यूपी में सवर्ण मतदाताओं की क्या है अहमियत, किसकी ओर होगा इनका झुकाव
बात पिछले लोकसभा चुनाव की करें तो, बीजेपी सहयोगी दलों के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 संसदीय सीटों पर कब्जा करने में कामयाब रही थी। इस जीत में सवर्ण मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा।

लखनऊ, एबीपी गंगा। सियासी दरवारों में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के नाम के ढोल-नगाड़े तो खूब बजाए जाते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में सवर्णों को साधकर चलना भी उतना ही जरूरी है। यहां की 20 फीसदी सवर्णों की आबादी चुनावी हवा का रुख मोड़ने में सक्षम हैं। 23 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश की तकरीबन 40 संसदीय सीटों पर सवर्णों की निर्णायक भूमिका रहती है। सवर्ण मतदाताओं की अहमियत का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि खुद को दलितों की हितैशी बताने वाली मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी (BSP) भी 2007 में सवर्णों को साथ मिलाकर सरकार बना चुकी हैं।
पिछले चुनाव में 73 सीटों पर खिला कमल
बात पिछले लोकसभा चुनाव की करें तो, बीजेपी सहयोगी दलों के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 संसदीय सीटों पर कब्जा करने में कामयाब रही थी। इस जीत में सवर्ण मतदाताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा।
37 सीटों पर जीत के पीछे सवर्ण मतदाता
ऐसा माना जा रहा है कि जिन 73 सीटों पर पिछले चुनाव में कमल खिला, उनमें से 37 सीटों पर भाजपा की जीत का परचम लहराने में इन्हीं सवर्ण (Upper Caste Voters) मतदाताओं ने अहम भूमिका अदा की थी।
2017 विधानसभा चुनाव में BJP की बंपर जीत के पीछे सवर्ण
इतना ही नहीं, 2017 के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के पीछे भी सवर्ण मतदाताओं का भारी समर्थन रहा। इस चुनाव में सर्वाधिक 44 फीसदी यानी सवा सौ से अधिक सवर्ण विधायक जीते और विधानसभा पहुंचे। सीधे कहा जाए, तो 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशियों की जीत या हार के पीछे 50 फीसदी सवर्ण मतदाताओं का योगदान रहा। यहां तक की निकाय चुनाव में भी बीजेपी ने सवर्ण मतदाताओं के दम पर वर्चस्व कायम किया।

सवर्ण मतदाताओं के आंकड़ों पर नजर
2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रदेश की वर्तमान अनुमानित आबादी 23.11 करोड़ हैं। हालांकि इसमें सवर्णों की आबादी का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो दर्ज नहीं हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि सूबे में तकरीबन 20 फीसदी आबादी सवर्णों की है।
20% में सर्वाधिक ब्राह्मण
सर्वाधिक लगभग 12-13 % ब्राह्मण 3-4% क्षत्रिय 2-3% वैश्य 1-2% त्यागी-भूमिहार
सवर्णों को 10% आरक्षण, कितना रहेगा लाभकारी?
पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत में युवा मतदाताओं का भी अहम रोल रहा था। इस चुनाव में भी युवाओं की निर्णायक भूमिका रहेगी। किसी प्रकार का आरक्षण न मिलने से गरीब सवर्ण युवाओं में हमेशा सरकार के प्रति रोष रहा है, लेकिन मौजूदा मोदी सरकार ने उनकी नाराजगी को साधते हुए 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू कर दी। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर गरीब सवर्णों के दिए गए 10 फीसदी आरक्षण को सवर्ण युवाओं को साधने की तौर पर देखा जा रहा है।
SC-ST एक्ट में संशोधन से सवर्ण नाराज
भले ही गरीब सवर्णों को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला मोदी सरकार ने लिया हो, लेकिन एसटी-एसटी एक्ट में संशोधन के चलते ये मतदाता वर्ग बीजेपी से खासा नाराज भी हैं। इस नाराजगी का खामियाजा बीजेपी ने तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़) से अपनी सत्ता गंवा कर झेली भी हैं। ऐसे में ये मुद्दा चुनाव में बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
आबादी
20 फीसदी सवर्ण अनुसूचित जाति की आबादी 4.14 करोड़ (लगभग 21%) अनुसूचित जनजाति की आबादी 11.34 लाख (0.6%) 44 % जनसंख्या ओबीसी की मानते हैं जानकार 19 % मुस्लिम आबादी में दलित व पिछड़े मुस्लिम भी शामिल
आसान नहीं होगा पुराना प्रदर्शन दोहराना
साथ ही, इस बार सपा-बसपा और रालोद गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में बीजेपी का विजय रथ रोकने के लिए उतरे हैं। ऐसे में इस बार बीजेपी के लिए राज्य में अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराना आसान नहीं होगा।
सवर्णों के बल पर सरकार बना चुकी हैं बसपा
यूपी में सवर्णों का क्या प्रभाव है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2007 में सवर्णों का साथ मिलने से बसपा भी सूबे में बहुमत की सरकार बना चुकी है। हालांकि पिछले एक दशक से सवर्णों से बसपा से दूरी बना रखी है। लेकिन अब एक बार फिर पार्टी सुप्रीमो मायावती सवर्णों को साधने की कोशिश में जुटी हैं।
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL























