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Tenet Review: समय की इस जंग में भविष्य की लड़ाई है भूत से, रोमांचक और चुनौतीपूर्ण है फिल्म

अगर ऐसी फिल्में देखते हुए बोर हो चुके हैं, जिनमें दिमाग लगाने की जरूरत नहीं पड़ती तो टेनेट आपके लिए है. 2020 की यह सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्म है. इसे दम साध कर, पलक झपकाए बगैर देखना होगा. वजह यह कि इसकी कहानी बीच-बीच में समय को रिवर्स गीयर में ले जाती है और आप वर्तमान में गुजरे हुए वक्त को देखते हैं.

इतिहास बताता है कि साइंस की तरक्की में साइंस फिक्शन का बड़ा हाथ रहा है. चीजें पहले लेखकों की कल्पना से बुने कहानी-किस्सों में दर्ज हुई, फिर अस्तित्व में आईं. यही वजह है कि तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियों के बाद भी साइंस फिक्शन थ्रिलर हमेशा विज्ञान से आगे रह कर रोमांचित करते हैं. लेखक-निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन पश्चिम की दुनिया के सबसे कल्पनाशील नामों में हैं. उनकी फिल्मों का दर्शक इंतजार करते हैं क्योंकि वे साधरण नहीं होतीं. अपनी कहानियों के संसार में वह देखने वालों के सामने जटिल पहेलियों जैसी चुनौतियां पेश करते हैं. आप बगैर दिमाग लगाए उनकी फिल्में नहीं देख सकते. उन्हीं की मीमेंटो (2000) पर आमिर खान की गजनी (2008) बनी थी और फिर आमिर स्टाटर धूम-3 (2013) पर भी उनकी द प्रेस्टीज (2006) की छाप थी. नोलन की इनसेप्शन (2010) के भारत में करोड़ों फैन हैं. उनकी पिछली फिल्म इंटरस्टेलर (2014) में कुछ लोग पृथ्वी को बचाने के लिए अंतरिक्ष में पहुंचे थे और अब सिनेमाघरों रिलीज हुई टेनेट में रूस-अमेरिका-यूक्रेन और भारत में घूमती हुई कहानी में मानव सभ्यता को बचाने की कोशिशें हो रही हैं. लेकिन यह कहानी सरल-सहज नहीं है.

नोलन की टेनेट में टाइम मशीन की परिकल्पना से अलग होकर भी उसके किरदार अतीत और भविष्य को देखते हैं. उनकी यात्रा करते हैं. वर्तमान का अतीत और भविष्य से तालमेल बैठाने का संघर्ष करते हैं. यहां दुनिया पर संभावित तीसरे विश्वयुद्ध से भी बड़ा संकट आया है. परमाणु शक्ति से बड़ा खतरा एक ऐसे उपकरण से है, जिसकी सही संरचना (एलगोरिदम) सटीक बैठते ही पृथ्वी उल्टी दिशा में घूमने लगेगी और पलक झपकते सब खत्म हो जाएगा. पृथ्वी को उल्टा घुमाने के लिए टनों परमाणु ऊर्जा लगेगी और इसके लिए यूरेनियम/प्लूटोनियम की जरूरत है. नोलन ने यहां कल्पना की है कि कुछ लोग भविष्य में पहुंच चुके हैं और अपनी खुशहाली के लिए, पृथ्वी को अतीत में धकेल कर उसके समृद्ध संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं. रूस में यूरेनियम/प्लूटोनियम और हथियारों का बड़ा रूसी डीलर एंडी सेटर (कैनेथ ब्रनाघ) कैंसर ग्रस्त है. वह चाहता है कि उसकी मौत के साथ दुनिया भी खत्म हो जाए. अतः वह भविष्य में पहुंच चुके लोगों से हाथ मिलाकर दुनिया के खत्म होने का इंतजाम कर देता है. उसने दुनिया के अंत का टाइम सैट कर दिया है. यह बात अमेरिकी एजेंसी को पता चल चुकी है और उसे ऐसी चीजें भी मिल रही हैं, जो वर्तमान में होकर भी अतीत में इस्तेमाल की जा चुकी है. जैसे रिवॉल्वर की गोली. एजेंसी ने इस चुनौती से निपटने के लिए टेनेट नाम की खुफिया टीम बनाई है. इसी टेनेट का नायक (जॉन डेविड वाशिंगटन) अब अतीत में जाकर उस अलगॉरिदम को अपने कब्जे में लेना चाहता है, ताकि उसे खंडित करके पृथ्वी और प्रकृति को बचा सके.

Tenet Review: समय की इस जंग में भविष्य की लड़ाई है भूत से, रोमांचक और चुनौतीपूर्ण है फिल्म

इस फिल्म को आपको गौर से देखना पड़ता है और माथापच्ची भी करनी पड़ती है. कब कहानी वर्तमान में चलते हुए अतीत में पहुंच जाएगी और कब अतीत और वर्तमान एक साथ पर्दे पर चल पड़ेंगे, कहा नहीं जा सकता. नायक को खलनायक से मुकाबले के लिए खास तौर पर दो लोगों का साथ मिलता है. एक है टेनेट का सैन्य सदस्य नील (रॉबर्ट पैटिनसन) और दूसरा सेटर की पत्नी केट (एलिजाबेथ डेबिकी). मिशन में एक और अहम चेहरा है, मुंबई में बैठी बंदूक की गोलियों की सप्लायर प्रिया (डिंपल कपाड़िया). उससे ही नायक को सेटर का पता चलता है. समय तटस्थ और भावशून्य होता है इसलिए पूरे मिशन में भावनाओं की जगह नहीं है. जो हो गया, सो हो गया. जो मर गया, सो मर गया. इसके बावजूद नायक केट से भावनात्मक रूप से जुड़ता है क्योंकि वह एक बच्चे की मां है और बच्चे हमारा भविष्य हैं. नायक की पूरी कोशिश मानवता के भविष्य को बचाने की ही है.

एक तरह से यह समय को बार-बार रिवर्स करके उसमें होने वाली गलतियों को सुधारने की कहनी है. यह इसलिए जटिल है कि जैसे ही किसी व्यक्ति या स्थान का अतीत बदला जाएगा, उसका वर्तमान भी बदल जाएगा. नोलन अपनी कहानी में समय की तेज धार पर चलते हैं और यहां पल-पल के हिसाब से चीज उतनी ही बदलती है, जितनी बदलनी चाहिए. जटिल होन के बावजूद टेनेट रोचक फिल्म है. सिनेमा की खूबसूरती यही है कि उसके मूल स्वर से जुड़ने के बाद दृश्य आपसे बातें करने लगते हैं. भाषा की बंदिश काफी हद तक खत्म हो जाती है. टेनेट में कसावट है और यह ध्यान भटकने नहीं देती. बावजूद इसके कि इसकी लंबाई करीब ढाई घंटे है. पीछे लौटते हुए वक्त और ऐक्शन के दृश्य आकर्षक हैं. भारतीय सिनेमा में ऐसे साइंस फिक्शन की आप उम्मीद नहीं कर सकते. फिलहाल इस बात से ही खुश हुआ जा सकता है कि विश्व सिनेमा में भारतीय दर्शकों की बड़ी आबादी के मद्देनजर मुंबई और डिंपल कपाड़िया को इसमें महत्वपूर्ण जगह मिली है.

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