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ब्लॉग: यूपी विधानसभा का विशेष सत्र..क्या खोया क्या पाया

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर योगी सरकार ने विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया। इस दौरान योगी सरकार ने कई उपलब्धियां गिनाईं। हालांकि विपक्ष ने इसका बहिष्कार किया..लेकिन चौकाते हुये कांग्रेस की अदिति सिंह ने सत्र में भाग लिया

उत्तर प्रदेश में गांधी जयंती पर शुरु हुआ यूपी विधानसभा का विशेष सत्र, तमाम मुद्दों को एक साथ लेकर चल रहा है...ये सत्र कई मायनों में खास है...एक तो इसका 36 घंटे का टाइम...दूसरा समूचे विपक्ष का बहिष्कार, हां...अदिति सिंह और शिवपाल यादव जैसे नेताओं ने पहुंच कर इसे रोचक जरूर बना दिया...अब सवाल उठता है कि इस सत्र से हासिल क्या होगा....इस सत्र के जरिए उत्तर प्रदेश की सरकार अपनी उपलब्धियों को गिना रही है। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सदन को आंकड़े दे रहे हैं कि किस तरह उनकी सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने, स्वास्थ्य सेवाओं में उम्मीदों से हटकर बदलाव, अपराध पर काबू पाने और बढ़ते साइबर अपराध के साथ-साथ निवेश की संभावनाओं को टटोलते उत्तर प्रदेश में विकास की नई दिशा तय की है। इसके लिए मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश के तमाम मंत्री भी अपने-अपने विभागों का ब्यौरा दे रहे हैं। हालांकि सरकार की इन उपलब्धियों से विपक्ष वास्ता नहीं रखना चाहता। यही वजह है कि उसने इस सत्र का बहिष्कार कर रखा है। बहिष्कार की इस सियासत में कुछ अपवाद भी उभरे हैं। किसानों की आय बढ़ाने का दावा योगी सरकार कर रही है..तो उन्हीं किसानों के दम पर योगी सरकार का कहना है कि प्रदेश में किसी तरह के खाद्यान्न का संकट नहीं है। उत्तर प्रदेश में सरकार किसी की भी हो कानून व्यवस्था बड़ा मुद्दा रही है। लगातार अपराधों का सिलसिला चलते रहने से योगी सरकार सवालों में भी घिरी है। खास कर पिछले दिनों जिस तरह से बच्चा चोरी की अफवाह को लेकर लोगों की पिटाई हुई। बच्चों के खिलाफ अपराध यानी पोक्सो एक्ट योगी सरकार का दावा है कि यूपी से ज्यादा त्वरित प्रक्रिया फिलहाल किसी राज्य में नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार इस विशेष सत्र के जरिए विकास की जिस लकीर को खींचने का दावा कर रही है, विपक्ष उससे मुंह फेरना चाहता है। यही वजह है कि वो विरोध की आड़ में सरकार पर सवाल उठा रहा है।

कांग्रेस ने सदन का विरोध किया है। पार्टी की तरफ से विधानमंडल दल के नेता विधायक अजय कुमार लल्लू का कहना है कि शाहजहांपुर की बेटी के साथ हुए बलात्कार के आरोपी को बचाने वाली योगी सरकार विशेष सत्र में किस बात की दुहाई देगी। महिला सुरक्षा का हाल तो पूरे देश ने उन्नाव से लेकर शाहजहांपुर तक देखा है। पूरी भाजपा बलात्कारियों के साथ खडी है। गांधी जयंती के मौके पर 36 घंटे के विशेष सत्र वास्तव में ढकोसला है और उनकी पार्टी इसका बहिष्कार करेगी।

