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नीतीश कुमार की लामबंदी के बीच ममता बनर्जी ने क्यों की आरएसएस की तारीफ, क्या इसमें छिपा है कोई संकेत?

West Bengal Politics: ममता बनर्जी को अच्छी तरह पता है कि बीजेपी के कई पुराने नेताओं की पार्टी में स्थिति अच्छी नहीं है. वह असंतुष्ट हैं, ऐसे में वह इसे भुनाने की फिराक में हैं.

West Bengal Politics: इस समय देश की राजनीति पल-पल बदल रही है. लेकिन बदलती राजनीति में एक राजनीति घटनाक्रम पश्चिम बंगाल में हुआ है जिसकी चर्चा पूरे देश में है. दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee)  ने आरएसएस (RSS) को लेकर एक बयान दिया है. इस पर सभी लोग हैराम हैं. सीएम ममता बनर्जी ने एक कार्यक्रम में आरएसएस की तारीफ की है जिसके कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. हालांकि ममता ने आरएसएस की तारीफ ऐसे समय में की है जब विपक्षी एकता की कवायद तेजी से की जा रही है.    

कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान सीएम ममता बनर्जी ने आरएसएस का जिक्र करते हुए कहा कि "आरएसएस इतनी बुरी नहीं है... कुछ लोग अब भी संघ में ऐसे हैं जो बीजेपी की तरह नहीं सोचते हैं. संघ में ऐसे लोग हैं जो बीजेपी की राजनीति को स्वीकार नहीं करते. मेरे विपक्षी कभी-कभी आरोप लगाते हैं कि मैंने बीजेपी से सेटिंग कर ली है. मैं उस तरह की नहीं हूं जो सेटिंग में शामिल हो जाए." उन्होंने कहा कि टीएमसी की इमेज खराब करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन ऐसा करने वालों को नहीं छोड़ा जाएगा. 

पहले भी कर चुकी हैं संघ की तारीफ
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने आरएसएस की तारीफ की है, इससे पहले उन्होंने 2003 में आरएसएस को देशभक्त बताया था और इसके बदले में संघ ने ममता बनर्जी को दुर्गा कहा था.

ममता, अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए की केंद्र सरकार का हिस्सा रही हैं. उस दौरान ममता बनर्जी बीजेपी के कई नेताओं और आरएसएस की लीडरशिप के संपर्क में रहीं. उस समय ममता को कम्युनिस्ट टेररिज़्म की किताब के विमोचन में बुलाया गया था. इस मंच पर ही आरएसएस के कई दिग्गज मदन दास देवी, मोहन भागवत, तरुण विजय भी मौजूद थे. 

ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी और संघ की धुरविरोधी ममता बनर्जी के द्वारा आरएसएस की तारीफ किए जाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, उन्होंने ऐसा बयान क्यों दिया, वहीं यह महज एक तारीफ करने वाला बयान है या फिर सोची समझी रणनीति है? 

पिछले कुछ महीनों में देश के अंदर कुछ बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जिसमें से मुख्य महाराष्ट्र और बिहार में सत्ता परिवर्तन है. महाराष्ट्र में भले ही बीजेपी समर्थित शिवसेना (शिंदे गुट) सरकार में है, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो बीजेपी को झटका दिया है उससे वो सकते में है. सीएम नीतीश कुमार बार-बार 2024 लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं. साथ ही नीतीश बीजेपी से अलग होने के बाद लगातार विपक्ष के बड़े नेताओं से मुलाकात कर विपक्ष को एकजुट कर रहे हैं. 

विपक्षी एकता को झटका
अगर एनसीपी प्रमुख शरद पवार को छोड़ दिया जाए तो नीतीश कुमार से पहले ममता बनर्जी विपक्षी एकता और विपक्षी खेमें की बड़ी नेता थीं, मगर उनके आरएसएस की तारीफ वाले बयान के बाद विपक्षी पार्टियां भी उनपर ज्यादा भरोसा करने से बचेंगी. वहीं इससे विपक्षी एकता की कवायद को भी एक बड़ा झटका माना जा रहा है.    


नीतीश कुमार की लामबंदी के बीच ममता बनर्जी ने क्यों की आरएसएस की तारीफ, क्या इसमें छिपा है कोई संकेत?  

