लिवर की सुरक्षा और आयुर्वेद: जानिए कैसे 'साक्ष्य आधारित औषधियां' बचाती हैं आपका जीवन
Rheumatoid Arthritis: पतंजलि की औषधियां Efficacy और Safety पर आधारित हैं. लिवर ड्रग मेटाबोलिज्म में अहम है. अत्यधिक एलोपैथिक दवाओं से डिली हो सकता है, जो लिवर और शरीर प्रभावित करता है.

Rheumatoid Arthritis Treatment: नई औषधियों के विकास में दो मुख्य आयाम महत्वपूर्ण माने जाते हैं – Efficacy और Safety. Efficacy से तात्पर्य दवा के प्रभाव और इसके काम करने के तरीके से है, यानी यह बीमारी के किन कारणों पर असर डालती है. Safety में यह देखा जाता है कि औषधि का कोई दुष्प्रभाव तो नहीं है और यदि है, तो कितनी मात्रा और कितने समय के बाद प्रकट होता है. पतंजलि की सभी औषधियां इन दोनों पहलुओं से गुजरने के बाद ही बाजार में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं, इसी वजह से इन्हें साक्ष्य आधारित औषधि कहा जाता है.
रिसर्च के मुताबिक लिवर हमारे शरीर का दूसरा सबसे बड़ा अंग है और सबसे मेहनती अंग है. लिवर हमारे शरीर का दूसरा सबसे बड़ा और मेहनती अंग है. यह ड्रग मेटाबोलिज्म में अहम भूमिका निभाता है, यानी जो भी दवाइयां हम लेते हैं, उन्हें शरीर के लिए उपयोगी रूप में परिवर्तित करता है. एलोपैथिक और सिंथेटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से डिली (ड्रग इंडयूस्ड लिवर इंजरी) उत्पन्न हो सकता है, जो लिवर और पूरे शरीर पर असर डालता है.
ड्रग मेटाबोलिज्म और लिवर पर असर
इसका एक प्रमुख कार्य ड्रग मेटाबोलिज्म है अर्थात जो भी औषधियां हम खाते हैं उनको रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा शरीर के लिए आसान बनाना होता है. इन एलोपैथिक और सिंथेटिक दवाइयों के सेवन से यकृत या लिवर में डिली (ड्रग इंडयूस्ड लिवर इंजरी) पैदा हो जाती है जिसका प्रभाव लिवर के साथ-साथ पूरे शरीर पर पड़ता है. इस शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया कि क्या यकृत पर पड़ने वाले इन दुष्प्रभावों को आयुर्वेदिक औषधियों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है.
अमेरिका के विभिन्न अस्पतालों में लगभग 1321 मरीजों पर किए गए एक रिसर्च से पता चला कि एक्यूट लिवर फेलियर की घटनाएं उन लोगों में ज्यादा हुई जो लंबे समय तक और अधिक मात्रा में पेरासिटामोल जैसी दवाइयां लेते रहे. इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान और दिल की बिमारियों में दी जाने वाली दवाइयों से भी यकृत के काम करना बंद करने की घटनाएं अधिक देखी गई.
सर्वकल्प क्वाथ और रिसर्च
आयुर्वेद में लिखित विभिन्न औषधियों के सन्दर्भ से बनाए गए सर्वकल्प क्वाथ जो पुनर्नवा, भूमि आंवला, और मकोय जड़ी-बूटियों से निर्मित है में मौजूद विभिन्न फाइटोकेमिकल को रिसर्च के लिए इस्तेमाल किया गया. इसका उद्देश्य था रोगियों और उनके परिवारजनों को बीमारी के दौरान कठिनाइयों से बचाना और यह देखना कि क्या इस आयुर्वेदिक औषधि के उपयोग से यकृत की कार्यक्षमता सुधारी जा सकती है और डिली (ड्रग इंडयूस्ड लिवर इंजरी) को रोका जा सकता है.
