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म्यांमार के आतंरिक हालात खराब होने से कालाडान प्रोजेक्ट पर खड़े हुए सवाल, जानें भारत के लिए क्यों है यह अहम

कालाडान प्रोजेक्ट को लेकर भारत के लिए एक और खतरा है वो है आतंकी संगठन, 'आराकान आर्मी', जो म्यांमार में सक्रिए है. वर्ष 2012 में पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट, लश्कर ए तैयबा ने आराकान आर्मी को खड़ा करने में मदद की थी.

सेना के तख्तापलट के बाद से म्यांमार के आतंरिक हालात तो खराब हुए ही हैं, साथ ही भारत और म्यांमार के साझा कालाडान प्रोजेक्ट को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं. उत्तर-पूर्व के असम और मिजोरम जैसे राज्यों को मैनलैंड से जोड़ने के लिए भारत के इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को जानने के लिए एबीपी न्यूज की टीम पहुंची है मिज़ोरम से सटे म्यांमार बॉर्डर पर. म्यांमार बॉर्डर के साथ साथ कालाडान प्रोजेक्ट की सुरक्षा में देश की सबसे पुरानी और एकमात्र पैरामिलिट्री फोर्स, असम राईफल्स तैनात है, जो आज अपना 186वां स्थापना दिवस मना रही है.

देश के सबसे दूरस्थ राज्य, मिजोरम को कोलकता से जोड़ने के लिए वर्ष 2008 में भारत ने म्यांमार के साथ कालाडान प्रोजेक्ट के लिए करार किया था. कालाडान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (केएमएमटीटीपी) के जरिए कोलकता के हल्दिया पोर्ट को म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़े जाने का प्रस्ताव है. उसके बाद सितवे पोर्ट को म्यांमार की कालाडान नदी के जरिए आवागमन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. भारत में कालाडान नदी के दाखिल होने के बाद इस‌ प्रोजेक्ट को सड़क के जरिए मिजोरम के लुंगतलई और फिर राजधानी आईजोल से गुजरने वाले एनएच-54 से जोड़ने का प्रस्ताव है. लेकिन ये प्रोजेक्ट काफी पीछे चल रहा है. पहले कोविड महामारी और अब म्यांमार में तख्तापलट से प्रोजेक्ट की रफ्तार जल्द पकड़ने की उम्मीद कम ही दिखाई पड़ती है.

कालाडान प्रोजेक्ट से उत्तर-पूर्व के राज्य तो मैनलैंड से और करीब आ ही जाएंगें, लेकिन इसका एक सामरिक महत्व भी है.‌ दरअसल, उत्तर-पूर्व के असम, मेघालय, मणिपुर, नागालौंड और मिजोरम राज्यों तक फिलहाल सड़क के जरिए पहुंचने के लिए एक मात्र रास्ता है पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी कोरिडोर से.

इसलिए शुरू हुआ कालाडान प्रोजेक्ट

लेकिन इस सिलिगुड़ी कोरिडोर पर चीन की बुरी नजर है. वर्ष 2017 में डोकलम विवाद के दौरान दुनिया जान चुकी है कि सिलिगुड़ी की सुरक्षा किस तरह खतरे में पड़ सकती है. यही वजह है कि भारत नें उत्तर-पूर्व के राज्यों को म्यांमार और बंगाल की खाड़ी के रास्ते पश्चिम बंगाल से जोड़ने के लिए कालाडान प्रोजेक्ट को शुरू किया है.

  • हल्दिया (कोलकता) बंदरगाह से सितवे पोर्ट बंगाल की खाड़ी के जरिए--539 किलोमीटर (चालू हो चुका है)
  • सितवे पोर्ट से पलेतवा (म्यांमार) कालाडान नदी के जरिए--158 किलोमीटर
  • पलेतवा से ज़ोरिनपुई (भारत म्यांमार बॉर्डर) सड़क मार्ग--62 किलोमीटर
  • ज़ोरिनपुई से लुंगतलई (मिज़ोरम)--100 किलोमीटर

एबीपी न्यूज की टीम जब भारत म्यांमार के बॉर्डर पर पहुंची तो देखा कि कालाडान प्रोजेक्ट का जोरो-शोरो से काम चल रहा है. विदेश मंत्रालय के अधीन इस प्रोजेक्ट को दो प्राईवेट कॉन्ट्रेक्टर तैयार कर रहे हैं. ज़ोरिनपुई से लुंगतलई तक सड़क के चौड़ीकरण के साथ साथ नई पुल तैयार किए जा रहे हैं. जगह जगह बुलडोजर और जेसीवी मशीन काम कर रही हैं.

भारत के लिए कालाडान प्रोजेक्ट इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि ये भारत की एक्ट-ईस्ट पॉलिसी का हिस्सा है. म्यांमार के रास्ते भारत दक्षिण-पूर्व देशों तक सड़क मार्ग के रास्ते पहुंचना चाहता है. यही वजह है कि ज़ोरिनपुई और कालाडान प्रोजेक्ट को 'गेटवे ऑफ साऊथ ईस्ट एशिया' कहा जाता है.

सामरिक महत्व और उत्तर पूर्व के राज्यों कई कनेक्टेविटी के साथ साथ कालाडान प्रोजेक्ट भारत के लिए म्यांमार में चीन के बढ़ते दबदबे को 'काउंटर' करना भी है.

