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भारत जल्द लगाने वाला है 56 ग्लेशियल लेक्स पर अर्ली वार्निंग सिस्टम, अगले साल तक शुरू हो सकता है पहला फेज

पिछले साल के एक अध्ययन के मुताबिक भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान में ऐसे लगभग 200 लेक हैं जिनपर ये खतरा मंडरा रहा है. इसलिए, इन पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना वक्त की जरूरत है

तूफान और बिजली हालिया वर्षों में बड़े मौसमी दुष्चक्र की तरह उभर कर सामने आए हैं, जिनकी वजह से देश के विभिन्न हिस्से प्रभावित हुए हैं. बिजली गिरना, वज्रपात होना बहुत ही कम देरी में घटित होनेवाली घटनाएं हैं. बिजली अचानक और बहुत तेजी से गिरती है, इसीलिए यह किसी भी व्यक्ति को बहुत कम समय प्रतिक्रिया के लिए देती है. उसी तरह बादल फटने की घटना है, जिसमें पहाड़ों पर गांव के गांव बह जाते हैं. उनको बादलों का फटना इसलिए कहते हैं कि अचानक ही कोई बादल पहाड़ों से टकराता है और उसमें जमा सारा पानी अचानक ही जमीन पर आ गिरता है, इस अप्रत्याशित बहाव में ही सारी दुर्घटनाएँ होती हैं, जैसे केदारनाथ में हुई बड़ी दुर्घटना याद ही होगी.

वहां सैकड़ों जाने गयी थीं. उसी तरह ग्लेशियर से बनी झीलों में भी अचानक दुर्घटनाएं होती हैं, जैसी अभी सिक्किम में हुई है. सरकार अब इन जैसी घटनाओं से निबटने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है. मौसम का अतिवादी रुख अब लगभग रोजाना की बात बन गयी है. कल यानी 16 अक्टूबर की रात देश के कई हिस्सों में अचानक मौसम का रुख बदला और तेज हवा, आंधी और बारिश के साथ अचानक ठंड का आगमन हुआ. इसकी वजह से ही बिहार के मुख्यमंत्री अपने निवास से सचिवालय पैदल गए. 

हिमालय की झीलों से है खतरा

भारत का लक्ष्य है कि वह हिमालय में अगले साल तक कुछ उच्च खतरे वाले ग्लेशियर की झीलों से अर्ली वार्निंग सिस्टम को लगा दे, क्योंकि सिक्किम में अभी हाल ही में आयी बाढ़ जैसी घटनाओं को सरकार दोहराते हुए नहीं देखना चाहती है. पहले समझिए कि ग्लेशियल लेक या ग्लेशियर की झील क्या होती है? दरअसल, Glacial Lakes ग्लेशियर्स के कैचमेंट एरिया में बनी हुई झील होती हैं. इनमें दुर्घटनाएं कभी भी घट सकती हैं और इसके लिए कई वजहें हैं. इनमें अचानक पानी आने, एवलांच आने से, या बादल फटने के कारण पानी का बहाव बहुत तेज हो जाता है जो भारी तबाही का कारण बनता है. पिछले दिनों सिक्किम में ऐसे ही एक ग्लेशियल लेक के भीतर बहुत अधिक पानी होने के कारण दुर्घटना हुई, और कई लोग मारे गए, जिनमें से कई भारतीय सेना के कई जवान भी थे.

केदारनाथ में 2013 में आई आपदा भी चौराबाडी ग्लेशियल लेक के अंदर अचानक पानी बढ़ने से ही हुई थी, जिसके कारण 10,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. सरकार जिस अर्ली वार्निंग सिस्टम को लगाने का सोच रही है, वह दुर्घटना को रोक तो नहीं सकते, लेकिन पहले से सतर्क जरूर कर सकते हैं, ताकि लोगों को प्रभावित इलाकों से निकाला जाए. इसके लगने से अब ऐसी घटनाओं का कई घंटो पहले पता लग जायगा, और लोगों को वहाँ से निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया जा सकेगा. इससे जानमाल का नुकसान कम होने की संभावना है. मौसम के अचानक अतिवादी रुख पकड़ने से फसलें मारी जाती हैं, पेड़-पौधे उखड़ते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसाना होता है और एक आकलन के अनुसार हरेक साल 2500 लोग तो केवल बिजली गिरने से मरते हैं. हमारे यहां समंदर के किनारे या पहाड़ों पर भी बहुतेरी दुर्घटनाएं होती हैं और ये अर्ली वार्निंग सिस्टम उनको ही रोकने का प्रयास है. 

स्विटजरलैंड के विशेषज्ञों का साथ

भारत में 56 ग्लेशियल लेक हैं, जिनको ऊंचे खतरे वाले ग्रुप में रख सकते हैं. इनके निरीक्षण की जरूरत उस समय से और बढ़ गयी है जब पूर्वी हिमालय के क्षेत्र से लोनाक लेक ने सिक्किम में तबाही मचा दी. सिक्किम हमारा एक छोटा लेकिन खूबसूरत पहाड़ी राज्य है, जो चीन, नेपाल और भूटान से भी घिरा है. भारत ने स्विटजरलैंड के विशेषज्ञों की सेवा ली है ताकि उसी जगह यानी लोनाक लेक पर पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया जा सके. उसके बाद उसके नजदीकी झीलों पर भी ये काम किया ही जाएगा. अगर यह सिस्टम लगा होगा, तो कम से कम 90 मिनट का समय मिल जाएगा, बाढ़ के आने से पहले और लोग सुरक्षित जगहों पर पहुंच सकते हैं. 

भारत का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार यानी एनडीएमए इस दिशा में कर रहा है ताकि अगले साल तक स्थितियां ठीक हो जाएं. एनडीएमए इसके लिए भारतीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ समन्वय स्थापित कर रहा है. राज्य सरकारों को भी इसमें साथ लिया जाएगा ताकि वे सिफारिश कर सकें कि किन जगहों पर भारत को प्राथमिकता के हिसाब से मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना है, ये तय हो सके. सरकार का लक्ष्य है कि इनमें से कुछ तो किसी भी हाल में अगले साल की शुरुआत में लग जाएं और झीलों के आसपास के मौसम और वातावरण का अध्ययन शुरू हो सके, जो अर्ली वार्निंग सिस्टम का पहला काम है. पूरा सिस्टम बाद में निरीक्षण से निकले नतीजों के आधार पर तय होगा. हालांकि, उन इलाकों के टेरेन को देखते हुए, ऊंचे पहाड़ों की हालत और केवल गर्मी के मौसम में काम हो सकने के कारण यह काम लंबा भी खिंच सकता है. 

हमारे दरवाजे तक आ पहुंचे क्लाइमेट चेंज की वजह से जिन भी देशों के पास ऊंचे पहाड़ हैं या जो भी इलाका उनकी तलहटी में है, उनको ग्लेशियल लेक के अचानक फटने से आपदा का सामना कर रहे हैं. पिघले हुए ग्लेशियर को समाने वाली झीलें अचानक फटती हैं और उनका सारा पानी नीचे बहता है, जिससे काफी बर्बादी होती है. पिछले साल के एक अध्ययन के मुताबिक भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान में ऐसे लगभग 200 लेक हैं जिनपर ये खतरा मंडरा रहा है. इसलिए, इन पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना वक्त की जरूरत है, जिसमें भारत अपने पड़ोंसियों से भी पीछे है, इसलिए सरकार अब कमर कस कर इस पर काम कर रही है. 

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