि वो खुद बोल चुके थे कि 2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो इसको बदलने के लिए एनडीए में आना जरूरी था.  

नीतीश लोकसभा तक ही महत्वपूर्ण

क्या भाजपा के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का महत्व इस लोकसभा चुनाव तक ही है, क्योंकि नीतीश कुमार की छवि अब पहले जैसी नही रही. ओबीसी में आरक्षण बढ़ाने के बाद कई चीजें बदली थी. बिहार में लोकसभा की सीटें जीतने की भाजपा की मजबूरी है, तो इसीलिए वह नीतीश कुमार को साथ रख रही है लेकिन 2025 में होने वाली विधानसभा चुनाव के समय समीकरण कुछ और होगा. उस समय भाजपा के पास कोई मजबूरी नहीं होगी. इन्ही मुद्दों को लेकर नीतीश कुमार चाहते हैं कि दोनों चुनाव एक समय पर हो. इसमें लोकसभा के सीटों का फायदा भाजपा को मिल जाए और बिहार के विधानसभा चुनाव का फायदा नीतीश कुमार को मिल जाए. लेकिन भाजपा इसके लिए शायद पूरी तरह से तैयार नहीं होगा. इससे पहले सीटों पर क्या बात बनती है यह भी देखना होगा. क्योंकि एनडीए में चार से पांच पार्टियां है वो कैसे सीट बंटवारे को लेकर मानती है. इसके लिए आगे यह भी देखना होगा कि विपक्षी यानी की इंडिया गठबंधन सीटों को ध्यान में रखकर क्या कुछ करती है.  उनका समीकरण सीट को लेकर क्या कुछ रहता है?

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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