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देशी हों या विदेशी, सीईओ का है भारतीय अर्थव्यवस्था में पूरा भरोसा, प्राइस वाटरहाउसकूपर्स के सर्वेक्षण में हुआ खुलासा

पता चलता है या कम से कम अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि भारत की इकोनॉमी फिलहाल इसी रास्ते पर रहेगी, यानी हाल-फिलहाल इसे शॉक नहीं लगने वाला है. भारतीय-विदेशी सीईओ में भारत को लेकर उत्साह मौजूद है.

भारत के लिए 2024 एक बेहतरीन साल होनेवाला है, अगर बात व्यापार की करें तो. पीडब्लूसी (प्राइसवाटरहाउसकूपर्स) के 27वें वैश्विक सीईओ सर्वेक्षणः भारतीय संदर्भ में भी यही आशावाद देखने को मिलता है. अधिकांश सीईओ ने इस बात पर जोर दिया कि बदलाव को गले लगाया जाए, कुछ मूलभूत चेंज करने जरूरी हैं, इस पर भी उन्होंने अपनी बात रखी. अधिकांश सीईओ ((मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी चीफ एक्ज्क्यूटिव ऑफिसर) ने तो यह भी कहा कि उन्होंने अपनी कंपनियों को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए, व्यापार में बने रहने के लिए मजबूत कदम उठाने शुरू भी कर दिए हैं. भारत की आशावादिता पूरी दुनिया को सुनाई दे रही है, फैल रही है. इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि भारत जो 2023 में वैश्विक सीईओ के लिए निवेश की पसंदीदा जगह में नौवां स्थान रखता था, इस साल वह चार स्थान की छलांग लगाकर पांचवें स्थान पर आ गया है. 

कोरोना के बावजूद लंबी छलांग 

जाहिर तौर पर तीन वर्षों के लंबे अर्थशास्त्रीय उथलपुथल के बावजूद भारत की यह छलांग सचमुच देखने के लायक है. इन तीव वर्षों में दुनिया ने एक जानलेवा महामारी भी देखी और यूरोप में पिछले लगभग दो वर्षों से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल ही रहा था कि मध्य पूर्व में हमास और इजरायल के बीच पिछले चार महीनों से युद्ध चल रहा है. इन सबके बावजूद भारत में सकल घरेलू उत्पाद (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट यानी जीडीपी) की वृद्धि की रफ्तार मजबूत है. वैश्विक कंपनियां भविष्य को लेकर भी आश्वस्थ हैं, हालांकि वे अपने समकक्ष भारतीयों के विपरीत, जो लगभग जश्न के मूड में हैं, साल की भविष्यवाणी करने में थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं. इस सर्वे के मुताबिक भारत के 86 फीसदी सीईओ ने कहा है कि उनका भरोसा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में और सुधार होगा, जबकि 44 फीसदी वैश्विक सीईओ ही अपने-अपने क्षेत्र में यह बात मानते हैं कि भारत की हालत सुधरेगी.

यह सर्वेक्षण भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे और लगातार बढ़ रहे सकारात्मक संकेतों की पृष्ठभूमि में किया गया था. इस सर्वेक्षण में 105 देशों के 4702 सीईओ से सवाल पूछे गए थे, जिनमें से 79 भारत से थे. भारतीय सीईओ में से 41 फीसदी निजी कंपनियों के मालिक थे, जबकि 59 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्रों (यानी सरकारी) की कंपनियों को प्रतिनिधित्व दे रहे थे. यदि इनका क्षेत्रवार विश्लेषण किया जाए तो सबसे अधिक औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग और ऑटोमेटिव सेक्टर से थे, उनकी संख्या कुल संख्या का 24 फीसदी थी. इसी प्रतिशत के साथ उपभोक्ता क्षेत्र के भी सीईओ थे यानी उनका भी प्रतिशत 24 ही था. इसके बाद वित्तीय सेवाओं से 16 फीसदी, उपयोग व संसाधन (यूटिलिटी एंड रिसोर्सेज) से 15 फीसदी, तकनीक, मीडिया और दूरसंचार से 11 प्रतिशत और स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित सीईओ 10 फीसदी थे. 

