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Blog: यूपी में कांग्रेस क्या प्रियंका के जरिए खड़ी हो सकेगी!

कुछ दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी का महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी घोषित किया तो प्रदेश के पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा गया. प्रियंका उस वक्त अमेरिका में थीं लेकिन दिल्ली से अमेठी, रायबरेली, लखनऊ और बनारस तक उनकी सुंदर तस्वीरों वाले रंगारंग पोस्टर लग गये. अमेठी में लगा एक पोस्टर उनके नाम का खासतौर पर डंका बजा रहा थाः ‘अमेठी का डंका-बेटी प्रियंका!’ राहुल गांधी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया और पूर्वी यूपी के लिए प्रियंका के नाम की घोषणा करने के तुरंत बाद दावा किया कि अब यूपी में भी कांग्रेस ‘फ्रंटफुट’ पर खेलेगी! क्या कांग्रेस वाकई उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत बनकर उभर सकेगी? क्या इन दो नये प्रभारियों, खासतौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा के कथित करिश्मे के बल पर वह 2019 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी?

यूपी में इस वक्त दो मोर्चे आमने-सामने हैः भारतीय जनता पार्टी-अपना दल आदि का मोर्चा और सपा-बसपा-रालोद का मोर्चा. ऐसे में 2019 की चुनावी पिच पर क्या किसी ‘तीसरी ताकत’ के लिए फ्रंटफुट पर खेलने की संभावना नजर आती है? क्या आज यूपी जैसे राज्य में किसी व्यक्ति-विशेष के करिश्मे का कोई बड़ा सियासी असर हो सकता है? देश का सबसे बड़ा राज्य इस वक्त सांप्रदायिक और जातीय आधारों पर बेहद विभाजित और ध्रुवीकृत समाज नजर आता है. स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी ने मार्च, 2017 में एक गेरूआधारी महंत को राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर नियुक्त किया. वह खुलेआम सार्वजनिक मंचों से बतौर मुख्यमंत्री ‘गर्व से कहो-हम भारतीय हैं’ के नहीं, ‘गर्व से कहो-हम हिन्दू हैं’ के नारे लगवाते हैं. पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या करने वाले गौरक्षकों को उनकी सरकार के मंत्री और पार्टी के नेता खुलेआम संरक्षण देते हैं. राज्य और धर्म-संप्रदाय के बीच यहां किसी तरह का फर्क नहीं रह गया है. सत्ताधारी दल का मुख्य सामाजिक आधार राज्य की ऊंची हिन्दू जातियों के बीच है. इसके अलावा पिछड़ों के एक हिस्से का भी उसे समर्थन मिल रहा है. राज्य के एक उपमुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग से आते हैं. कई और मंत्री भी पिछड़े वर्ग से हैं. सिर्फ राज्य ही नहीं, केंद्र सरकार में भी बीजेपी नेतृत्व ने पिछड़े वर्ग के कुछ नेताओं को पद दिये हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल पूर्वी उत्तर प्रदेश से ही आती हैं.

दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन है, जिसके साथ राष्ट्रीय लोकदल का जुड़ना भी लगभग निश्चित हो चुका है. सामाजिक आधार के नजरिये से देखें तो इस गठबंधन को कुछ प्रमुख पिछड़ी जातियों, दलितों, मुस्लिम और जाटों के एक हिस्से का समर्थन-प्राप्त है. यूपी की आबादी में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व तकरीबन 19.26 फीसदी है. आमतौर पर यह समुदाय भारतीय जनता पार्टी को सबसे सशक्त चुनौती देने वाले दल या गठबंधन के साथ जाता रहा है. तमाम नाराजगियों के बावजूद दलितों का बड़ा हिस्सा मायावती की बसपा के साथ जाता है. पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली पर इतने बुरे दिनों में भी उसे 19.60 फीसदी वोट मिले थे. सन् 2014 में समाजवादी पार्टी को 22.20 फीसदी वोटों के साथ महज पांच सीटें मिलीं. उपचुनाव में कैराना और गोरखपुर की संसदीय सीटों पर भी पार्टी ने कब्जा किया. उपचुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़ सभी प्रमुख विपक्षी दलों का सपा को समर्थन मिला था. कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव में महज 7.50 फीसदी वोट मिले थे. सीटें सिर्फ दो-अमेठी और रायबरेली. अमेठी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अपनी सीट है और रायबरेली सोनिया गांधी की. सन् 2019 के चुनाव में भी सपा-बसपा ने इन दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं देने का फैसला कर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को राहत दी है.

