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‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान' भजन: लोक व्यवहार का सौंदर्यशास्त्र

 भाषा केवल संवाद या सूचना के आदान-प्रदान का कोई यांत्रिक माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानव जाति की सबसे क्रांतिकारी और युगांतकारी खोज है. भाषा की वास्तविक सार्थकता, सौंदर्य और प्रभावशीलता तब प्रकट होती है, जब यह किताबी व्याकरण के कठोर नियमों और कृत्रिम तामझाम से मुक्त होकर 'लोक व्यवहार' में बोलियों के रूप में प्रवाहित होती है. लोक व्यवहार की भाषा सदा सरल, सहज, नैसर्गिक और स्वछंद होती है; यह बिना किसी बाहरी ताम झाम के आम आदमी की समझ और अनुभूतियों को अभिव्यक्ति का माध्यम देती है.

भारतीय संदर्भ में लोक अभिव्यक्ति की यह सहजता लोक संगीत के रूप में इतनी प्रभावी है कि यह बिना किसी आधुनिक वाद्य यंत्र या महंगे स्टूडियो के भी सीधे मानवीय चेतना को झंकझोर देती है. मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के एक दृष्टिबाधित लोक कलाकार सुनील लोधी द्वारा एक साधारण तंबूरे (तानपुरा) की तान पर गाया गया पारंपरिक भजन "मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई" इसी भाषाई और लोक अभिव्यक्ति का एक अनुपम समसामयिक उदाहरण है. इस भजन की कर्णप्रियता का आलम ये है कि कुछ हफ्तों में ही यह अभूतपूर्व रूप से लोकप्रिय हो गया है.

लोक संगीत का मिनिमलिज्म आधुनिक युग में जहाँ अच्छे और सफल संगीत का अभिप्राय एक प्रभावी गीत और सुरीली आवाज़ के साथ साथ भारी-भरकम तकनीकी जटिलता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लाखों रुपये के इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान के साथ साथ भरी भारी भरकम विज्ञापन से लिया जाने लगा है. वहाँ इस बुंदेली अवधी मिश्रित भजन की व्यापक स्वीकार्यता संगीत और कला के शाश्वत और भारतीय समझ को सामने लाती  है कि सादगी में ही सर्वोच्च प्रभाव सहजता से अंतर्निहित होता है. मात्र एक तंबूरे की झंकार की न्यूनतम दक्षता के साथ देखते ही देखते यह गीत करोड़ों लोगों के कंठ का हार बन गया.

भारतीय कला दर्शन के अनुसार, लोक संगीत में किसी शास्त्रीय या जटिल 'तकनीकी दक्षता' की आवश्यकता नहीं होती; यहाँ 'भाव की विमल शुद्धता' ही कलाकार की सबसे बड़ी दक्षता और व्यापक प्रसार का साधन बन जाती है. जब अंतःकरण के शुद्ध और पारपरिक भाव तंबूरे के एक अनवरत और शांत सुर के साथ मिलते हैं, तो वह अभिव्यक्ति किसी आधुनिक तामझाम की मोहताज नहीं रह जाती. संवाद शैली: जिज्ञासा और समाधान का दार्शनिक तालमेल भारतीय लोक संगीत की एक अत्यंत विशिष्ट और ऐतिहासिक धरोहर उसकी ‘संवाद शैली’ है, जिसे पारंपरिक शब्दावली में 'टेर' भी कहा जाता है, जिसे हर क्षेत्र के लोक संगीत में सुना जा सकता है.

"मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई" की आंतरिक संरचना भी इसी टेर वाली विधा पर आधारित है. इसके एक मुखड़े में भक्त का संशय या लाचारी प्रश्न के रूप में प्रकट होती है, और ठीक अगले ही मुखड़े में उसका सटीक दार्शनिक समाधान (ईश्वर की महिमा या ज्ञान) प्रस्तुत किया जाता है: "काहे की वा नाव बनाई, काहे की पतवार..." (जिज्ञासा) "राम-नाम की नाव बनाई, भक्ति की पतवार..." (समाधान) यह संवाद शैली महज़ एकतरफा गायन नहीं है, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा की उस 'शास्त्रार्थ' और संवाद पद्धति का लोक-रूप है, जिसका उपयोग सदियों से उपनिषदों, कबीर के निर्गुणी पदों, बुंदेली फाग-ख्याल और देश के कोनो तक फैली लोकगीतों में होता आया है.

