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पतंजलि ईयरग्रिट गोल्ड: मेथी, नीम और भृंगराज जैसी औषधियों से बढ़ाएं अपनी सुनने की क्षमता

कान सुनने और संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है. दुनिया भर में 5% आबादी कान की समस्याओं से ग्रस्त है, जिसमें 43 करोड़ 20 लाख वयस्क शामिल हैं. वहीं, 2050 तक यह आंकड़ा बढ़ सकता है और अनुमान 70 करोड़ तक का है.

Ear Health Guide: कान हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, कान का काम सुनने के अलावा शरीर का संतुलन बनाना भी है. जब शिशु चलना सीखता है तो यह हमारे कान ही है जोकि उसका संतुलन बनाने में सहायता करते हैं. हमारे कान के अंदरूनी हिस्से में कुछ छोटे-छोटे कण होते हैं, जोकि कान में मौजूद एक तरल पदार्थ या फ्लूइड में तैरते रहते हैं, और कणों का यह तैराव ही हमारा संतुलन नियंत्रित करता है. 

 कान को 3 हिस्सों में बटा है, पहला बाहरी कान, वह हिस्सा है जो हमें बाहर से दिखाई देता है, यह कर्ण नलिका के माध्यम से कान के परदे  से जुड़ा होता है. दूसरा हिस्सा जिसे मध्य कान कहा जाता है, एक बॉक्स के आकार का क्षेत्र होता है जिसमें हमारे शरीर की तीन सबसे छोटी हड्डियां होती हैं, मध्य कान यूस्टेशियन ट्यूब द्वारा गले के पिछले हिस्से से जुड़ा रहता है. 

सबसे अन्दर का हिस्सा जिसे आतंरिक कान कहा जाता है, इसमें एक घेंगे जैसे आकार की संरचना होती है, जोकि आवाज को सुनने में हमारी मदद करती है. इस घेंगे जैसी संरचना में एक प्रकार का तरल पदार्थ या फ्लूइड भरा रहता है, जोकि वाइब्रेशंस के रूप में आने वाली तरंगो को इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स में बदल कर मस्तिष्क तक पहुंचाने में मदद करता है.

श्रवण क्षमता और कान समस्या

दुनियां में लगभग 5% लोग ऐसे है जोकि कान की किसी न किसी समस्या से ग्रसित हैं, जिसमें 43 करोड़ 20 लाख व्यस्क और 3 करोड़ 40 लाख बच्चे शामिल हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार,  साल 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक 10 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी रूप में कान की किसी समस्या से ग्रसित होगा. लेकिन यह कैसे माना जाए कि किसी व्यक्ति को सुनने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है? इसके लिए उस व्यक्ति को Pure tone audiometry (PTA) या आसान शब्दों में डेसीबल टेस्ट कराने का परामर्श दिया जाता है. 

इसको समझने के लिए पहले यह बात समझनी होगी कि, आवाज को डेसीबल में नापा जाता है, मनुष्यों के सुनने की क्षमता 0 डीबी (डेसीबल) से 130 डीबी तक होती है,  कोई भी व्यक्ति 0 डीबी पर आने वाली छोटी से छोटी आवाज़ को भी सुन सकता है, 85 डीबी तक की आवाज़ को मनुष्यों के लिए सुरक्षित माना जाता है, और इससे कोई दुष्परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं, वहीं 120 डीबी से अधिक की आवाज व्यक्ति को तुरंत ही प्रभावित कर सकती है.

परन्तु अगर किसी व्यक्ति को 35 डेसीबल से अधिक की आवाज को भी सुनने में परेशानी का सामना करना पड़े तो यह माना जाता है कि ऐसे व्यक्ति की श्रवण शक्ति क्षीण हो चुकी है, यानि उसे कम सुनाई देता है. विश्व भर में 60 प्रतिशत के ऊपर के लगभग 25% लोगों में इस प्रकार की समस्या देखी गई है. 

ईयरफोन और कान की समस्याएं

आजकल लगभग सभी आयु के लोगों द्वारा प्रयोग किये जा रहे ईयरफ़ोन से कान की समस्या अधिक बढ़ रही है, क्योंकि इनको अधिक समय तक लगाने से कान के अंदर हवा नहीं पहुंच पाती है, जिससें कान की अंदरूनी सतह में अनेक प्रकार के बैक्टीरिया पनपने लगते हैं.

श्रवण शक्ति क्षीण होने के कुछ प्रमुख कारण हैं जैसे, कान का पर्दा फट जाना, कान में अधिक मोम जमा हो जाना, या किसी प्रकार का संक्रमण या कोई बाहरी वस्तु का फंस जाना, वहीं कई बार यह समस्या, आयु बढ़ने, किसी प्रकार के धमाके की चपेट में आने से, कान के ट्यूमर की वजह से, या फिर दवाइयों के दुष्प्रभाव से विशेषकर कैंसर की रोकथाम में प्रयोग होने वाली दवाइयों की वजह से भी हो सकती है. 

आयुर्वेद के अनुसार कान तेल डालने की सीमाएं

एलोपैथिक चिकित्सा के जानकारों में ऐसी मान्यता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा में कान की समस्याओं के लिए कान में तेल डाला जाता है, जोकि कम तापमान या ठण्ड के मौसम में उपयुक्त नहीं होता क्योंकि वह जम जाता है, इस कारण वह बीमारी को ठीक करने की अपेक्षा उसको अधिक बढ़ा देते है. और आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति कान की समस्याओं के लिए एक कारगर समाधान नहीं हैं.

अधिक जानकारी के लिए कंपनी की वेबसाइट पर जाएं

https://www.patanjaliayurved.net/

ग्लिसरीन में तैयार आयुर्वेदिक औषधि

पतंजलि ने इस समस्या के समाधान के लिए ईयरग्रिट ईयरड्राप को विकसित किया. यह औषधि मेथी, नीम, धतूरा, तुलसी, भृंगराज, अपामार्ग, हल्दी, और सुदर्शन जैसी औषधियों से निर्मित है. इस औषधि की विशेषता यह है कि इसमें तेल की बजाय ग्लिसरीन का प्रयोग किया गया है. आयुर्वेद के इतिहास में यह प्रथम अवसर है कि आयुर्वेदिक औषधियों को तेल के बजाय ग्लिसरीन में प्रोसेस्ड किया गया है.

इसके साथ ही ईयरग्रिट गोल्ड टेबलेट्स नामक औषधि का भी निर्माण किया गया जिसमें श्वेत सारिवा, मुलेठी, कुठा, दालचीनी, छोटी इलाइची, तेजपत्ता, नागकेशर, फूलप्रियंगु, नोलोत्पल, गिलोय, लौंग, हरड़, बहेड़ा, आंवला, भृंगराज, मकोय, गुंजा, अर्जुन, यवा, हल्दी, नीम, निर्गुन्डी, एवं अभ्रक भस्म, लौह भस्म, शिलाजीत, और रसराज रस जैसी औषधियां है. यह सभी औषधियां कान की बामरियों को ठीक करने में लाभदायक मानी जाती है. 

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