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यूपी में OBC आरक्षण खत्म होने से बीजेपी को होगा कितना बड़ा नुकसान?

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के तय किए ओबीसी आरक्षण को हाइकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के बाद सियासी घमासान छिड़ गया है. विपक्ष इस बात को लेकर बीजेपी सरकार पर हमलावर है कि उसने आरक्षण तय करने में जानबूझकर अनियमितता बरती और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए फॉर्मूले को नहीं अपनाया. हालांकि विपक्ष तो इसे आरक्षण खत्म करने की बीजेपी की सोची-समझी साजिश का नतीजा भी बता रहा है, लेकिन इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच के इस फैसले को योगी सरकार के लिए बड़ा झटका इसलिए भी माना जा रहा है कि वह ओबीसी वोटों के दम पर ही दोनों बार सत्ता में आई है.

हाइकोर्ट ने बगैर आरक्षण के ही नगर निकाय के चुनाव तत्काल कराने के निर्देश दिए हैं, जिसके ख़िलाफ योगी सरकार अब सुप्रीम कोर्ट जाने की दलील देते हुए ओबीसी समाज के गुस्से को शांत करने की कवायद में जुट गई है. जाहिर है कि इस कानूनी लड़ाई में नगर निकाय के चुनाव कुछ महीने के लिए टल जाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक आरक्षण देने से पहले ट्रिपल टेस्ट का फॉर्मूला नियमों के मुताबिक आखिर क्यों नहीं अपनाया? क्या इसके पीछे कोई राजनीति थी या फिर सचमुच इस कानूनी को प्रक्रिया को अपनाने में अनायास ही कोई चूक हुई है? वजह चाहे जो रही हो लेकिन विपक्ष को इस मुद्दे पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने का मौका मिल गया है और बीजेपी को तमाम सफाई देते हुए अपनी सरकार का बचाव करना पड़ रहा है.

हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा है कि बिना ओबीसी आरक्षण के निकाय चुनाव नहीं होगा और सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है. वैसे भी सरकार को अपनी गलती दुरुस्त करने और आरक्षण के आधार पर चुनाव कराने के लिए अब शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना ही होगा.

उन्होंने ये भी कहा कि प्रदेश सरकार नगरीय निकाय सामान्य निर्वाचन के परिप्रेक्ष्य में एक आयोग गठित कर ट्रिपल टेस्ट के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग के नागरिकों को आरक्षण की सुविधा उपलब्ध कराएगी. इसके बाद ही नगरीय निकाय चुनाव को सम्पन्न कराया जाएगा, लेकिन सरकार को ये काम तो आरक्षण सूची जारी करने से पहले ही ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला के तहत करना चाहिए था, जो उसने नहीं किया और पूरा मामला कानूनी लड़ाई में बदल गया.

दरअसल, पिछले महीने के अंत में सरकार ने नगर निकाय चुनाव की सीटों की आरक्षण सूची तैयार की थी जिसकी अधिसूचना 5 दिसम्बर को जारी की गई थी.सरकार की इस सूची के खिलाफ हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें कहा गया कि सरकार ने ओबीसी आरक्षण जारी करने के लिए जरुरी ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला नहीं अपनाया है, लिहाजा इस सूची को ख़ारिज किया जाए.चूंकि इस मोर्चे पर चूक तो सरकार की तरफ से ही हुई थी, इसलिए अदालत में उसकी कोई दलील काम नहीं आई और हाइकोर्ट ने उस आरक्षण सूची को रद्द करते हुए उन सभी सीटों को सामान्य सीटों में बदलने का फैसला सुना दिया.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देष पर ट्रिपल टेस्ट का जो फॉर्मूला है,उसके मुताबिक राज्य सरकार को एक आयोग बनाना होगा, जो अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट देगा और उसके आधार पर ही आरक्षण लागू होगा. आरक्षण देने के लिए तीन स्तर पर मानक रखे जाएंगे जिसे ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला कहा गया है. इस टेस्ट में सबसे पहले ये देखना होगा कि राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग की आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति है? उनको आरक्षण देने की जरूरत है या नहीं? और ये भी कि उनको आरक्षण दिया भी जा सकता है या नहीं? 

साथ ही ये भी ध्यान रखना था कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से अधिक ना हो. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्देश में ये भी कहा था कि ओबीसी को आरक्षण देने के लिए अगर ट्रिपल टेस्ट नहीं अपनाया गया, तो अन्य पिछड़ा वर्ग की सीटों को अनारक्षित यानी सामान्य श्रेणी में ही माना जाएगा. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले को आधार मानते हुए हाई कोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा जारी ओबीसी आरक्षण को रद्द किया है.

सरकार की तरफ से हुई इस चूक को विपक्ष ने बड़ा सियासी औजार बना लिया है.विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि आरक्षण विरोधी बीजेपी नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के मामले पर अब घड़ियालू सहानभूति दिखा रही है.लेकिन ओबीसी समुदाय उसका असली चेहरा पहचान चुका है.वहीं बीएसपी सुप्रीमो मायावती के मुताबिक हाईकोर्ट का ये फैसला बीजेपी और उनकी सरकार की ओबीसी और आरक्षण विरोधी सोच को प्रकट करता है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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