इस विधा के माध्यम से जीवन, जगत और अध्यात्म के गूढ़तम सत्यों को भी अत्यंत सरलता से जनसामान्य के मानस में स्थापित कर दिया जाता है. यहाँ श्रोता निष्क्रिय नहीं रहता; वह प्रश्न के साथ ही मानसिक रूप से जुड़ जाता है और उत्तर उसे एक गहरे बौद्धिक एवं आत्मिक संतोष की तरफ ले जाता हैं. कला और विधा की सामूहिकता: 'सह-हृदय' की अवधारणा भारतीय ज्ञान विधा और कला दर्शन की यह एक मौलिक विशेषता है कि ये कभी 'एकाकी' या व्यक्ति-केंद्रित प्रदर्शन मात्र नहीं होते, चाहे वो नृत्य हो, संगीत हो, नाटक हो या साहित्य ही क्यों नहीं हो.

पश्चिमी कला बोध के उलट वे हमेशा कलाकार और श्रोता आया दर्शक को अपनी प्रदर्शन का हिस्सा बना लेते है, स्पष्ट रूप से सामूहिकता का भाव अंतर्निहित किए होते हैं. पाश्चात्य कला दृष्टि में जहाँ मंच पर उपस्थित कलाकार और दर्शक या श्रोता के मध्य एक स्पष्ट और अभेद्य रेखा होती है, वहीं भारतीय लोक परंपरा में यह विभाजन पूरी तरह विलीन हो जाता है. दर्शिक और कलाकार प्रदर्शन का हिस्सा होते है. चाहे वो उतर भारत की रामलीला हो, दक्षिण का यक्ष गान हो. भारतीय नाट्यशास्त्र की शब्दावली में दर्शक केवल श्रोता नहीं, अपितु वाह 'सह-हृदय' (समान हृदय वाला) है, सहभागी है.

'हनुमान अंश' फिल्म का यह भजन भी कलाकार श्रोता को सीधे सवाल जबाब के माध्यम से जोड़ लेता है. लोग सामूहिक रूप से तालियां बजाते हैं, कोरस में सुर मिलाते हैं और अंततः पूरी सभा एक समष्टिगत ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है. यह सामूहिकता व्यक्ति के अहम् ('मैं') प्रवृति का विसर्जन कर समष्टि ('हम') के भाव को जाग्रत करती है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा का चरम लक्ष्य है. लोक चेतना की डिजिटल अभिव्यक्ति मौजूदा परिप्रेक्ष्य में भारत के भदेश परपरा का यह भजन और संबंधित सिनेमाई प्रोजेक्ट (फिल्म 'हनुमान अंश') भारतीय ज्ञान को नए संदर्भो में समझने के लिए एक बेहतरीन केस-स्टडी भी है.

कैसे परपरागत लोक कला किसी बड़े कॉर्पोरेट पीआर (PR) बजट या बाजारू रणनीतियों पर भारी पड़ती है. बॉक्स ऑफिस पर अत्यंत सीमित साधनों के साथ शुरुआत करने के बावजूद, यह प्रोजेक्ट महज़ जनसाधारण के मौलिक जुडाव और केवल ज़ुबानी प्रशंसा के बल पर और फिल्म समीक्षकों के दरकिनार कर दिए जाने के बाद भी एक व्यापक सांस्कृतिक और व्यावसायिक विमर्श बनने में सफल हो रही है. यह प्रमाण है कि जब कला लोक की वास्तविक अनुभूतियों से निकलती है, तो वह बाजारवाद के तयशुदा समीकरणों को ध्वस्त करने की क्षमता भी रखती है.

