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दूसरी पारी खेलने के लिए नए चेहरों पर आखिर सीएम योगी ने क्यों लगाया दांव?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज से अपनी दूसरी पारी की शुरुआत कर दी है, लेकिन इस बार उनकी कैबिनेट की तस्वीर काफी बदली हुई है. मंत्रिपरिषद के गठन में जातीय समीकरण का संतुलन बनाने के साथ ही हर वर्ग का ध्यान रखा गया है, लेकिन पांच साल की अपनी पहली पारी में ब्राह्मणों की नाराजगी झेलने वाली बीजेपी ने इस बार इस समुदाय का खास ख्याल रखा है और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक समेत कुल आठ मंत्री ब्राह्मण हैं. ब्रजेश पाठक का प्रमोशन करके भी इस समुदाय को खुश रखने की कोशिश की गई है.

एक जमाने में मायावती की बीएसपी के सबसे मजबूत वोट बैंक माने जाने वाले दलितों का साथ बीजेपी को इस बार भी खुलकर मिला है, इसलिए पार्टी ने उसकी कद्र करते हुए दलित समुदाय से भी आठ मंत्रियों को योगी कैबिनेट में जगह दी है, लेकिन महिलाओं को मंत्री बनाने में बीजेपी ने थोड़ी कंजूसी बरती है और कुल 52 में से महज पांच महिलाओं को ही मंत्री बनाया गया है, जो सिर्फ दस फीसदी है, जबकि उम्मीद की जा रही थी कि कम से कम 10 महिलाओं को योगी कैबिनेट में स्थान अवश्य मिलेगा.

ठाकुर समुदाय से दो मंत्री कम बनाए गए हैं

थोड़ा हैरान करने वाली एक बात ये भी है कि योगी जिस राजपूत समुदाय से आते हैं, उसे भी मंत्रिपरिषद में ब्राह्मणों के मुकाबले कम प्रतिनिधित्व मिला है. इस समुदाय से 6 मंत्री बनाए गए हैं, जबकि विधायकों की संख्या के लिहाज से तुलना करें, तो ब्राह्मण और राजपूत समुदाय से चुनकर आए नए विधायकों में महज तीन का ही फर्क है. हो सकता है कि बीजेपी ने एक खास रणनीति के तहत ही ठाकुर समुदाय से दो मंत्री कम बनाए हैं, ताकि न तो ये संदेश जाए कि मंत्रिमंडल के गठन में सिर्फ योगी की जिद ही चली है और न ही ऐसा लगे कि योगी सिर्फ राजपूतों को ही तरजीह देने वाले मुख्यमंत्री हैं.

पहली सरकार के दो दर्जन मंत्रियों का पत्ता कटा

हालांकि, अपनी पहली सरकार के करीब दो दर्जन मंत्रियों का पत्ता काटकर योगी आदित्यनाथ ने सबको चौंका दिया है, जिनमें डिप्टी सीएम रहे दिनेश शर्मा समेत सिद्धार्थ नाथ सिंह, सतीश महाना, आशुतोष टंडन, श्रीकांत शर्मा और मोहसिन रजा जैसे चेहरे प्रमुख हैं. योगी की नई कैबिनेट की तस्वीर पर गौर करें, तो दोनों उप मुख्यमंत्रियों के अलावा 16 कैबिनेट मंत्री, 14 स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री और 20 राज्य मंत्री बनाए गए हैं. इनमें ब्राह्मण व दलित 8-8, राजपूत 6, पिछड़ा वर्ग से 6, जाट 5, वैश्य 4, यादव और भूमिहार समाज से 2-2 जबकि मुस्लिम, सिख और कायस्थ समाज से 1-1 मंत्री बनाया गया है.

दानिश आजाद अंसारी इकलौते मुस्लिम मंत्री

मुसलमानों से जुड़े मसलों पर मीडिया के समक्ष पांच साल तक योगी सरकार का बचाव करने वाले इकलौते मुस्लिम मंत्री रहे मोहसिन रजा का पत्ता कट चुका है, लेकिन इस बार उनकी जगह बलिया के तेजतर्रार युवा नेता दानिश आजाद अंसारी को राज्य मंत्री बनाकर बीजेपी ने दोबारा ये संदेश दिया है कि भगवा सरकार में भी वह मुस्लिमों को प्रतिनिधत्व देने से पीछे नहीं हटती है. उसी तरह पिछली सरकार में एकमात्र कायस्थ चेहरा रहे सिद्धार्थ नाथ सिंह की अगर इस बार छुट्टी कर दी गई, तो उनके स्थान पर अरुण कुमार सक्सेना को मंत्री बनाकर कायस्थ समाज को नाराज होने की गुंजाइश नहीं दी गई है. यूपी में कई सीटों पर कायस्थों का खासा वर्चस्व है. 

योगी कैबिनेट के इकलौते मुस्लिम मंत्री दानिश आजाद अंसारी इस सरकार के सबसे युवा चेहरे हैं, जिनकी उम्र महज 32 साल है. मूल रूप से बलिया के रहने वाले दानिश एक दशक पहले बीजेपी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ गए थे और वहीं से उन्होंने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. मुस्लिम युवाओं को बीजेपी के साथ जोड़ने के लिए उन्होंने काफी काम किया, जिसका इनाम उन्हें योगी की पिछली सरकार में भी मिला था. 2017 में यूपी में बीजेपी की सरकार आने के बाद उन्हें पहले फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी का सदस्य बनाया गया और बाद में उन्हें उर्दू भाषा समिति का सदस्य बना दिया गया. सदस्य को राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है. यूपी चुनाव से पहले पिछले साल ही दानिश को बीजेपी ने अल्पसंख्यक मोर्चा का प्रदेश महामंत्री बनाया था.

बताते हैं कि दानिश को मंत्री बनाकर बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए सियासी दांव खेला है. दानिश मुस्लिमों के अंसारी समुदाय से आते हैं. यूपी में अंसारी मुस्लिमों की संख्या काफी अधिक है और ये मुस्लिमों में पिछड़े वर्ग की जाति समझी जाती है, लेकिन यूपी की सियासत में किसी भी पार्टी ने इन्हें आगे लाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया, लेकिन बीजेपी पिछड़े मुस्लिमों को अपने साथ लाना चाहती है और उसी रणनीति के तहत दानिश को मंत्री बनाया गया है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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