Xप्लेन: भारत के ‘किफायती’ स्पेस मॉडल का सच, रिपोर्ट में दावा और ISRO की सफाई
अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए एक शोध में दावा किया गया है कि प्रति किलोग्राम पेलोड लॉन्च करने की लागत के मामले में भारत, US के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक खर्च करता है.

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम (ISRO) लंबे समय से अपनी लागत-प्रभावी और ‘किफायती’ (frugal) इंजीनियरिंग के लिए पूरी दुनिया में सराहा जाता रहा है. 2014 में जब भारत ने अपने पहले ही प्रयास में मंगलयान को लाल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया था, तब से भारतीय स्पेस मॉडल को दुनिया का सबसे किफायती स्पेस प्रोग्राम माना जाता रहा है. हाल ही में जब भारत अपने ऐतिहासिक चंद्रयान-3 मिशन की सफल लैंडिंग की तीसरी सालगिरह पर 'नेशनल स्पेस डे' मना रहा था, तब एक नए पीयर-रिव्यूड वैज्ञानिक अध्ययन ने इस स्थापित धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और पोलिटेक्निको इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्यूरिन के अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए एक शोध में दावा किया गया है कि प्रति किलोग्राम पेलोड लॉन्च करने की लागत के मामले में भारत, अमेरिका के मुकाबले लगभग चार गुना अधिक खर्च करता है. इस अध्ययन के सामने आते ही वैश्विक और भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नई बहस छिड़ गई है.
1. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के अध्ययन में क्या है दावा
यह अध्ययन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (इंग्लैंड) के अर्थशास्त्री एलेसियो टेरजी और पोलिटेक्निको इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूरिन (इटली) के फ्रांसेस्को निकोली द्वारा संयुक्त रूप से लिखा गया है. इस शोध पत्र को प्रसिद्ध अकादमिक जर्नल 'इकोनॉमिक लेटर्स' में प्रकाशित किया गया है.
शोधकर्ताओं ने दुनिया के छह प्रमुख अंतरिक्ष बाजारों जिनमें अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, रूस, चीन, जापान और भारत शामिल है, वहां उपग्रह (सैटेलाइट) लॉन्च करने की प्रति किलोग्राम लागत का गहन विश्लेषण किया.
प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत की तुलना
शोध के आंकड़ों के अनुसार, 2025 के अंत तक विभिन्न देशों के रॉकेट मॉडल के जरिए सैटेलाइट लॉन्च करने का औसत खर्च इस प्रकार रहा
| देश | प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत (USD) | भारतीय रुपये में अनुमानित लागत |
| अमेरिका (USA) | $3,225 | ₹3.11 लाख |
| जापान (Japan) | $5,287 | ₹5.07 लाख |
| चीन (China) | $5,809 | ₹5.57 लाख |
| रूस (Russia) | $6,682 | ₹6.41 लाख |
| यूरोपीय संघ (EU) | $9,897 | ₹9.50 लाख |
| भारत (India) | $13,302 | ₹12.70 लाख |
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष यह है कि परीक्षण किए गए सभी छह वैश्विक बाज़ारों में अमेरिका की लॉन्च लागत सबसे कम ($3,225 प्रति किलोग्राम) पाई गई, जबकि भारत की लागत ($13,302 प्रति किलोग्राम) सबसे अधिक दर्ज की गई. इस रिसर्च के अनुसार, भारत में उपग्रह लॉन्च करना अमेरिका की तुलना में लगभग चार गुना अधिक खर्चीला है.
यह अध्ययन इसलिए भी चर्चा में आ गया क्योंकि भारत ने दशकों से खुद को एक ऐसे देश के रूप में पेश किया है जो बेहद सीमित बजट में बड़े से बड़े अंतरिक्ष अभियानों को अंजाम दे सकता है.
ऐतिहासिक 'किफायती' स्पेस मॉडल की मिसालें
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मंगलयान बनाम ऑटो-रिक्शा का किराया (2014): भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक प्रसिद्ध वक्तव्य में कहा था कि अहमदाबाद शहर में ऑटो-रिक्शा से यात्रा करने का किराया 10 रुपये प्रति किलोमीटर आता है, जबकि ISRO ने अपने मंगलयान (Mars Orbiter Mission) को केवल ₹7 प्रति किलोमीटर की लागत से मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचा दिया था.
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हॉलीवुड फिल्मों से भी सस्ता बजट (2024): बीबीसी (BBC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मंगलयान मिशन का कुल बजट लगभग $74 मिलियन (₹600 करोड़) और चंद्रयान-3 का बजट लगभग $75 मिलियन (₹615 करोड़) था. यह बजट अंतरिक्ष पर बनी हॉलीवुड फिल्म 'ग्रेविटी' ($100 मिलियन) और 'इंटरस्टेलर' ($165 मिलियन) के निर्माण खर्च से भी काफी कम था.
ऐसे में, इस नई रिपोर्ट का दावा कि "भारत के रॉकेट दुनिया में सबसे महंगे हैं", देश की पारंपरिक 'फ्रूगल इंजीनियरिंग' की छवि पर सीधे तौर पर सवाल खड़ा करता है.
3. ISRO का जवाब: दावों का खंडन और वास्तविक गणित
हालांकि इस अध्ययन के आंकड़े सामने आने के बाद भारतीय अंतरिक्ष बिरादरी और ISRO के शीर्ष नेतृत्व ने इस शोध की कार्यप्रणाली और निष्कर्षों का कड़ा विरोध किया है. ISRO के वरिष्ठ वैज्ञानिक और चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन ने इन निष्कर्षों को स्पष्ट रूप से खारिज किया. उन्होंने कहा कि इस अकादमिक पेपर में "गलत और भ्रामक डेटा" का इस्तेमाल किया गया है. हालांकि उन्होंने इस संबंध में विस्तृत तकनीकी आंकड़े तुरंत साझा नहीं किए, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय रॉकेटों की लागत संरचना को इस तरह आंका जाना न्यायसंगत नहीं है.
ISRO के पूर्व प्रमुख एस. सोमनाथ ने कहा है कि प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत के आधार पर निष्कर्ष निकालना पूरी सच्चाई को बयां नहीं करता. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जब भारत ने 4.5 टन वजनी भारी स्पेसक्राफ्ट के लिए एक अमेरिकी कमर्शियल लॉन्च प्रदाता (जैसे SpaceX) की सेवाएं लीं, तो भारत द्वारा चुकाई गई कीमत ISRO के अपने स्वदेशी LVM3 (Launch Vehicle Mark-3) की लागत के ही लगभग बराबर थी. इससे यह साबित होता है कि भारी उपग्रहों के लॉन्च में ISRO की दरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज भी पूरी तरह से प्रतिस्पर्धी हैं.
उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका (विशेष रूप से SpaceX) का प्रति-किलोग्राम आंकड़ा इतना कम इसलिए दिखता है क्योंकि उनके पास बहुत बड़ा 'स्केल ऑफ ऑपरेशन' है. SpaceX अपने स्वयं के 'स्टारलिंक' (Starlink) उपग्रहों के विशाल समूह को लगातार लॉन्च करता है, जिससे उनकी आंतरिक परिचालन लागत बहुत कम दर्ज होती है.


