इस लोकगीत के दृष्टिबाधित गायक सुनील लोधी का गाँव देहात और ट्रेनों में गाने से लेकर देश के मुख्यधारा के स्टूडियो और नीति-निर्माताओं द्वारा सम्मानित होने तक का सफर एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश देता है. सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के इस युग में सोशल मीडिया ने सही मायने मेंऔर समयानुकूल एक लोकतांत्रिक मंच की भूमिका निभाई रही है. इसी के बदौलत किसी बड़े व्यावसायिक गॉडफादर के बिना भी एक दृष्टिबाधित गँवई कलाकार को उसकी मौलिक प्रतिभा और लोक-ऊर्जा के बल पर राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होने का मौका मिला. यह मुख्यधारा के संगीत उद्योग के लिए भी एक पाठ है, जो प्रायः लोक धुनों का केवल व्यावसायिक दोहन करता रहता है, किंतु यहाँ मूल लोक कलाकार को ही उसकी वास्तविक अस्मिता और बुंदेली लहजे के साथ संपूर्ण सम्मान दिया गया है. शिक्षा नीति 2020: नयी भाषाई अंगड़ाई   वैश्वीकरण की अंधी दौड़ और महानगरीय प्रभाव ने हाल के वर्षों में भारत को भाषा के स्तर पर 'एकाकी' होने की दिशा में धकेल रहा है.

जहाँ अंग्रेज़ी, महानगरीय मानक हिंदी और रसूख वाली स्थानीय क्षेत्रीय भाषाओ के वर्चस्व ने बुंदेली, अवधी, भोजपुरी और मारवाड़ी जैसी हमारी समृद्ध क्षेत्रीय बोलियों को सामाजिक और सांस्कृतिक हाशिये पर धकेला है. वहीं इस भाषाई एकाकीपन ने युवा पीढ़ी के भीतर स्थानीय बोलियों के प्रति एक गहरा सांस्कृतिक अलगाव भी पैदा किया. ऐसे संक्रमण काल में बुंदेली-अवधी जैसे भदेस तत्वों से रचे-बसे इस पारंपरिक लोकगीत का राष्ट्रीय पटल पर गूँजना महज़ एक गाने की सफलता नहीं है, बल्कि यह भाषाई विविधता के अकादमिक और व्यावहारिक महत्व की एक सशक्त पुनर्स्थापना है. यह घटनाक्रम सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के उस मूल दर्शन की संपुष्टि करता है, जो प्राथमिक शिक्षा में 'मातृभाषा और स्थानीय बोली' को पढाई लिखी का केंद्रीय माध्यम बनाने पर बल देता है.

शिक्षा नीति का यह स्थानीय भाषाई आधार दो अत्यंत महत्वपूर्ण अकादमिक सिद्धांतों पर टिका है, जिसमें पहला छात्र का सहज संज्ञानात्मक विकास है. कोई भी बालक किसी जटिल, वैज्ञानिक, या नैतिक समझ को अपनी घरेलू बोली में तेजी और गहराई से सिख सकता है, वह किसी थोपी हुई बाहरी भाषा में संभव नहीं है. इसी से जुड़ा दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सांस्कृतिक अस्मिता और आत्मगौरव का है; जब कोई बालक किसी भी बोली को समाज, सिनेमा और कला के उच्च मंचों पर लोकप्रियता पाते देखता है, तो उसके भीतर की अपनी बोली को लेकर पैठ रही हीनभावना धीरे धीरे समाप्त हो जाती है और वह अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस करता है.

हमारी इन आंचलिक बोलियों के भीतर सदियों का व्यावहारिक लोक-विज्ञान, पर्यावरण चेतना और जीवन मूल्य संचित हैं, जिनका संरक्षण केवल बोलियों के जीवित रहने और उन्हें मुख्यधारा में स्वीकार करने से ही संभव है. "मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान..." की यह आशातीत सफलता कही ना कही यह इशारा करती है कि जन सामान्य की चेतना आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक है. यह गीत केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के लिए अपनी जड़ों को पहचानने का एक बौद्धिक और सांस्कृतिक आह्वान है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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