इसी साल जनवरी के महीने में चीन के विदेश मंत्री, वांग यी ने म्यांमार दौरे के दौरान करीब 14 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. इस दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक, व्यापार और तकनीकी समझौते हुए. इसके अलावा मांडले-क्याकफो रेल लिंक पर भी चर्चा हुई. खास बात ये है कि इस दौरे के महज़ डेढ़ महीने के भीतर ही म्यांमार की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया. हालांकि, भारत का म्यांमार में चीन के मुकाबले बेहद कम निवेश है-- महज़ 3 बिलियन डॉलर.

कालाडान प्रोजेक्ट को लेकर भारत के लिए एक और खतरा है. और वो है आतंकी संगठन, 'आराकान आर्मी', जो म्यांमार में सक्रिए है. वर्ष 2012 में पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट, लश्कर ए तैयबा ने आराकान आर्मी को खड़ा करने में मदद की थी. ये आतंकी संगठन म्यांमार के रखिन (रखाईन) प्रांत में सक्रिए है जो मिज़ोरम से सटा हुआ है और कालाडान प्रोजोक्ट भी यहीं से निकलता है. कुछ समय पहले आराकान आर्मी ने कालाडान प्रोजेक्ट पर हमला भा किया था और इंजीनियर्स तक को अगवा कर लिया था. लेकिन पिछले साल नबम्बर में म्यांमार सेना और आराकान आर्मी के बीच समझौता हो गया था. लेकिन अब आराकान आर्मी को चीन की मदद मिल रही है. हाल ही में कई ऐसी घटनाएं सामने आई जिसमें बड़े तादाद में चीनी हथियार आराकान आर्मी को भेजे गए थे.

आराकान आर्मी के खतरे को देखते हुए ही असम राईफल्स ने कालाडान प्रोजेक्ट की सुरक्षा में एक अतिरिक्त कंपनी तैनात की है. इसके अलावा एक कंपनी पहले से ही ज़ोरिनपुई बॉर्डर पोस्ट पर तैनात रहती है.

आपको बता दें कि असम राईफल्स देश का सबसे पुराना (और एकमात्र) पैरा-मिलिट्री फोर्स है, जिसकी स्थापना वर्ष 1835 में आज ही के दिन यानि 24 मार्च को हुई थी. उस वक्त इसे 'कचर-लेवी' के नाम से जाना जाता था. आजादी के बाद से असम राईफल्स की जिम्मेदारी म्यांमार बॉर्डर की रखवाली और उत्तर-पूर्व के राज्यों की उग्रवाद के खिलाफ आतंरिक सुरक्षा करना है.

जम्मू कश्मीर: अनंतनाग में हथियारों के साथ मिली प्राइवेट गाड़ी, ड्राइवर गिरफ्तार

नीरज राजपूत देश के जाने-माने डिफेंस-जर्नलिस्ट और वॉर-लेखक हैं. पत्रकारिता में करीब ढाई दशक का अनुभव रखते हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया तीनों में गहरी पकड़ है.

वर्तमान में वे ABP नेटवर्क से जुड़े हैं, जहाँ युद्ध, रक्षा, नेशनल सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिक्स से संबंधित विषयों को कवर करते हैं. ABP लाइव पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘गेम-चेंजर’ के प्रस्तुतकर्ता भी हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर उन्होंने पहली हिंदी पुस्तक "ऑपरेशन Z लाइव" लिखी, जो बेस्टसेलर सूची में भी शामिल हुई और पाठकों द्वारा खूब सराही गई.

रिपोर्टिंग का दायरा
- दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन से लेकर आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर और चीन सीमा पर तिब्बत के पठार तक
- पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर-स्ट्राइक से लेकर पनडुब्बी के जरिए समुद्र के भीतर तक
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके एक्सक्लूसिव खुलासे और सटीक विश्लेषणों की व्यापक सराहना हुई
- यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में मारियुपोल, डोनेत्स्क और लुहांस्क जैसे एक्टिव वॉर-जोन से रिपोर्टिंग. इसी अनुभव पर आधारित उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई
- दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक उत्तर-दक्षिण कोरिया की DMZ
- ⁠अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डों में से एक JBLM, और शीत युद्ध के दौरान "गैर-मौजूद" माने जाने वाले रूसी सैन्य अड्डों से भी ग्राउंड रिपोर्टिंग. 
- ⁠वे उन चुनिंदा रक्षा जुड़े पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के पहले स्वदेशी अटैक हेलिकॉप्टर LCH-प्रचंड के कॉकपिट में उड़ान भरी है. इसके अलावा फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान निर्माण सुविधा से भी उन्होंने विशेष रिपोर्टिंग की.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'Defence Correspondent Course' के Alumni हैं.

पूर्व कार्य अनुभव
- STAR NEWS में लगभग 6 वर्षों तक चीफ रिपोर्टर (क्राइम) के तौर पर कार्य किया और लोकप्रिय क्राइम शो 'सनसनी' से जुड़े रहे
- पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक नेशनल हेराल्ड से की
- इसके बाद B.A.G. Films के साथ जुड़कर STAR NEWS के लिए क्राइम शो बनाए
- SAHARA TV में भी लगभग 2 वर्षों तक कार्यरत रहे

रक्षा और सुरक्षा के मामलों पर उनकी पकड़, ग्राउंड-जीरो रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद डिफेंस जर्नलिस्ट्स में स्थापित करती है.

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