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आईटी नियमों से फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन को जो खतरा दूर से था, संशोधन के बाद एकदम पास आ गया है

केंद्र सरकार ने 6 अप्रैल को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्‍यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 यानी आईटी नियम 2021 में संशोधन की गजेट अधिसूचना जारी की. इसी संशोधन पर इस समय बहस छिड़ी हुई है और चिंताएं जाहिर की जा रही हैं. ये चिंताएं क्‍या हैं और क्‍यों अहम हैं, इन्‍हें समझने के लिए दो साल पीछे जाना पड़ेगा जब सरकार डिजिटल मीडिया पर सूचनाओं के नियमन के लिए आइटी कानून लाने की तैयारी कर रही थी.

आईटी नियम की पृष्‍ठभूमि

हमारे यहां तीन तरह के डिजिटल सूचना मंच मौजूद हैं. एक वे मंच हैं जिनका मूल कारोबार अखबार या टीवी का है और वे वेबसाइट भी चलाते हैं. दूसरे विशुद्ध डिजिटल सूचना मंच हैं. तीसरे ओटीटी मंच हैं. इन मंचों पर सूचना को नियमित करने की बात तो यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल से ही चल रही थी और नियमन की आलोचना भी उद्योग की ओर से लगातार होती रही है. इसमें कुछ नया नहीं है. मीडिया की नुमाइंदगी करने वाले संगठनों का हमेशा से कहना रहा है कि सरकार की तरफ से नियमन ठीक नहीं है. खुद मीडिया को स्‍वनियमन करना चाहिए और उसकी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए. टीवी चैनलों के लिए बनाई गई एनबीएसए जैसी इकाइयां इसी का उदाहरण हैं जो अपना काम करने में नाकाम रहीं, क्‍योंकि उनका नियमन चैनलों के लिए बाध्‍यकारी कभी नहीं रहा. बीते दस साल में सोशल मीडिया के आ जाने से सूचनाओं की बाढ़ आ गई और हर उपभोक्‍ता प्रभावी तौर पर एक पत्रकार की भूमिका में आ गया. किसी भी सोशल मीडिया मंच (मध्‍यवर्ती) पर खाता रखने वाला उपभोक्‍ता सूचनाएं डालने लगा. नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे सही और गलत सूचना का फर्क मिटता गया.

इसके बावजूद एक सिद्धांत के तौर पर मध्‍यवर्ती मंचों की सुरक्षा कायम रही. इंटरनेट की विकास यात्रा में मध्‍यवर्ती की सुरक्षा एक अहम सिद्धांत है. इसका वैश्विक आधार है अमेरिका के कम्‍युनिकेशंस डीसेंसी एक्‍ट, 1996 की धारा 230, जो साफ तौर से उपयोगकर्ता द्वारा पोस्‍ट की गई सामग्री के संबंध में मध्‍यवर्ती यानी ऑनलाइन सेवाओं को प्रतिरक्षा प्रदान करती है. इसे मध्‍यवर्तियों (इंटरमीडियरी) के लिए ‘सेफ हार्बर’ का सिद्धांत कहते हैं. इसी के मद्देनजर जब दो साल पहले आईटी नियम, 2021 बना तो डिजिटल मीडिया मंचों को स्‍वनियमन के लिए अपने-अपने एसोसिएशन बनाने को कहा गया. जाहिर है, यह संसद से पास कानून नहीं था इसलिए एसोसिएशन के निर्माण की कसौटी भी बहुत साफ नहीं थी. फिर भी, पिछले साल तक ऐसे पांच एसोसिएशन (जैसे डिजिपब) सरकार से मान्‍यता दिए जा चुके थे. आईटी नियम, 2021 के आने से पहले भी चिंताएं यहीं थीं कि सरकार डिजिटल मीडिया मंचों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है क्‍योंकि किसी भी सूचना पर देश में कोई भी आहत व्‍यक्ति/पाठक शिकायत दर्ज करवा सकता था. उस समय गनीमत यह थी कि मीडिया और सरकार के बीच में सरकार द्वारा पंजीकृत ये एसोसिएशन खड़े थे, जिससे उम्‍मीद थी कि बहुत दबाव नहीं पड़ेगा. इन एसोसिएशनों को उन शिकायतों पर संज्ञान लेना था. अपील की व्‍यवस्‍था तीन स्‍तरीय थी. सरकार की बनाई समिति सबसे बाद में आती थी. 

नए संशोधन के खतरे

6 मार्च को अधिसूचित संशोधन में यही तीन स्‍तरीय व्‍यवस्‍था खत्‍म कर दी गई है. अब सीधे सरकार एक फैक्ट चेक इकाई अपने यहां बनाएगी. वह इकाई केंद्र सरकार के किसी भी कारोबार, मंत्री, मंत्रालय के संबंध में अपने द्वारा पाई गई ‘नकली या असत्‍य या भ्रामक’ सूचना पर एसोसिएशन या मध्‍यवर्ती से कह सकती है कि वह उक्‍त मंच को सेंसर करे जिस पर उक्‍त सूचना छपी है. मूल आईटी नियम 2021 में ऐसा नहीं था. अगर मध्‍यवर्ती या एसोसिएशन ने सरकार की बात को मानने से इनकार कर दिया तो सरकार उस मध्‍यवर्ती या ए‍सोसिएशन का पंजीकरण रद्द कर सकती है या प्रभावित मंत्रालय इत्‍यादि उक्‍त इकाई पर मुकदमा कर सकते हैं. इस तरह कुल मिलाकर न केवल ‘सेफ हार्बर’ का सिद्धांत खतरे में पड़ जाता है बल्कि ‘स्‍वनियमन’ के संदर्भ में बनाए गए एसोसिएशन की प्रासंगिकता भी खत्‍म हो जाती है. इसका संक्षेप में मतलब यह होगा कि जो सरकार की तथ्‍य जांच इकाई को सही या गलत लगेगा उसके आधार पर कार्रवाई होगी.