वहीं दूसरी तरफ सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि, 'सर्वदलीय बैठक में 48 घंटे का विधानसभा बताया गया था, लेकिन भाजपा गांधी जी के विचारों को मानती ही नहीं है। इसीलिए उन्होंने सत्र को 36 घंटे का कर दिया। इसके बाद हमारी पार्टी ने इस सत्र में शामिल न होने का फैसला किया. जो लोग गांधीजी को नहीं मानते हैं, उनके साथ सत्र में पार्टी कैसे शामिल हो सकती है'।

कांग्रेस, सपा के साथ बसपा भी विधानसभा सत्र का बहिष्कार करने वालों में शुमार है। पार्टी की मुखिया मायावती ने ट्वीट कर सरकार पर हमला बोला है। मायावती का कहना है कि 'गांधीजी की 150वीं जयन्ती पर यूपी विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर उनके कार्यों का व्याख्यान करना नहीं बल्कि इसकी आड़ में भाजपा द्वारा अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालना असली मकसद है। इसीलिए बसपा ने अपने विधायकों को बाढ़ पीड़ितों की सहायता के असली जनहित के काम में लगाया है।’ विपक्ष के विरोध की अपनी वजह है।

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी की तरफ से इसमें शिरकत करने खुद अध्यक्ष शिवपाल यादव पहुंचे...उन्होंने योगी सरकार की तारीफ भी की खास कर इन्वेस्टर्स समिट को लेकर की गई पहल की। शिवपाल के अलावा सदन में मौजूद रहने वालों में कांग्रेस विधायक अदिति सिंह भी रही। जिन्हें कांग्रेस की पदयात्रा कार्यक्रम में शिरकत करना था लेकिन बजाय यात्रा में जाने के अदिति ने सत्र में जाना बेहतर समझा....इसी तरह बसपा के विरोध और मायावती के फरमान के बावजूद बसपा के दो विधायक और एक एमएलसी सदन में पहुंचे, सत्र की कार्यवाही में हिस्सा लिया इसमें विधायक असलम रायनी और अनिल सिंह ने शिरकत की और एमएलसी ब्रजेश सिंह ने खुल कर पार्टी की नीति का विरोध किया यूपी सरकार के विधानसभा सत्र का बहिष्कार भले ही विपक्षी पार्टियों ने कर दिया हो...लेकिन कुछ नेताओं ने पार्टी लाइन से हटकर न केवल सत्र में हिस्सा लिया....बल्कि अपनी बात भी रखी...रायबरेली से कांग्रेस की विधायक अदिति सिंह उनमें से भी एक हैं।

सियासत सिर्फ एक मौके का नाम माना जाता है। उस मौके पर जो मारे सो मीर..जो चूका वो खारिज। 2 अक्टूबर के जिस मौके को सत्ता पक्ष ने इतिहास रचने का मौका माना, विपक्ष उसे अपनी आवाज पुरजोर ढंग से बुलंद करने का मौका भी बना सकता था। 36 घंटे अनवरत सरकार को सदन में घेरने का ये मौका विपक्ष ने गंवाया है। ऐसा भी नहीं कि सदन से बाहर सड़क पर विपक्ष ने ऐसा कुछ किया जो जनता का ध्यान अपनी खींच सके। सियासत के जानकार भी इसे विपक्ष की बड़ी रणनीतिक चूक मानते हैं। रही-सही कसर कुछ विपक्षी विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर सदन में मौजूद रहकर पूरी कर दी। जनता अपने नुमाइंदे चुनती है कि वो उनके सरोकार से जुड़ी बातें सदन में मजबूती से उठाएं। विपक्ष को ये समझना होगा कि अगर उनके विधायक ये काम भी नहीं करेंगे तो जनता उनपर भरोसा क्यों और कैसे करेगी। विपक्षी दलों के आलाकमान का सिर्फ अपने आलीशान बंगलों में बैठकर सत्ता परिवर्तन की कामना करने भर से बदलाव नहीं आने वाला। दलों को सदन में आवाज बुलंद करनी होगी, सड़क पर आवाज बुलंद करनी होगी।

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