20 साल बाद संघ की फिर तारीफ
अब लगभग 20 साल बाद ममता बनर्जी का आरएसएस से लगाव क्यों बढ़ गया है? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह बीजेपी का पश्चिम बंगाल में बढ़ता हुआ विस्तार है. ममता बनर्जी जानती हैं कि अब उनका सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के साथ है. इसका नतीजा उन्होंने 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में देख लिया है. वहीं इस साल बंगाल में पंचायत चुनाव होने हैं, इसके साथ ही 2024 में लोकसभा चुनाव का महामुकाबला होना है इन सबको ध्यान में रखते हुए ही ममता बनर्जी के संघ की तारीफ वाले बयान को जोड़कर देखा जा रहा है. 

क्या है ममता का प्लान
आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पश्चिम बंगाल की विधानसभा में बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं, इसकी एक वजह आरएसएस का बंगाल में ग्राउंड में रहकर काम करना भी है. अब ममता बनर्जी पंचायत और आगामी लोकसभा चुनाव से पहले हिंदू वोट बैंक को अपना पक्ष में खिंचना चाहती हैं.

पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की 30 फीसदी आबादी है जो लगभग पूरी तरह से टीएमसी के पक्ष में वोट करती है. ये अल्पसंख्यक आबादी टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत भी है, लेकिन बंगाल में बीजेपी के विस्तार के बाद हिंदू वोट बैंक के छिटकने का डर है. राजनीति के खेल में मझीं हुई ममता बनर्जी हिंदू वोट बैंक को बीजेपी के खाते में जाने देने से बचाना चाहती हैं. 

RSS से दोस्ती, बीजेपी से बैर
सभी जानते हैं कि बीजेपी और ममता बनर्जी के बीच अब 36 का आंकड़ा है, लेकिन ममता आरएसएस के साथ अपने संबंध को मजबूत करना चाहती हैं. यह भी बता दें कि पिछले 10 साल से पश्चिम बंगाल में आरएसएस की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में बंगाल में आरएसएस की 530 शाखाएं थीं जो 2016 तक बढ़कर 1500 के पार पहुंच गईं. राजनीति के जानकार मानते हैं कि 2021 बंगाल विधानसभा में बीजेपी की परफॉमेंस का श्रेय कहीं न कहीं आरएसएस को भी जाता है.

इस बात को ममता बनर्जी अच्छी तरह से समझती हैं कि संघ की तारीफ से वो थोड़ा बहुत बीजेपी को रोक सकती हैं, वो किसी भी तरह से नहीं चाहती कि पंचायत चुनाव या लोकसभा चुनाव में उनको नुकसान हो.


नीतीश कुमार की लामबंदी के बीच ममता बनर्जी ने क्यों की आरएसएस की तारीफ, क्या इसमें छिपा है कोई संकेत?

आरएसएस की प्रशंसा किए जाने के कई मायने
बंगाल की राजनीति पर करीबी से नजर रखने वाले पत्रकार बिपिन राय कहते हैं, ममता बनर्जी द्वारा आरएसएस की प्रशंसा किए जाने के कई मायने हैं. मौजूदा हालात में ये उनकी मजबूरी भी है. ध्यान से देखा जाय, तो यह किसी भी संगठन में सेंध लगाने वाला बयान है.

ममता बनर्जी ने कहा है कि आरएसएस में कई सच्चे और अच्छे लोग हैं जो बीजेपी का समर्थन नहीं करते हैं. इसके माध्यम से वह कहीं न कहीं आएसएस के एक धड़े को अपनी ओर करना चाहती हैं. 

उन्होंने आगे कहा, पिछले कुछ वर्षों में बंगाल के ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में आरएसएस ने अच्छी पैठ बनाई है. इधर, ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में, उन्होंने कई बार रैलियों में हिन्दू-मंत्रों का पाठ कर जताया है कि उनकी हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति गहरी आस्था है.

ममता ने आनेवाले चुनावों में हिंदू वोट बैंक को अपने खेमे में करने के लिए ही आरएसएस की प्रशंसा की है, जिससे आरएसएस के लोग भले ही आरएसएस के लिए काम करें, लेकिन बीजेपी के बदले टीएमसी को वोट दें. हालांकि, वह अटल बिहारी बाजपेई की सरकार में एनडीए का हिस्सा रहते हुए 2003 में भी आरएसएस की प्रशंसा कर चुकी हैं.

बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकने की चाहत 
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पीएम पद की दावेदारी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार बिपिन बिहारी राय कहते हैं, ममता बनर्जी किसी भी कीमत पर केंद्र से बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहती हैं.

इसके लिए, वह लम्बे समय से प्रयास कर रही हैं. पिछले, दिनों विपक्ष की बड़ी रैलियों के माध्यम से उन्होंने अपने आपको केंद्रीय भूमिका में पेश किया है. उन्होंने जता दिया है कि विपक्ष की ओर से वही पीएम पद की सशक्त उम्मीदवार हैं. ऐसे में पीएम पद के लिए नीतीश की दावेदारी उन्हें परेशान करने के लिए काफी है, लेकिन ममता सहज ही इसे स्वीकार कर पाएंगी, ऐसा नहीं लगता है. 


नीतीश कुमार की लामबंदी के बीच ममता बनर्जी ने क्यों की आरएसएस की तारीफ, क्या इसमें छिपा है कोई संकेत?

इसी महीने 25 सितंबर को महारैली में भले ही नीतीश कुमार पीएम मैटेरियल के रूप में एकबार उभर जाएं, लेकिन ममता बनर्जी भी हार माननेवालों में से नहीं हैं. बदलते सियासी समीकरण में टीएमसी के अकेले चुनाव लड़ने की भी खबर है और बाद में अगर गठबंधन की सरकार बनने की नौबत आती है, तो ममता  बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.
 
आरएसएस की तारीफ हिंदुओं में पैठ बनाने की कोशिश?
क्या ममता आरएसएस की तारीफ हिंदुओं में पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं के सवाल पर बिपिन बिहारी राय ने कहा, आरएसएस की तारीफ करना हिंदुओं में पैठ बनाने की कोशिश ही है. इसके अलावा कुछ नहीं है. ममता चाहती हैं कि आरएसएस में काम करने वालों का टीएमसी की तरफ झुकाव हो और उनका वोट बैंक बढ़े.

यह निश्चित रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि को तोड़नेवाला बयान है. पिछले कुछ समय से बंगाल में भगवा शिविर में जो कुछ भी हो रहा है, उससे ममता अच्छी तरह वाकिफ हैं. वह टीएमएसी को सांगठनिक रूप से मजबूत बनाने का भरपूर प्रयास कर रही हैं. ऐसे में, उनकी नजर हिंदू वोट बैंक को बढ़ाने पर है, जिसका फायदा नगरपालिका एवं पंचायत चुनावों के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उठाया जा सके. 


नीतीश कुमार की लामबंदी के बीच ममता बनर्जी ने क्यों की आरएसएस की तारीफ, क्या इसमें छिपा है कोई संकेत?

बीजेपी और संघ नेताओं में मतभेद 
बीजेपी और संघ में नए पुराने नेताओं में मतभेद के सवाल पर बिपिन राय ने कहा, यह सही है कि वह (ममता बनर्जी) बीजेपी को ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता से हटाना चाहती हैं. ममता बनर्जी को अच्छी तरह पता है कि बीजेपी के कई पुराने नेताओं की पार्टी में स्थिति अच्छी नहीं है. वर्तमान नेतृत्व से मतभेद है. वह असंतुष्ट हैं, ऐसे में वह इसे भुनाने की कोशिश में हैं. इसके लिए वह बीजेपी के बागी नेताओं को पार्टी में शामिल करने के लिए भी तैयार हैं.

इसके माध्यम से वह यह भी दर्शाना चाहती हैं कि यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, बाबुल सुप्रियो इत्यादि जैसे नेताओं ने उनकी पार्टी का दामन थामा है, जो राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी के कद को और बढ़ाता है. इसके साथ ही यह भी साबित करना चाहती हैं कि उनकी पार्टी बीजेपी से बेहतर और सच्ची है, इसीलिए बड़े नेता टीएमसी में आ रहे हैं.

यूं तो शुरू से ही बंगाल राष्ट्रवाद का केंद्र रहा है. स्वामी विवेकानंद से लेकर भारतीय राष्ट्रीयता का आंदोलन यहीं से शुरू हुआ. अब हिंदू वोट बैंक को लेकर टीएमसी और बीजेपी के बीच की लड़ाई भी प्रत्यक्ष है. 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं तो देखना होगा कि बंगाल में वोट बैंक की राजनीति के लिए कौन सी पार्टी क्या कदम उठाती है.

 

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