'कॉकरोच' के कमेंट से शुरुआत, इस्तीफे पर खत्म हुई बात, 36 दिनों में कैसे बदल गया छात्र आंदोलन?
सुप्रीम कोर्ट में हुई कथित 'कॉकरोच' टिप्पणी से शुरू हुआ छात्र आंदोलन महज 36 दिनों में देशव्यापी जनआंदोलन बन गया.

जिस आंदोलन की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान की गई एक कथित अपमानजनक 'कॉकरोच' टिप्पणी से हुई थी, वह कुछ ही हफ्तों में देशव्यापी छात्र आंदोलन में बदल गया. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शनिवार को इस्तीफा देने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का धन्यवाद किया. आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि उसी टिप्पणी ने छात्रों को एक ऐसा प्रतीक दिया, जिसने पूरे आंदोलन को नई पहचान दिलाई.
'कॉकरोच' बना आंदोलन की पहचान
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद 'कॉकरोच' सोशल मीडिया पर आंदोलन का चेहरा बन गया. अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर कॉकरोच इमोजी, मीम्स, कार्टून और व्यंग्यात्मक पोस्ट तेजी से वायरल होने लगे. इसी प्रतीक को आधार बनाकर अभिजीत दीपके ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' की शुरुआत की. शुरुआत में यह एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया पेज था, लेकिन देखते ही देखते यह छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी आवाज बन गया. जब शुरुआती सोशल मीडिया अकाउंट पर कार्रवाई हुई, तब नया अकाउंट 'Cockroach is Back' नाम से सामने आया, जिसका नारा था-'कॉकरोच कभी नहीं मरते.'
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचा आंदोलन
पिछले कई छात्र आंदोलनों से अलग इस आंदोलन ने पहले सोशल मीडिया पर रफ्तार पकड़ी और फिर सड़कों पर उतर आया. कॉकरोच जनता पार्टी कुछ ही दिनों में देश के सबसे बड़े डिजिटल समुदायों में शामिल हो गई. इंस्टाग्राम पर इसके करीब 2.63 करोड़ फॉलोअर्स हो गए, जबकि कांग्रेस के करीब 1.48 करोड़ और बीजेपी के करीब 95 लाख फॉलोअर्स बताए गए.
रील्स, मीम्स, लाइव स्ट्रीम और जंतर-मंतर से लगातार अपडेट ने इस आंदोलन को उन लोगों तक भी पहुंचाया, जो सीधे तौर पर इससे जुड़े नहीं थे. आंदोलन का दायरा बढ़ने के साथ ही इसके कई सोशल मीडिया अकाउंट्स पर प्रतिबंध और कार्रवाई भी हुई, जिसके बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया पर नियंत्रण को लेकर बहस शुरू हो गई.
6 जून को पहली बार सड़क पर दिखा असर
ऑनलाइन समर्थन का पहला बड़ा असर 6 जून को दिखाई दिया, जब छात्र जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पहुंचे. इसके बाद देश के कई शहरों में इसी तरह के प्रदर्शन शुरू हो गए. अलग-अलग कॉलेज समूहों और स्थानीय स्वयंसेवकों ने एकजुटता मार्च, चर्चाएं और जनसभाएं आयोजित करनी शुरू कर दीं.
20 जून को आंदोलन ने लिया नया मोड़
20 जून को आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंच गया. दिल्ली समेत कई राज्यों से हजारों छात्र जंतर-मंतर पहुंचे. प्रदर्शन समाप्त होने के बाद भी छात्रों ने धरना स्थल छोड़ने से इनकार कर दिया. पुलिस ने प्रदर्शन को कई बार गैरकानूनी घोषित किया, लेकिन छात्र डटे रहे. एक दिन का प्रदर्शन धीरे-धीरे 24 घंटे चलने वाले लगातार धरने में बदल गया.
बाद में AISA, AISF, SFI और KYS जैसे वामपंथी छात्र संगठनों ने भी धरने में हिस्सा लिया. प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था की गई. कई लोग कुछ घंटे या एक रात धरने में शामिल होकर वापस लौटते रहे.