यानी 2021 से लेकर अब तक देखें, तो जो प्रक्रिया डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए शुरू की गई थी प्रस्‍तुत संशोधन उसी का विस्‍तार हैं लेकिन अबकी शिकंजा एकदम गले तक आ गया है. पहले थोड़ी सांस लेने की गुंजाइश छोड़ी गई थी. सैद्धांतिक और व्‍यावहारिक के अलावा आईटी कानून के संशोधन में जो तकनीकी दिक्‍कतें हैं, वे अपनी जगह जायज हैं. मसलन, अव्‍वल तो नए आईटी नियम 2021 संसद से नहीं, बल्कि सन 2000 के आईटी कानून की धारा 79 के तहत बनाए गए थे. आईटी कानून की धारा 66ए, जिसके तहत ज्‍यादातर गिरफ्तारियां बीते पंद्रह वर्षों में हुई हैं, उसे खत्‍म करने के अपने फैसले में (श्रेया सिंघल का मुकदमा) सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 79 और आईटी कानून के अंतर्गत मध्‍यवर्ती को किसी गैरकानूनी कृत्‍य के बारे में या तो कोर्ट निर्देश या फिर सरकारी अधिसूचना द्वारा सूचित किया जाना अनिवार्य होगा. अभिव्‍यक्ति की आजादी पर संविधान के अनुच्‍छेद 19 के पदबंध दो में जो बंदिश लगाई गई है, यह उसी के अनुकूल है. अब चूंकि अनुच्‍छेद 19(2) में ‘नकली या असत्‍य या भ्रामक’ सूचना की शब्‍दावली ही नहीं है तो खतरा यह है कि इस शब्‍दावली का कोई भी अर्थ निकाला जा सकता है. खुद, ताजा संशोधन में ‘नकली या असत्‍य या भ्रामक’ को परिभाषित नहीं किया गया है. यानी यहां साफ तौर पर हित टकराव का खतरा है.

‘नकली या असत्‍य या भ्रामक’ की परिभाषा का अभाव

इसमें कोई दो राय नहीं कि इंटरनेट, मध्‍यवर्ती मंच और वेबसाइटों सहित फैक्‍ट चेक करने वाले मंच खुद फर्जी सूचनाओं का प्रसार करते हैं. इसके बावजूद यह ध्‍यान में रखा जाना होगा कि पत्रकारिता में सरकार के बारे में दर्जनों सूचनाएं रोज छापनी होती हैं. अगर सरकार ही जज और मुंसिफ दोनों बन जाए तो जाहिर है गला मीडिया का ही कटना है. कायदे से होना यह चा‍हिए था कि एक व्‍यापक परामर्श की प्रक्रिया को चलाकर दो साल पहले आईटी नियम संसद के रास्‍ते लाए जाते और एक न्‍यूट्रल इकाई को जज बनाया जाता जो सरकार या मीडिया के प्रभाव से अछूती रहती. इसके बजाय, सरकार ने तथ्‍य जांचने की लगाम अपने ही हाथ में ले ली. विडंबना यह है कि फैसला सरकार की कमेटी करेगी कि क्‍या गलत है और दंड मीडिया के एसोसिएशन और मध्‍यवर्ती मंच से दिलवाएगी. किसी ने मना किया, तो वो नपेगा.

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो नागरिक या पत्रकार या उपभोक्‍ता लिख रहे हैं, उन्‍हें सरकार ने यह बताया ही नहीं है कि ‘नकली या असत्‍य या भ्रामक’ सूचना क्‍या होती है. एक अपरिभाषित अपराध के लिए सजा की जमीन तैयार कर दी गई है. यानी अब जान-बूझ कर और अनजाने में फेक न्‍यूज़ फैलाने वाला सरकार की निगा‍ह में एक है क्‍योंकि ‘फेक’ क्‍या है यह तय करने का पैमाना लिखने वाले को नहीं पता है. खुद सरकार में नियम का अनुपालन करवाने वालों को यह नहीं पता. ऐसे में सवाल उठता है कि कौन तय करेगा क्‍या सही है और क्‍या गलत, और इसकी कसौटी क्‍या होगी? इसका जवाब तो सत्‍ता शीर्ष ही दे सकता है, जिसे फेक न्‍यूज़ की इतनी ज्‍यादा चिंता है.

बाकी, मीडिया, मध्‍यवर्तियों और मीडिया उपभोक्‍ताओं की चिंता का कोई खास अर्थ इसलिए नहीं है क्‍योंकि वे चाहे कुछ भी लिखें, वे नहीं जान रहे होंगे कि वे कर क्‍या रहे हैं और उनके कर्म का फल क्‍या होगा.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है)

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