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ब्रिक्स समिट के दौरान मोदी-जिनपिंग की 'अनौपचारिक' मुलाकात से नहीं पिघली बर्फ, चीन का विस्तारवादी रवैया आता है आड़े

चीनी मंत्रालय का यह भी दावा है कि मोदी-जिनपिंग की वार्ता ट्रांसलेटर्स के साथ हुई, जबकि भारतीय मीडिया में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि बिना किसी नोट लेनेवाले या अनुवादक के ही दोनों नेताओं की बातचीत हुई.

Modi-Xi Meeting प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 अगस्त को जोहान्सबर्ग में मिले. बहाना, ब्रिक्स समिट का था. हालांकि, जब नरेंद्र मोदी ने अपना संबोधन दिया था, तब शी जिनपिंग मौजूद नहीं थे, लेकिन ब्रिक्स की पृष्ठभूमि में ही दोनों की मुलाकात भी हुई. वैसे, शी जिनपिंग सोमवार यानी 21 अगस्त को ही जोहान्सबर्ग पहुंच गए थे, लेकिन मंगलवार 22 अगस्त को आयोजित बिजनेस फोरम की एक बैठक में शामिल नहीं हुए थे. कार्यक्रम को उन्हें संबोधित भी करना था, लेकिन उनका भाषण चीन के वाणिज्य मंत्री वांग वेन्ताओ ने पढ़ा था. इसके बाद कयास ये भी लग रहे थे कि शायद शी जिनपिंग भारतीय पीएम से नहीं मिलेंगे या शायद विस्तार को लेकर वह कुछ नाराज हैं, लेकिन अगले दिन ये सारे दावे बेमानी हो गए. 

भारत के लिए संप्रभुता सर्वोपरि

ब्रिक्स की पृष्ठभूमि में दोनों नेताओं के मिलने पर भी हालांकि विवाद हो ही गया. चीन के विदेश मंत्रालय ने यह दावा किया कि मुलाकात की पहल भारतीय प्रधानमंत्री की तरफ से हुई थी, हालांकि भारतीय अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार मिलने के लिए चीनी राष्ट्रपति की ओर से अनुरोध हुआ था. चीनी मंत्रालय का यह भी दावा है कि मोदी-जिनपिंग की वार्ता ट्रांसलेटर्स के साथ हुई, जबकि भारतीय मीडिया में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि बिना किसी नोट लेनेवाले या अनुवादक के ही दोनों नेताओं की बातचीत हुई. बहरहाल, भारत और चीन की तरफ़ से अलग-अलग तरह के बयान आए हैं. इससे इस धारणा को बल मिलता है कि दोनों नेताओं के बीच मुलाकात तो हुई, बात नहीं बनी. हाथ मिले, दिल नहीं. दोनों के बीच सहमति का कोई आधार नहीं बन पाया. इसकी वजह भी है. चीन हमेशा ही सीमा पर अपनी हरकतें करता है और उसे ये हरकतें बंद करने के लिए भारत हमेशा कहता है. चीन सीमा पर जारी तनाव को नॉन-इशू मानता है. वह इसके बारे में चर्चा से बचना चाहता है. बाकी व्यापारिक रिश्तों को वह बेहतर करना चाहता है. चीन की पीठ में छुरा मारने वाली आदत भी 1962 में भारत को झेलनी पड़ी है. उसका घाव अभी तक रिस रहा है. वैसे, चीन तो 1970 के दशक के अंतिम वर्षों से ही पैरलल-ट्रैक कूटनीति का प्रस्ताव देता रहा है. ये वही समय है, जब चीन ने अपना आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किया था. 1978 में चीन ने नयी आर्थिक नीति अपनाई थी. उसके बाद से ही चीन की वृद्धि दर चार दशकों तक दो अंकों की रही है. चीन ने अपने विकास पर ध्यान लगाया और जब वह विकसित देशों की कतार में है, तो अब वह उन मसलों पर बात ही नहीं करना चाहता. इसके पीछे सीधे तौर पर उसकी विस्तारवादी नीति जिम्मेदार है. 