इस परिदृश्य में कांग्रेस को ‘फ्रंटफुट पर खेलने’ लायक बनाना कोई साधारण काम नहीं है. इसके लिए तो ‘विराट’ जैसे विराट कौशल वाला नेतृत्व और ‘धोनी’ जैसी धुनी शख्सियत चाहिए, जो सियासत की पिच पर सत्ताधारी दल के खिलाफ मुद्दों की बौछार कर सके. क्या कांग्रेस के पास यूपी में ऐसा कौशल है? क्या अनुकूल परिस्थितियां हैं? क्या उसके पास टीम वर्क है? क्या उसके पास हर जिले में कामकाजी संगठन है? राज्य की सियासी हालत का आकलन करें तो इन सारे सवालों के जवाब ‘नहीं’ में हैं. सच बात तो ये है कि यूपी के अधिसंख्य जिलों में कांग्रेस के पास सुंसगत और क्रियाशील संगठन ही नहीं है. पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए हर जगह योग्य उम्मीदवार तक नहीं हैं. पार्टी ने सन् 2009 के संसदीय चुनावों में यूपी में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं किया, फिर भी उसे 18.25 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी को उस चुनाव में वहां महज 17.50 फीसदी वोट मिले थे. केंद्र की सत्ता में होने के बावजूद जब 2014 आया तो कांग्रेस 7.50 फीसदी पर सिमट गई और बीजेपी 42.30 फीसदी तक पहुंच गई. बीते पांच सालों में कांग्रेस ने क्या इस बात का आकलन किया कि यूपी में उसके वोट आधार में इस तरह का पतन क्यों हुआ? बीजेपी को इतनी बड़ी बढ़त कैसे और कहां से मिली?

यह तो सभी जानते हैं कि बीते ढ़ाई दशकों से कांग्रेस का पारंपरिक हिन्दू ऊंची जातियों का आधार उससे लगातार खिसकता गया है. यह बीजेपी की तरफ मुखातिब हुआ और आज पुख्ता ढंग से उसके साथ खड़ा है. लेकिन ऐसा हुआ क्यों? आमतौर पर यूपी में कांग्रेस का वास्तविक नेतृत्व हिन्दू ऊंची जातियों से आए नेताओं के पास ही रहा. दिल्ली स्थित ये नेता यहीं से यूपी का संगठन निर्देशित करते रहे. यदा-कदा ही मुस्लिम या बनिया समुदायों से कुछ नेता प्रभारी बनाये गये. पर वे जमीनी नेता नहीं थे. कांग्रेस के ‘दिल्ली-दरबार’ के नजदीकियों के तौर पर गिने जाते थे. उदाहरण के लिए एक समय सलमान खुर्शीद को प्रदेश का कार्यभार सौंपा गया. वे ज्यादातर दिल्ली ही रहते थे. उऩकी छवि एक जमीनी नेता की बजाय एक इलीट बौद्धिक वकील की थी. मुस्लिम समाज में भी उनकी कोई खास अपील नहीं रही. इसलिए वह मुस्लिम मतदाताओं का छोटा हिस्सा भी सपा से अपनी तरफ खींचने में असमर्थ साबित हुए. कांग्रेस नेतृत्व का मिजाज भी ‘कुलीन सवर्ण हिन्दू’ के दायरे से बाहर नहीं आ सका. अपने उग्र हिन्दुत्व एजेंडे के जरिये बीजेपी ने कांग्रेस के पारंपरिक सवर्ण हिन्दू आधार को पूरी तरह अपने साथ खींच लिया तब भी कांग्रेस लंबे समय तक उसी आधार में जगह बनाने में उलझी रही. उसने अपने लिए वैकल्पिक आधार तलाशने की कोशिश नहीं की. कांग्रेस की इस राजनीतिक अदूरदर्शिता और मूर्खता का भी फायदा बीजेपी को मिला. उसने संघ और अपने अन्य आनुषंगिक संगठनों के जरिये गैर-यादव पिछड़ी जातियों, खासकर कोईरी-कुशवाहा, शाक्य, राजभर और कुर्मी आदि में जगह बनाने की भरपूर कोशिश की. इसके लिए कई इलाकों में स्थानीय स्तर के जाति-आधारित संगठनों से गठबंधन तक किया. इसमें अनुप्रिया पटेल का ‘अपना दल’ और ओमप्रकाश राजभर का ‘सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी’ प्रमुख हैं. अगर कांग्रेस के पास उस वक्त यूपी में सुसंगत और समावेशी सोच के नेता या बौद्धिक सलाहकार होते तो ऐसे संगठनों के साथ मिलकर आगे बढ़ने की योजना को कांग्रेस अमलीजामा पहना सकती थी. कांग्रेस ने एक प्रयोग सपा के वरिष्ठ नेता रहे बेनी प्रसाद वर्मा के नाम पर किया. उनको अपने साथ जोड़ा पर उस समय़ तक वर्मा का राजनीतिक असर और आकर्षण अपने उतार पर था. उनके मुकाबले ‘अपना दल’ की युवा नेता अनुप्रिया पटेल कुर्मी समुदाय को ज्यादा आकर्षित कर रही थीं. उनके पास अपने पिता दिवंगत सोनेलाल पटेल की विरासत भी थी. वह बेनी बाबू के मुकाबले न सिर्फ युवा और गतिशील अपितु ज्यादा असरदार वक्ता भी थीं. अगर कांग्रेस गैर-यादव पिछड़ी जातियों में उस दौर में कुछ ताकत बटोरती तो मुस्लिम समाज का अच्छा-खासा हिस्सा भी उसके साथ आ जुड़ता. सच पूछिये तो इन पिछड़ी जातियों के लोगों को कांग्रेस ने महत्व दिया होता तो संभवतः इनके छोटे-छोटे स्थानीय दल भी नहीं बनते. ऐसे समुदायों और इनके नेताओं को कांग्रेस, सपा या बसपा में वाजिब जगह नहीं मिली, इसीलिए उन्होंने अपने-अपने दल बनाने शुरू किये. पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादवों के बीच भी कांग्रेस के लिए संभावना थी. मुलायम सिंह यादव की पार्टी का आमतौर पर पूर्वी यूपी में बेहतर प्रदर्शन रहा है. लेकिन नेतृत्व में पूर्वी यूपी के नेताओं की हिस्सेदारी नगण्य रही है. कांग्रेस ने इस अंतर्विरोध का भी कभी फायदा उठाने की कोशिश नहीं की. इसकी वजह है-उसका सांगठनिक स्तर पर नाकारा होना. उनके पास संगठन के लिए काम करने वाले लोग कहां थे या हैं? छात्र या युवा हिस्से से जो नये नेता कांग्रेस में शामिल होते हैं, कुछ समय बाद वे भी निराश हो जाते हैं. केंद्रीय नेतृत्व तक उनकी बात का पहुंचना नामुमकिन सा होता है और केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंच के बगैर कांग्रेस में कुछ भी संभव नहीं. यूपी के किसी युवा नेता की बात छोड़िये, कांग्रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले आंध्र के एक वरिष्ठ नेता किशोर चंद्र देव ने हाल ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि पार्टी की कुछ तात्कालिक समस्याओं को लेकर वह पिछले साल नवम्बर महीने से ही केंद्रीय नेतृत्व से मिलने की कोशिश कर रहे थे पर विफल रहे. ऐसे में वह पार्टी में रहकर क्या करेंगे?

