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दानिश सिद्दीकी: दुनिया को बेखौफ पत्रकारिता का रास्ता दिखाने वाले भारतीय पत्रकार

हमारे देश के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने बरसों पहले अपनी एक कविता में लिखा था- "इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है. न ईश्वर, न ज्ञान, न चुनाव. कागज पर लिखी कोई भी इबारत फाड़ी जा सकती है और जमीन की सात परतों के भीतर गाड़ी जा सकती है. जो विवेक खड़ा हो लाशों को टेक, वह अंधा है. जो शासन चल रहा हो बंदूक की नली से, हत्यारों का धंधा है. यदि तुम यह नहीं मानते, तो मुझे अब एक क्षण भी तुम्हें नहीं सहना है."

इतने बरसों बाद इन बातों को हमने सच में बदलते देखा, वो भी अफगानिस्तान की उस जमीन पर जहां से गुजरते हुए गौतम बुद्ध ने शांति व सब्र का संदेश संसार को दिया. लेकिन सिर्फ जिहाद में यकीन रखने वाले तालिबानी लड़ाकों ने भारत के एक होनहार व जांबाज़ फ़ोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को हमसे छीन लिया. वह दुनिया की सबसे मशहूर न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के साथ एक फोटो जर्नलिस्ट की हैसियत से काम कर रहे थे. कंधार शहर के स्पिन बोलदाक जिले में अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच झड़पों की कवरेज करने के दौरान वे मारे गए.
जो काम कलम नहीं कर पाती, उसे अपने कैमरे के लैंस के जरिये करने में उन्हें कम उम्र में ही इतनी महारत मिल चुकी थी, जिसके चलते 2018 में उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरुस्कार से नवाजा गया. लेकिन कौन जानता था कि अफगानिस्तान की फ़ौज और मज़हबी जुनून में बौखलाए तालिबानों के बीच होती लड़ाई को अपने कैमरे में कैद करने वाले दानिश को सच सामने लाने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी. उनकी हत्या से सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की पत्रकार-बिरादरी हैरान, परेशान और गमज़दा है कि आखिर ये मुल्क किस रास्ते पर जा रहा है.

पत्रकार एक 'योद्धा' !
41 साल के दानिश की हत्या बेख़ौफ होकर बहादुरी से अपने काम को अंजाम देने वाली पत्रकारिता की न भुला पाने वाली एक मिसाल बन गई है. यकीनन उनकी मौत साहसिक पत्रकारिता के लिए एक पैगाम है लेकिन ये एक सवाल भी उठाती है कि दुनिया के कितने देशों की सरकारों ने इस तरह के संघर्षों या जंग को कवर करने वाले पत्रकारों को अपने सैनिकों की तरह ही एक 'योद्धा' माना है? जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में साफतौर पर कहा है कि ऐसे हालात में अपनी जान को जोखिम में डालकर जो पत्रकार पूरी दुनिया को उससे रुबरू कराते हुए मारे जाते हैं, उन्हें संबंधित देश की सरकार एक 'योद्धा' मानते हुए न सिर्फ उचित सम्मान दे बल्कि उनके परिवार की जरुरतों को पूरा करना भी वो अपना दायित्व समझे. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उस पत्रकार के हाथ में कलम थी या कैमरा. पर, अफसोस ये है कि विकसित लहे जाने वाले दो-चार देशों को छोड़कर किसी भी सरकार ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही उस पर अमल किया.

पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा नुकसान
दानिश की निर्मम हत्या ने दुनिया के पत्रकारिता-जगत को बेहद बुरी तरह से झकझोर दिया है क्योंकि उन्हें अहसास है कि अफगानिस्तान के हालात दिनोंदिन और भी बदतर होते जाएंगे लेकिन उसकी कवरेज करना भी पेशेवर जरुरत है. लिहाजा आज दानिश कुर्बान हुआ, कल पता नहीं किसका नंबर आ जाए. शायद इसीलिए मीडिया कर्मियों के वैश्विक नेटवर्क इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (आईपीआई) ने पुलित्जर  विजेता दानिश सिद्दीकी के मारे जाने पर गहरा अफसोस जताते हुए इसे पत्रकारिता के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान बताया और संघर्ष वाले क्षेत्रों से रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों द्वारा सामना किए जाने वाले खतरों की याद भी दिलाई.

आईपीआई ने अपने एक ट्वीट में कहा, "दानिश सिद्दीकी की मौत के बारे में जानकार आईपीआई बहुत दुखी है, वह हमारे समय के सर्वाधिक उत्कृष्ट फोटो पत्रकारों में से एक थे.पत्रकारिता को बड़ा नुकसान पहुंचा है. हम उनके परिवार और सहकर्मियों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते हैं."

उन्हें 2018 में फीचर फोटोग्राफी के लिए प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार मिला था. म्यामांर के अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय द्वारा सामना किये जाने वाली हिंसा को तस्वीरों में उतारने को लेकर उन्हें अपने एक सहकर्मी और पांच अन्य के साथ वह पुरस्कार दिया गया था.उन्होंने अफगान संघर्ष, हांगकांग प्रदर्शन और एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप में अन्य बड़ी घटनाओं को व्यापक रूप से कवर किया था.

आईपीआई के उपनिदेशक स्कॉट ग्रिफेन ने एक यबान में कहा , "रॉयटर टीम के सदस्य के तौर पर उन्होंने हाल के सालों में कुछ सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को शानदार तरीके से इतिहास के पन्नों में संजोया. उनके द्वारा ली गई तस्वीरें दुनिया भर में करोड़ों लोगों तक पहुंची और सराही गई."

दानिश, इस साल अफगानिस्तान में मारे गए पांचवें पत्रकार
आईपीआई के मुताबिक दानिश, इस साल अफगानिस्तान में मारे गए पांचवें पत्रकार हैं. लिहाज़ा इसी से समझ सकते हैं कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान के हालात को कवर करना अंतराष्ट्रीय मीडिया के लिए कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है. दिल्ली के प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएट करने के बाद मास कम्युनिकेशन की डिग्री हासिल करने वाले दानिश ने न्यूज़ चैनल के पत्रकार के रुप में अपने कैरियर की शुरुआत की थी लेकिन जल्द ही उन्होंने फ़ोटो पत्रकारिता की तरफ रुख किया और साल 2010 में वे रॉयटर्स के साथ जुड़ गए.

दरअसल, दानिश सिद्दीक़ी की मौत उन तस्वीरों का खात्मा समझी जाएगी जिन्हें देखकर दुनिया के लोगों को पूरी खबर पढ़ने की जरुरत ही महसूस नहीं हुआ करती थी. दुआ कीजिये कि भारत को फिर किसी और दानिश को इस तरह से न खोना पड़े. 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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