चीन हमेशा से धोखेबाज देश 

चीन हमेशा कहता है कि सीमा और व्यापार से जुड़े मुद्दों को अलग-अलग रखा जाना चाहिए. चीन दरअसल फिलहाल इस बात से भी परेशान है कि कोविड के आघात से वह अब तक ठीक से उबर नहीं पाया है. चीन के कड़े विरोध के बावजूद कई जगहों पर कोविड को वुहान वायरस भी कहा जाता है. भले ही अपनी ताकत से चीन किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी फजीहत से बचा हुआ है, या अंतरराष्ट्रीय टीम को अपने यहां जांच करने से रोक सका है, लेकिन चीन की कलई खुल गयी है. भारत का चीन के साथ व्यापार का मामला भी थोड़ा जटिल है. भारत का व्यापार संतुलन चीन के फायदे में है, यानी भारत चीन से आयात अधिक करता है और निर्यात कम करता है. भारत को लगभग 70 अरब डॉलर का घाटा कहा जा सकता है. चीन की विकास दर भी पांच के नीची है और अभी तक उसके बढ़ने के आसार नहीं है. चीन का रिएल्टी सेक्टर टूट रहा है. चीन की अपनी मजबूरियां हैं कि वह भारत से बात करे, दूसरी तरफ भारत है जो अपने विकास को लेकर अधिक चिंतित है और अपनी स्वायत्तता से वह समझौता नहीं कर सकता है. इसलिए, जब ब्रिक्स समिट के बाद पीएम मोदी मीडिया को संबोधित कर रहे थे, तो शी जिनपिंग से अपनी बातचीत के दौरान "भारतीय पक्ष की वास्तविक नियंत्रण रेखा के संदर्भ में अनसुलझे मसलों पर चिंता" को उन्होंने उठाने की बात कही. यह बातचीत भारत-चीन सीमा के पश्चिमी क्षेत्र के बारे में थी. 

सीमा पर शांति नहीं, तो वार्ता बेमानी

मोदी ने सीमाई इलाकों में शांति और स्थिरता बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित किया और भारत-चीन संबंधों के सामान्य होने के लिए दोनों पक्षों को एक दूसरे की सीमा का सम्मान करने और उसको बनाए रखने की जिम्मेदारी बताई. दोनों ही नेताओं ने इस बात पर भी सहमति जताई कि वे अपने-अपने देश के संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों को उनके प्रयास तेज करने को कहें, ताकि सीमा पर सैनिक जमावड़े को कमतर (डी-एस्केलेशन) और तेजी से किया जा सके. मोदी-जिनपिंग की मुलाकात दोनों देशों के संबंधों को पारिभाषित करती है. हमारा नेतृत्व चाहे वह विदेश मंत्री हों या प्रधानमंत्री, इस बात पर अडिग है कि चीन जब तक सीमाओं पर गड़बड़ बंद नहीं करता, सेना नहीं हटाता, स्थितियां नहीं सुधरेंगी और पाकिस्तान जब तक सीमा पार आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद नहीं करता, तब तक कोई प्रगति नहीं हो पाएगी. दोनों नेताओं की यह मुलाकात तब हुई है, जब अगले महीने जी20 समिट के लिए शी जिनपिंग दिल्ली भी आनेवाले हैं. इस मुलाकात को जहां भारतीय पक्ष "अनौपचारिक" बता रहा है, चीनी पक्ष इसे "बेबाक औऱ दिल से" हुई मुलाकात के तौर पर बता रहा है. इससे पहले दोनों नेता बाली में 2022 के नवंबर महीने में जी20 के दौरान ही मिले थे.

इससे पहले, चीन और भारत के बीच 19वें चक्र की कोर-कमांडर वार्ता भी बेनतीजा ही खत्म हुई है. वहां भी डी-एस्केलेशन पर कोई बात नहीं हुई. इनमें देपसांग प्लेन और सीएनएन (चारदिंग निलुंग नाला) जंक्शन के मसले पर बात होनी थी. भारत और चीन के बीच 2020 से ही यह माहौल है, सीमाओं पर सैनिकों का भीषण जमावड़ा है, जबकि बातचीत में वो गर्मजोशी नहीं है. शी जिनपिंग और मोदी की मुलाकात से यह तो नहीं मानना चाहिए कि बर्फ पिघल गयी है, लेकिन एक शुरुआत तो हुई है. यह बेहद आशाप्रद संकेत हैं. देर इसलिए भी होगी कि भारत चीन और पाकिस्तान दोनों से ही कई बार धोखा खा चुका है, वैश्विक राजनीति का यह मंत्र तो अब भारत अच्छी तरह समझ चुका हैः 

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, 

ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।।

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