भारतीय सीईओ का बना है भरोसा

10 में से 9 भारतीय सीईओ मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था और मजबूत बनेगी, और सुधरेगी. वहीं, 10 में से सात सीईओ उनकी कंपनी के राजस्व को लेकर बहुत अधिक विश्वस्त और आश्वस्त थे. उन लोगों का मानना है कि अगले तीन साल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होने वाले हैं. उपभोक्ता अपनी पसंद बदल रहे हैं, साइबर खतरों के साथ ही स्वास्थ्य के खतरों से भी इकोनॉमी को दो-चार होना है और मुद्रास्फीति को भी अगर काबू में नहीं रखा गया तो अगले एक साल तक भारतीय इकोनॉमी के लिए बहुत मुश्किल हो सकते हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जाहिर तौर पर शीर्ष से लेकर नीचे तक फायदे तो लाएगा ही, उसके कुछ अपने विशिष्ट किस्म के खतरे भी होंगे. भारतीय सीईओ की मानें तो पुनर्शोध या पुनर्जागरण के लिए भारतीय कंपिनयों को नयी तकनीकों को अपनाना होगा, नयी सेवाओं यानी मौलिक उत्पादों को लाना होगा और नयी रणनीतिक साझेदारी विकसित करनी होगी. ये काम अगर किए जाएंगे, तभी भारतीय कंपनियां नव-सृजन कर सकती हैं, नए उत्पाद पहुंचा सकती हैं और नए मूल्य, नया बाजार अपने लिए बना सकती हैं. 

भारतीय विकास की कहानी

भारत की अर्थव्यवस्था चूंकि ऊपर की ओर जा रही है और भारतीय कंपनियां इस विकास को और तेज करने, इसमें और ईंधन डालने के नए तरीके खोज रही हैं, तो पता चलता है या कम से कम अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि भारत की इकोनॉमी फिलहाल इसी रास्ते पर रहेगी, यानी हाल-फिलहाल इसे शॉक नहीं लगने वाला है.  यही वजह है कि भारतीय या विदेशी सीईओ में भारत को लेकर एक तरह का उत्साह मौजूद है. घरेलू हों या सरकारी या फिर विदेशी संस्थाएं, सभी ने भारत की मजबूत जीडीपी विकास को बताया है. विश्व बैंक की भारतीय अर्थव्यवस्था पर अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट ने यह माना है कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत वित्तीय वर्ष 2022-23 में 7.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़नेवाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था. यह रिपोर्ट अक्टूबर 2023 में आयी थी और इसके मुताबिक जी20 देशों में भारत की रफ्तार दूसरे नंबर पर थी. नवंबर 2023 में जब आधिकारिक आंकड़े जारी हुए तो जीडीपी की बढ़ने की रफ्तार 7.6 फीसदी थी. यह उसी दौरान वर्ष 2022 में दर्ज किए गए 6.2 फीसदी से अधिक थी. यह विकास मुख्य तौर पर खनन, निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग में आयी तेजी की वजह से आयी थी. आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक ने भी 16 महीनों में सर्वाधिक ऊंचा 11.7 फीसदी की विकास दर अक्टूबर 2023 में दर्ज की थी. तो, अनुमान हो सकता है, थोड़ा-बहुत इधर-उधर हों, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था कुल-मिलाकर प्रगति पथ पर ही रहेगी, यह तय है. 

सात वर्षों में होगी तीसरी इकोनॉमी

अगले वित्तीय वर्ष यानी 2024-24 में भारत तमाम चुनौतियों के बावजूद सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वाला होगा और अभी दुनिया में जो पांचवे स्थान पर है, वह 2030 तक 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के जीडीपी के साथ ही तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा. एस एंड पी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस की मानें तो देश की जीडीपी हरेक साल 6 से 7.1 फीसदी की दर से 2024 से 2026 तक बढ़ सकती है. निजी क्षेत्र इसमें जाहिर तौर पर एक बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं. हालांकि, आलस्य और ढीला पड़ने की तनिक भी जगह नहीं है. जैसे, सेवा क्षेत्र के लिए ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) ग्रोथ वित्तीय वर्ष 24 की दूसरी तिमाही में धीमे पड़कर 5.8 फीसदी हो गया. सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री हमारी ताकत है और अगर अमेरिका-यूरोप में दिक्कत आती है, तो हम भी मुसीबत में आएंगे. अगर तेल के दाम, ट्रेड फ्लो और शिपिंग कॉस्ट वगैरह ने भारत को नुकसान पहुंचाया तो भारत दिक्कत में आ सकता है. भारत को भू-राजनीतिक हलचलों से भी खुद को बचाना होगा और धीमी वैश्विक मांग से भी. इससे उसकी आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है और हमेशा के लिए चीन एक महत्वपूर्ण खतरा तो है ही. 

 (इस आलेख का कुछ हिस्सा पीडब्ल्यूसी की वार्षिक रिपोर्ट पर आधारित है)

व्यालोक जेएनयू और आइआइएमसी से पढ़े हैं. विभिन्न मीडिया संस्थानों जैसे ईटीवी, दैनिक भास्कर, बीबीसी आदि में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव. फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और अनुवाद करते हैं.
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