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बिहार: बीते 10 सालों में 50 ग्राम प्रधानों की हत्या, पुलिस के लिए पंचायत चुनाव की रंजिश बड़ी बनी चुनौती

बिहार में बीते लगभग एक साल में कई ग्राम प्रधानों की हत्या हो चुकी है. पंचायत चुनाव की रंजिश की आग पूरे 5 साल तक धधकती रहती है.

बिहार के गोपालगंज जिले के फुलगुनी पंचायत के मुखिया मोहम्मद कुरैशी की 9 फरवरी की सुबह करीब 8 बजे गोली मारकर हत्या कर दी गई. मोहम्मद कुरैशी पर दो बंदूकधारियों ने गोली चलाई. वहीं 2 फरवरी को बेगूसराय जिले के पर्णा पंचायत के मुखिया बीरेंद्र कुमार शर्मा की चार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी.

मुखिया मोहम्मद कुरैशी की हत्या के मामले में दो दिन बाद तीन संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तारी के बाद तीनों संदिग्धों ने पंचायत के पूर्व मुखिया महफूज अंसारी की तरफ हत्या का इशारा किया. 

पुलिस के मुताबिक कुरैशी पिछले 13 महीनों में राज्य में मारे गए दसवें ग्राम प्रधान हैं . वहीं एक सप्ताह में थावे पुलिस स्टेशन क्षेत्र में मुखिया यानी ग्राम प्रधान की हत्या की यह दूसरी घटना है.  इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 सालों में बिहार के 50 ग्राम प्रधानों की हत्या हो चुकी है.

बिहार में 8,000 से ज्यादा पंचायतें हैं. दिसंबर 2021 में अलग-अलग पंचायत पदों के लिए चुनाव कराए गए थे. मुखिया का चुनाव पांच साल के लिए होता है. यानी 2026 में अगला पंचायत चुनाव फिर से होगा. 
 

मुखिया की हत्या से बिहार सरकार भी परेशान

नवनिर्वाचित प्रधानों और दूसरे पंचायत प्रतिनिधियों की लगातार हो रही हत्या से बिहार सरकार भी परेशान है. सरकार ने अपराधियों पर जल्दी सुनवाई और उनकी जमानत में देरी करने की योजना बनाना शुरू कर दिया है. सरकार ने यह फैसला पांच मुखिया, एक सरपंच और एक वार्ड पार्षद की हत्या के बाद लिया था. इन सभी की इनके राजनीतिक विरोधियों ने हत्या की या करवा दी.  

बिहार में पिछले साल मारे गए मुखिया

बिहार में दिसंबर 2021 में पंचायत चुनाव हुए थे. पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद विजेता उम्मीदवारों में से पांच मुखिया सहित सात पंचायत प्रतिनिधियों की उनके प्रतिद्वंद्वियों ने कथित तौर पर गोली मारकर हत्या कर दी थी. 

पिछले साल यानी साल 2022 में बिहार की राजधानी पटना में दो प्रधानों की हत्या कर दी गई. वहीं आरा, जमुई और मुंगेर जिलों में एक-एक प्रधान की हत्या कर दी गई. रोहतास में एक उपसरपंच की हत्या कर दी गई, दूसरी तरफ पटना के नौबतपुर इलाके में भी एक वार्ड पार्षद की हत्या साल 2022 में ही कर दी गई . 

 मुखिया की हत्या के दर्दनाक किस्से

पटना के फरीदपुर पंचायत के मुखिया नीरज कुमार की हत्या बहुत ही भयानक तरीके से की गई थी. मोटरसाइकिल सवार तीन युवकों ने हाथ जोड़कर नीरज को नमस्ते कहा और फिर गोली मारकर नीरज हत्या कर दी. नीरज की मौत मौके पर ही हो गई थी. 

बिहार के भोजपुर जिले के चरपोखरी थाना क्षेत्र के भलुआना गांव के मुखिया संजय सिंह की मौत भी दर्दनाक थी. चुनाव जीतने के बाद संजय सिंह ग्रामीणों को धन्यवाद देने के बाद अपनी बाइक से घर लौट रहे थे. सुनसान रास्ते पर एम्बुलेंस सवार बंदूकधारियों ने उनका रास्ता रोक दिया और उन पर गोलियों की बरसात कर दी. संजय सिंह की मौत मौके पर ही हो गई. 