शोध में सबसे पहले मानव यकृत कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया और उन्हें कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) दिया गया, जो एक औद्योगिक रसायन है और डिली का प्रमुख कारण माना जाता है. इस रसायन के असर से कोशिकाओं का जीवन घटने लगा और वे मरने लगीं. इसके बाद सर्वकल्प क्वाथ दिया गया, जिससे कोशिकाओं की पुनः वृद्धि शुरू हो गई. इन कोशिकाओं की मृत्यु के दो प्रमुख कारण थे,
- इन सेल्स में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का शुरू होना
- माइटोकॉन्ड्रिया हमारे सेल्स का पावरहाउस है, का मेम्ब्रेन पोटेंशियल कम होना
इन-विट्रो और इन-विवो अध्ययन
रिएक्टिव ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और एमएमपी स्तर जो औद्योगिक रसायन की वजह से बढ़ गया था वह भी डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ और यह दोनों पैरामीटर्स लिवोग्रिट के माध्यम से पुनः सही अवस्था में आ गए.
इसके बाद इन - वीवो शोध के लिए विन्स्टर चूहों को चुना गया. करीब 9 हफ्तों तक किए गए इन रिसर्च में विभिन्न पैरामीटर्स को जांचा गया जिसमें सीरम एएलटी और सीरम एएसटी शामिल थे. रिसर्च में पाया गया कि सर्वकल्प क्वाथ या लिवोग्रिट देने पर इन पैरामीटर्स का स्तर डोज़ डिपेंडेंट और टाइम डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ. एक अन्य पैरामीटर सीरम बिलीरुबिन जोकि पीलिया के समय भी नापा जाता है वह भी CCl4 के प्रयोग से बढ़ चुका था. लेकिन लिवोग्रिट के उपयोग से इसका स्तर भी डोज़-निर्भर तरीके से कम पाया गया. इसके अलावा, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण चूहों में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल और यूरिक एसिड के स्तर को भी लिवोग्रिट के माध्यम से नियंत्रित किया गया.
साथ ही, इस अध्ययन में सिलिमेरिन, जो एक प्रभावी एलोपैथिक औषधि है, के साथ तुलना भी की गई. परिणामों ने दिखाया कि लिवोग्रिट अपने समकक्ष सिलिमेरिन की तुलना में अधिक प्रभावकारी साबित हुआ. CCl4 के कारण इन यकृत कोशिकाओं में फाइब्रोसिस, ल्य्म्फोसिस्टिक इंफिल्ट्रेशन, और हेपैटोसेलुलर वैक्यूओलेशन जैसी समस्या पाई गई, जिसका मतलब इन कोशिकाओं के बीच बहुत बड़ी-बड़ी खाली जगह बननी शुरू हो गई, लिवोग्रिट को डोज़ डिपेंडेंट और टाइम डिपेंडेंट तरीके से देने पर इन समस्याओं में भी कमी आई.
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सुरक्षा और टॉक्सिकोलॉजी
इसके बाद लिवोग्रिट की सुरक्षा और टॉक्सिकोलॉजी का परीक्षण किया गया. यह परीक्षण रेगुलेटरी गाइडलाइंस और OECD गाइडलाइन के अनुसार किया गया, जिसमें 28 दिन तक 1000 mg/kg डोज़ दी गई. इस दौरान किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिला. इसके बाद महत्वपूर्ण अंगों की हिस्टोपैथोलॉजी की गई, जिससे यह पुष्टि हुई कि लिवोग्रिट लेने से अंगों पर कोई साइड इफेक्ट नहीं होता.
रिसर्च में लाल और श्वेत रक्त कणिकाओं सहित 118 अलग-अलग पैरामीटर्स का विश्लेषण किया गया. परिणामों से यह स्पष्ट हुआ कि लिवोग्रिट हर प्रकार से सुरक्षित और प्रभावकारी औषधि है.
भारत के प्राचीन ग्रंथो में विभिन्न प्रकार की औषधीय पेड़ - पौधों का वर्णन है, लेकिन अपनी भाषा का ज्ञान न होने के कारण यह विद्या हमारे देश से विलुप्त होती जा रही थी. पतंजलि ने इस अमोल धरोहर को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. अब साक्ष्य-आधारित आयुर्वेदिक औषधियों के माध्यम से हर नागरिक को रोगमुक्त करने और स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने में सहायता मिल रही है, जिससे भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा का विश्वस्तरीय योगदान सुनिश्चित हो रहा है.
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