मंडी में भाव गिरे, PM-AASHA योजना बनेगी सहारा
मंडियों में फसलों के रेट अचानक धड़ाम होने से क्या अब भी आपका भारी नुकसान हुआ है. तो सरकार ने अब इस इस घाटे से बचाने के लिए कर दी है पूरी व्यवस्था. MSP से कम पर बिकी फसल तो भी खाते में आएंगे पूरे पैसे.

फसल कटाई के सीजन में जब मंडियों में माल की आवक अचानक बढ़ जाती है. तो अक्सर दालों, तिलहन और दूसरी फसलों के रेट न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP से भी नीचे चले जाते हैं. ऐसे में किसानों को भारी घाटा उठाकर मजबूरी में अपनी फसल बहुत सस्ते दामों में बेचनी पड़ती है.
किसानों को इस तरह की मजबूरी में बिक्री से बचाने और उनकी फसल की सही कीमत दिलाने के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी PM-AASHA योजना बड़े काम आती है. जिससे किसानों को कम रेट के चलते नुकसान नहीं उठाना पड़ता.
इस योजना का मकसद है कि मंडी में चाहे रेट कितने भी गिर जाए. लेकिन किसान को उसकी मेहनत से उगाई गई फसल की के सही दाम यानी तय एमएसपी जरूर मिले. चलिए आपको बताते हैं कि यह स्कीम कैसे काम करती है और किसानों को इसका फायदा किस तरह मिलता है.
ऐसे मिलता है किसानों को फायदा
पीएम-आशा स्कीम में प्राइस सपोर्ट स्कीम का अहम काम होता है. जब भी मार्केट में दालों, तिलहन और सूखे नारियल के रेट एमएसपी से नीचे गिरते हैं. तो सरकार सीधे मंडियों में उतरकर खुद खरीदारी शुरू कर देती है. यह खरीदारी नैफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) जैसी केंद्रीय एजेंसियों के जरिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर की जाती है.
सरकार ने दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए एक बड़ा फैसला यह लिया है कि अरहर, उड़द और मसूर की खरीद पर लगी 25 परसेंट वाली पुरानी कैप हटाकर 100 परसेंट खरीद की खुली छूट दे दी है. इसका मतलब है कि किसान अपनी पूरी अरहर, मसूर या उड़द की फसल को सीधे सरकारी खरीद केंद्रों पर तय एमएसपी रेट पर बेच सकते हैं. इससे खुले बाजार के प्राइवेट व्यापारियों पर भी सही रेट देने का दबाव बनता है.

रेट में घाटा होने पर सीधा खाते में आएगा पैसा
कई बार सरकारी खरीद केंद्र काफी दूर होते हैं या किसान अपनी फसल खुले बाजार में ही बेचना चाहता है. ऐसी सिचुएशन के लिए पीएम-आशा स्कीम में प्राइस डेफिसिएंसी पेमेंट स्कीम (PDPS) यानी रेट के अंतर की भरपाई करने वाला सिस्टम मौजूद है. यह तिलहन की खेती करने वाले किसानों के लिए बहुत काम का मॉडल है. इसमें सरकार को खुद फसल स्टोर करने की जरूरत नहीं पड़ती.
किसान अपनी तय फसल को रजिस्टर्ड मंडी में चल रहे नॉर्मल रेट पर बेच देता है. इसके बाद फसल के एमएसपी और मंडी में मिले असल सेलिंग प्राइस के बीच का जो भी गैप होता है. उस गैप की भरपाई के पैसे सरकार सीधे किसान के बैंक अकाउंट में डीबीटी के जरिए ट्रांसफर कर देती है. इससे किसान को बिना किसी ज्यादा मशक्कत के एमएसपी की पूरी रकम मिल जाती है.

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मार्केट इंटरवेंशन स्कीम और डिजिटल सिस्टम से फायदा
पीएम-आशा के तहत मार्केट इंटरवेंशन स्कीम भी शामिल है. जो जल्दी खराब होने वाली सब्जियों, फलों और गैर-एमएसपी फसलों के लिए काम करती है. जब बंपर पैदावार के चलते मंडियों में सब्जियों और फलों के रेट पिछले सीजन के मुकाबले 10 परसेंट से ज्यादा गिर जाते हैं. तब सरकार मार्केट में दखल देकर खरीद शुरू कराती है. स्कीम में बिचौलियों का खेल खत्म करने के लिए ई-समृद्धि, ई-संयुक्त और राष्ट्रीय कृषि बाजार जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को जरूरी कर दिया गया है.
आधार वेरिफिकेशन और जमीन के ऑनलाइन रिकॉर्ड लिंक होने की वजह से पेमेंट का पूरा पैसा सीधे किसान के खाते में बिना देरी पहुंचता है. अगर अब तक किसी किसान को इस योजना के बारे में नहीं पता था. तो वह किसान तुरंत ही अपने नजदीकी खरीद केंद्र या फिर पोर्टल पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन करवा ले. उसके बाद ही इस स्कीम का फायदा मिल सकेगा.
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