नया नहीं है सरपंचो की जान पर मंडराने वाला खतरा 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अधीन गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि राज्य में ग्राम प्रधानों पर मंडराने वाला खतरा कोई नया नहीं है. इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए बॉडीगार्ड की मांग भी समय समय पर की जाती रही है. मीडिया छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अरवल जिले की एक पंचायत के मुखिया अखियार खान ने ये कहा 'हमने अपनी जान के खतरे का हवाला देते हुए बार-बार अंगरक्षकों की मांग की है, लेकिन हमें नजरअंदाज कर दिया गया है'.

औरंगाबाद जिले के हसपुरा ब्लॉक पंचायत के मुखिया छोटू सिंह ने बताया कि कोई भी मुखिया सुरक्षित नहीं है. हमारी जान को खतरा है, क्योंकि हम जमीन पर काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार शायद ही हमें सुरक्षा प्रदान करने की जहमत उठाती है'. गया, जहानाबाद, जमुई, मुंगेर, सीतामढ़ी, रोहतास, नवादा, शिवहर, औरंगाबाद और अरवल जैसे कुछ जिलों में ग्राम प्रधान माओवादियों की धमकियों से भी डरते हैं. 

10 सालों में बढ़ा पंचायत प्रतिनिधियों की हत्या का आंकड़ा

द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों का कहना है कि नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों की हत्या हमारे लिए गंभीर परेशानी का सबब है. 10 सालों में ग्राम प्रधानों को जान से मारने की घटनाएं भी बढ़ी हैं.  घटनाओं को देखते हुए हत्या के आरोपियों के खिलाफ तीन महीने के भीतर त्वरित सुनवाई करने की योजना बनाई है. गृह विभाग के अधिकारियों से कहा गया है कि जान को खतरा बताने वाले किसी भी प्रतिनिधि को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जाए. 

सरकार इस दिशा में क्या कर रही है

स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने ये कहा है कि बिहार पंचायत में कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में से 90 प्रतिशत नए चेहरे हैं. ऐसे में उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना स्थानीय प्रशासन और सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पंचायती राज विभाग ने असामाजिक तत्वों पर नजर रखने के लिए हर पंचायत में सीसीटीवी कैमरे लगाने शुरू कर दिए हैं.  रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार की योजना हर पंचायत में 100 सीसीटीवी कैमरे लगाने की है. 

गांव का मुखिया बनना यानी गलाकाट प्रतिस्पर्धा 

गांवों में ग्राम प्रधान का पद हमेशा महत्वपूर्ण रहा है. कई शक्तियों के अलावा विकासनिधि की जिम्मेदारी गांव के मुखिया के पास ही होती है. इसलिए गांवों में सरपंच बनना एक गलाकाट प्रतिस्पर्धा बनती जा रही है.  पुलिस को हत्याओं में राजनीतिक तनाव और बदले का एंगल भी देखने को मिला है. 

ग्राम प्रधानों की भूमिका

ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले हर काम पर प्रधान की मुहर लगती है. मुखिया को अक्सर पंचायत का 'विधायक' बताया जाता है. स्कूल और सड़क बनाने से लेकर आवास और आंगनवाड़ी चलाने के लिए अनुदान के साथ-साथ पीडीएस वितरण तक सारा काम मुखिया के जिम्मे ही होता है.

एक विधायक के मुकाबले एक मुखिया को एक छोटे से क्षेत्र या बहुत कम आबादी की जिम्मेदारी दी जाती है. एक पंचायत में लगभग 7,000 की औसत आबादी होती है. 

एक मुखिया को सालाना विकास कार्य के लिए लगभग 2 करोड़ रुपये मिलते हैं. द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में मुखिया की भूमिका को और ज्यादा प्रमुखता मिलने वाली है. स्थानीय और पंचायत निकायों को दिए जाने वाले अनुदान में पिछले कुछ सालों में इजाफा भी किया गया है. इसके अलावा, 15 वें वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक केंद्र सरकार बिहार के ग्रामीण स्थानीय निकायों 11,735 करोड़ रुपये का अनुदान करेगी.

ये अनुदान ग्रामीण इलाकों में  सिर्फ पानी और स्वच्छता के लिए दिया जाएगा. 2021-22 में 2,226 करोड़ रुपये की राशि केन्द्र ने बिहार सरकार को दे दी है. इसके अलावा, पंचायतों को ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य देखभाल का काम सौंपा जाएगा.  धन के इतने बड़े पैमाने को देखते हुए प्रधान के पद लिए दांव लगाना बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक क्रेज बनता जा रहा है. जिसके लिए वो गलाकाट प्रतिस्पर्धा करने को भी तैयार हैं. 

 

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