सोनम वांगचुक के जुड़ने से बढ़ा आंदोलन का दायरा
28 जून को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आंदोलन में शामिल हुए. उन्होंने छह छात्र कार्यकर्ताओं के साथ भूख हड़ताल शुरू की. उनके जुड़ने के बाद आंदोलन विश्वविद्यालय परिसरों से निकलकर आम लोगों तक पहुंच गया. माता-पिता, शिक्षक, शिक्षाविद, सेवानिवृत्त अधिकारी, वकील, कलाकार और कई अन्य लोग भी जंतर-मंतर पहुंचने लगे. वांगचुक और भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों का रोजाना जारी होने वाला हेल्थ बुलेटिन भी चर्चा का विषय बना रहा.
पुलिस कार्रवाई के बाद और तेज हुआ आंदोलन
वांगचुक को धरना स्थल से हटाने, अस्पताल में भर्ती कराने और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई की तस्वीरों ने आंदोलन को और गति दी. विपक्षी दलों, कई सामाजिक संगठनों और कई चर्चित हस्तियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए. इसके बाद आंदोलन को देशभर से और अधिक समर्थन मिलने लगा.
20 जुलाई का संसद मार्च बना बड़ा मोड़
20 जुलाई को संसद मार्च आंदोलन का सबसे बड़ा पड़ाव बनकर सामने आया. भारी बैरिकेडिंग के बावजूद हजारों छात्र संसद की ओर बढ़े. पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान पेलेट गन का भी इस्तेमाल हुआ. हालांकि पुलिस कार्रवाई के बाद भी प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों के बाद मुंबई, इंदौर, नागपुर, कोलकाता समेत कई शहरों में प्रदर्शन शुरू हो गए. विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने भी आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन किए.
मीम्स, राष्ट्रगान और फूलों से अलग दिखा आंदोलन
इस आंदोलन की अपनी अलग शैली रही. प्रदर्शनकारियों ने मीम्स और व्यंग्य का इस्तेमाल किया, पुलिसकर्मियों को फूल दिए, उनके साथ सेल्फी ली. धरना स्थल पर महात्मा गांधी की दांडी यात्रा, डॉ. भीमराव आंबेडकर, भगत सिंह और संविधान को आंदोलन के प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया गया. पुलिस बैरिकेड्स के सामने राष्ट्रगान गाया गया, कविताएं पढ़ी गईं और कई जगह बॉलीवुड गीतों पर सांकेतिक प्रदर्शन भी हुए.
आंदोलन किसी एक नेता तक सीमित नहीं रहा
आंदोलन के अंतिम सप्ताह तक यह किसी एक नेता या संगठन के नियंत्रण से काफी आगे निकल चुका था. जंतर-मंतर पहुंचने वाले कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने न तो पहले अभिजीत दीपके से मुलाकात की थी और न ही CJP से उनका कोई सीधा संबंध था. वे सोशल मीडिया पर वीडियो, सोनम वांगचुक के हेल्थ अपडेट और पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें देखने के बाद आंदोलन से जुड़े.
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जो लोग दिल्ली नहीं पहुंच सके, उन्होंने ऑनलाइन भोजन और अन्य जरूरी सामान भेजकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया. कंटेंट क्रिएटर्स, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने भी लगातार आंदोलन से जुड़ी जानकारी लोगों तक पहुंचाई.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ आंदोलन की पहली बड़ी जीत
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन ने अपनी पहली बड़ी राजनीतिक जीत का दावा किया. एक कथित तंज से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर के जन आंदोलन में बदलने वाले इस अभियान ने यह दिखाया कि सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान किस तरह कुछ ही दिनों में सड़कों पर बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है. 'कॉकरोच' टिप्पणी से शुरू होकर केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे तक पहुंचा यह आंदोलन भारतीय छात्र राजनीति के हालिया इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गया है.























