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कॉमन सिविल कोड: क्या बीजेपी के लिए साबित होगा मास्टरस्ट्रोक?

दो राज्यों के विधानसभा चुनाव आते ही कॉमन सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मुद्दा फिर से गरमा उठा है. बीते हफ्ते ही गुजरात की बीजेपी सरकार ने इसे लागू करने के लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई में एक समिति बनाने का फैसला लिया है. वहीं रविवार को हिमाचल प्रदेश के चुनावी दौरे पर पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने भी ऐलान कर दिया है कि हिमाचल में जयराम ठाकुर की सरकार दोबारा आएगी और यहां कॉमन सिविल कोड लागू हो जाएगा. 

सवाल है कि बीजेपी को ये मुद्दा क्या इसलिये रास आ रहा है कि ये वोटों का ध्रुवीकरण करने में कारगर औजार साबित हो रहा है. वह इसलिये कि उत्तराखंड के पिछले विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने यही वादा करके दोबारा सरकार में वापसी की थी. इसलिये गुजरात व हिमाचल चुनाव में भी बीजेपी इसे अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक मान रही है. 

हालांकि समान नागरिक संहिता पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को शुरू से ही ऐतराज रहा है. इसका विरोध करने वाले मुस्लिम संगठनों व नेताओं का मानना है  कि यह सभी धर्मों पर हिंदू कानून को थोपने जैसा है.  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बड़ा ऐतराज ये है कि अगर सबके लिए समान कानून लागू कर दिया गया तो मुसलमानों के अधिकारों का हनन होगा और कोई भी सरकार इस पर क़ानून बनाती है, तो ये मुस्लिमों के हकों को कुचलने के समान ही होगा. 

दरअसल, संघ के एजेंडे में शुरु से ही तीन मुद्दे रहे हैं जिन्हें बीजेपी ने हर लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा-पत्र में शामिल किया है जिसे बाद में,  संकल्प-पत्र का नाम दे दिया गया. ये तीन मुद्दे थे-जम्मू-कश्मीर-कश्मीर से धारा 370 हटाना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और देश में समान नागरिक संहिता लागू करना. 

मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में पहले के दो मुद्दों को पूरा कर दिखाया. अब सिर्फ कॉमन सिविल कोड ही बचा है, जिसे चुनावी मुद्दा बनाते हुए बीजेपीशासित राज्यों में लागू करने करने की कवायद की जा रही है. हालांकि ये भी तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने से पीछे नहीं हटेगी. 

वैसे ट्रिपल तलाक के बाद से ही बीजेपी इसे मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में अहम कदम मान रही है लेकिन मुस्लिम संगठनों को ये बात हजम नहीं हो रही है.  विश्लेषक भी मानते हैं कि इसके लागू हो जाने से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा और देश की सामाजिक एकता भी मजबूत होगी. 

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है, सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून. फिर चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से हो. शादी से लेकर तलाक, संपत्ति के बंटवारे और बच्चा गोद लेने जैसे मामले में सभी नागरिकों के लिए नियम-कानून एक समान होंगे. बता दें कि गोवा ऐसा इकलौता राज्य है, जहां 1961 से ही समान नागरिक संहिता लागू है.

देश में फिलहाल हिंदुओं के लिए अलग कानून है और मुस्लिमों व पारसी समुदाय का अलग पर्सनल लॉ है. यूनिफॉर्म सिविल कोड बन जाने से इन सबका अस्तित्व खत्म हो जायेगा और सबके लिए समान कानून होगा. जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उन्हें ये जान लेना चाहिये कि यूनिफॉर्म सिविल कोड पाकिस्तान, बांग्लादेश और मलेशिया जैसे इस्लामिक देशों में काफ़ी पहले से ही लागू है.  इनके अलावा तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देशों ने भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को अपनाया हुआ है. 

लेकिन हैदराबाद के सांसद और AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी के ऐतराज ये है कि यह यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं  होगा, बल्कि हिंदू कानून को ही मुस्लिमों व अन्य समुदायों पर थोपने की साजिश है.  इसलिए वे बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि संविधान के आर्टिकल 44 की आप बात करते हैं, तो आप हमें बताएं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के तहत किस प्रावधान को लागू करेंगे? उनका आरोप है कि कि बीजेपी यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात केवल इसलिए कर रही है क्योंकि मुसलमानों को निशाना बनाया जाए. 

अब सवाल ये है कि बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें मुसलमानों के इस डर या उनकी गलतफहमी को कैसे दूर करेगी?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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