इन सबके बावजूद अनेक कांग्रेसियों और कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि प्रियंका के जरिये कांग्रेस यूपी में चमत्कार करेगी. पार्टी अपने बल पर खड़ा हो सकेगी. कुछ का कहना है कि रावर्ट वाड्रा के ‘सरकारी उत्पीड़न’ से भी प्रियंका को फायदा ही होगा!  मुझे लगता है, इस तरह का दावा करने वाले लोग दो बातें भूल रहे हैं. पहली कि भारत की राजनीति सातवें-आठवें दशक की राजनीति से बहुत दूर जा चुकी है. सियासत में चेहरों का महत्व अब भी है लेकिन लुभावने मुद्दों और सामाजिक समीकरणों का उससे भी ज्यादा. जहां तक चेहरों का सवाल है, अपने दौर में नरेंद्र मोदी के मुकाबले अटल बिहारी वाजपेयी बड़ा चेहरा थे. लेकिन उन्हें बीजेपी के शीर्ष नेता के तौर पर वह सफलता कभी नहीं मिली जो सन् 2014 में मोदी को मिली और अनेक राज्यों में भी उसे देखा गया. उसकी बड़ी वजह है, नरेंद्र मोदी का कुछ लुभावने मुद्दों को मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बनाने का कौशल. विपक्षी नेता इसे उनकी ‘जुमला पालिटिक्स’ भी कहते हैं. दूसरा कारण है-मोदी की सोशल इंजीनियरिंग! यह कम विस्मयकारी नहीं कि एक नेता जिसकी राजनीति और अर्थनीति का मूलाधार कारपोरेट और ‘ऊच्च वर्णीय हिन्दू जातियां’ मानी जाती हैं, वह चुनावों में पिछड़ी जातियों के एक हिस्से को भी अपने साथ जोड़ने में समर्थ हो जाता है! क्या कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी महज तीन महीने में लुभावने मुद्दों की बौछार के साथ यूपी में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कोई नया चमत्कार कर सकेंगी? कांग्रेस ने इस तरह का प्रयोग अब से तीन-चार साल पहले किया होता तो शायद कुछ संभावना बनती! आज की तारीख में देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उसके पास एक ही विकल्प हैः वह अपने धुर-विरोधी बीजेपी गठबंधन को शिकस्त देने के लिए अन्य ताकतवर विपक्षियों के साथ रणनीतिक सहयोग या सहकार करे! ‘फ्रंटफुट पर खेलने’ के लिए उसे यूपी में सृजनात्मक राजनीतिक प्रयोग (पिछले विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर के सहकार जैसा नहीं!) करने होंगे और लगातार पांच साल जमकर सांगठनिक काम करना होगा! क्या वह इसके लिए तैयार है?

(अपने तीन दशक लंबे पत्रकारिता जीवन में उर्मिलेश ने 'नवभारत टाइम्स' और 'हिन्दुस्तान' जैसे प्रमुख हिन्दी अखबारों में लंबे समय तक काम किया. वह राज्यसभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक भी रहे.)

 
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