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'चुनाव के समय मुंह दिखाते हैं नेता', सरगुजा के इस गांव में नहीं पहुंचा विकास, लड़कों की नहीं हो रही शादी

Balrampur News: बछवार गांव में अगर कोई महिला गर्भवती होती है और प्रसव का समय नजदीक होता है तो लोग महिलाओं को खाट पर लादकर पहाड़ से किसी तरह अस्पताल तक लेकर जाते हैं.

Chhattisgarh News: लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों के नेता एक्टिव मोड़ पर हैं. प्रत्याशी अपने-अपने संसदीय क्षेत्र की जनता से भेंट मुलाकात करने में जुटे हुए है. ऐसे में छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में एक ऐसा गांव है जहां चुनाव के दिनों में नेताओं के कदम पड़ते है लेकिन जीतने के बाद मुंह तक नहीं दिखाते. इस 

गांव में आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. जिसकी वजह से गांव में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीणों का जीवन परेशानियों से घिरा हुआ है. 

बीमार होने का डर हमेशा बना रहता है
बिजली नहीं होने से रात के समय सांप-बिच्छू का डर, जबकि ढोढी का पानी पीने से बीमार होने का डर हमेशा बना रहता है. इसके अलावा ग्रामीण चुनाव में वोटिंग करने अपने गांव से 10 किलोमीटर दूर पोलिंग बूथ तक पहुंचते है. मामला बलरामपुर जिले के बछवार गांव का है.

पगडंडी बनाकर आना जाना करते है
दरअसल, बलरामपुर जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बछवार गांव बसा है. इस गांव की आबादी करीब 150 है. जिसमें से 70 वोटर है. इस आधुनिक युग में पहाड़ी पर बसे बछवार गांव में सड़क नहीं है, लोग पहाड़ी पर ही पगडंडी बनाकर आना जाना करते है. बिजली नहीं है, जिससे यहां के लोगों की अंधेरे में रात गुजरती है. सरकार ने अब केरोसिन भी देना बंद कर दिया है ऐसे में यहां के ग्रामीणों के लिए रात का वक्त खतरे से खाली नहीं रहता.

वोटिंग करने के लिए जाना पड़ता 10 किलोमीटर दूर 
इसके अलावा गांव में एक हैंडपंप तक नहीं है, ग्रामीण कुआं, ढोढ़ी का पानी पीते है. जिससे बीमार होने का खतरा बना रहता है. बछवार गांव के ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें राशन लेने और वोटिंग करने के लिए 10 किलोमीटर दूर दूसरे गांव में जाना पड़ता है, रास्ते में उन्हें नाला और पहाड़ी के घाट का सामना करना पड़ता है. ऐसे में उन्हें अपने घर से राशन लेने जाने के दौरान एक घंटे का समय लगता है और आने के लिए भी एक घंटे का समय लगता है. 

केरोसिन भी अब नहीं मिलता है
बछवार गांव में अगर कोई महिला गर्भवती होती है और प्रसव का समय नजदीक होता है तो लोग महिलाओं को खाट में ढोकर पहाड़ से किसी तरह अस्पताल तक लेकर जाते हैं. वहीं बिजली के अभाव में यहां के बच्चे रात में पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि केरोसिन भी अब नहीं मिलता है, जिससे पहले यहां के लोग दीपक जलाते थे. इसके साथ ही इस गांव में कई युवा अब भी कुंवारे हैं क्योंकि यहां सड़क, बिजली और पानी नहीं होने की वजह से कोई भी लड़की इस गांव में शादी नहीं करना चाहती हैं. 

अब तक कोई पहल ही नहीं किया
हद तो यह है कि यहां तक पहुंचने के लिए सड़क का निर्माण पहाड़ को काटकर बनाया जा सकता है लेकिन जिम्मेदारो ने इसके लिए अब तक कोई पहल ही नहीं किया. वहीं यहां के ग्रामीण साफ कहते हैं कि अगर वे गांव छोड़ते हैं तो उनके सामने खेती की जमीन की समस्या होगी, क्योंकि सरकार उन्हें मकान तो उपलब्ध करा देगी, लेकिन वे जीविकोपार्जन कैसे करेंगे.

दो-तीन दिन में शिक्षक एक दिन जाते हैं
बछवार गांव में स्कूल का बिल्डिंग भी नहीं है. ऐसे में यहां अस्थाई शेड बनाकर स्कूल बनाया गया है लेकिन शिक्षक भी यहां रोज नहीं पहुंच पाते हैं. ऐसे में दो-तीन दिन में शिक्षक एक दिन जाते हैं. वहीं शिक्षक अगर यहां रहकर पढ़ाना चाहे तो रहने के लिए मकान नहीं है. वहीं यहां के ग्रामीण भी राशन लेने के लिए 10 किलोमीटर पैदल चलते हैं और राशन को कांवर में ढोकर पहाड़ को चढ़ते हैं और अपने घरों तक पहुंचते हैं. 

अफसर हमेशा बजट का रोना रोते हैं
इस गांव की समस्या की जानकारी बलरामपुर जिले में पदस्थ होने वाले हर कलेक्टर को रहता है, लेकिन इसके बाद भी किसी भी अफसर ने यहां कच्ची सड़क निर्माण तक के लिए कोई पहल नहीं किया, जबकि सरकारें आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए बजट की किसी भी तरह से कमी नहीं होने की बात करते हैं, लेकिन अफसर हमेशा बजट का रोना रोते हैं.

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