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चुनाव में धर्म के इस्तेमाल पर SC ने पूरी की सुनवाई, फैसले में एक माह का वक्त

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नई दिल्ली: चुनाव में धर्म के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सुनवाई पूरी कर ली. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में 7 जजों की बेंच ने 6 दिन तक इस मामले में सभी पक्षों को विस्तार से सुना. कोर्ट का फैसला आने में लगभग 1 महीना लग सकता है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के अमल पर सभी पक्षों की दलीलें सुनीं.

इस धारा में चुनावी फायदे के लिए धर्म, जाति, समुदाय, भाषा आदि के इस्तेमाल को 'भ्रष्ट आचरण' बताया गया है. अगर किसी उम्मीदवार को ऐसे आचरण का दोषी पाया जाता है तो उसका निर्वाचन रद्द करने का प्रावधान है. सुनवाई का अंत करते हुए आज कोर्ट ने फिर इस बात को साफ किया कि वो 'हिंदुत्व' की परिभाषा पर विचार नहीं कर रहा है.

1995 में सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों की बेंच ने 'हिंदुत्व' को जीवनशैली बताया था. कोर्ट ने कहा था कि 'हिंदुत्व' के नाम पर वोट मांगने को हिन्दू धर्म के नाम पर वोट मांगना नहीं माना जा सकता. इस परिभाषा के चलते महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी समेत कई शिवसेना-बीजेपी विधायकों की सदस्यता रद्द होने से बच गई थी.

इससे पहले सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर ने कहा "धर्म को किसी भी ऐसे काम का हिस्सा नहीं बनना चाहिए जिसकी प्रकृति धर्मनिरपेक्ष है. चुनाव भी एक ऐसा ही काम है." आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम) ने भी अपनी दलीलें रखीं. पार्टी की तरफ से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने धर्म को चुनाव से दूर रखने की पैरवी की.

उन्होंने कहा कि सिर्फ उम्मीदवार के भाषणों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. उसके या उसकी पार्टी के लिए कोई भी धार्मिक आधार पर वोट की अपील करे तो ये मुकदमा दर्ज होने का आधार होना चाहिए. वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि वो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के इस्तेमाल पर दिशानिर्देश तय करे.

मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 'करप्ट प्रैक्टिस' पर कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन, हर मामले के तथ्य और परिस्थितियां अलग होते हैं. भारत जैसे विविधता वाले देश में एक समान नियम तय कर देना व्यवहारिक नहीं होगा.

वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा "चुनाव आयोग ने ऐसी पार्टियों का रजिस्ट्रेशन करती है जो किसी धर्म, संस्कृति या भाषा के हित में काम करने के लिए बनाई गई हैं. शिरोमणि अकाली दल और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग विशेष धार्मिक समूह के हित की बात करते हैं. डीएमके द्रविड़ संस्कृति और भाषा की. धर्म और संस्कृति को चुनावी राजनीति से पूरी तरह से बाहर नहीं किया जा सकता."

जाने-माने वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से धारा 123 (3) का दायरा बढ़ाने की मांग की. उन्होंने कहा "तकनीक के इस दौर में किसी उम्मीदवार को सीधे धार्मिक आधार पर वोट मांगने की ज़रूरत नहीं. उम्मीदवार और पार्टियों के पास पूरी सोशल मीडिया टीम होती है जो धार्मिक आधार पर लोगों को उकसाने का काम करती है. कोर्ट को इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए."

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने धर्मगुरुओं के किसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में अपील करने, धर्म या जाति के नाम पर किसी उम्मीदवार के खिलाफ मतदाताओं को भड़काने से जुड़े कई सवाल उठाए.

Published at : 27 Oct 2016 06:23 PM (IST) Tags: religion Vote Supreme Court
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