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अतीत की शिलाओं के बीच इतिहास की तलाश में एक दिन

कल का दिन थकानेवाला तो रहा लेकिन उसने कई जानकारियों से संपन्‍न किया. मैं इधर कई महीने से ब्राह्मी लिपि पढ़ रहा हूं. अब तक लगभग एक दर्जन किताबें पढ़ीं. ब्राह्मी का शब्‍दकोश भी मिला,उसे देखा. इससे कई सवाल मन में उठे. इन सवालों का बीच-बीच में अध्‍येताओं ने उत्‍तर भी दिए,लेकिन सवाल तो सवाल हैं,उठते ही रहते हैं. उन्‍हीं सवालों के उत्‍तरों की तलाश में ब्राह्मी लिपि से जुड़ी जो किताबें उपलब्‍ध हुईं,उन्‍हें पढ़ने लगा. जिज्ञासा शांत होने की जगह और बढ़ने लगी. यह भी पढ़ा था कि दिल्‍ली में अशोक के समय के कई स्‍तंभ लेख दिल्‍ली में हैं. मन में उन्‍हें देखने का विचार आया. यह भी पता चला कि राष्‍ट्रीय संग्रहालय में ब्राह्मी से जुड़ी अनेक वस्‍तुए हैं. कई बार कार्यक्रम बना लेकिन जा नहीं पाया. अचानक मैने घर में बताया कि रविवार को मैं संग्रहालय जाऊंगा. दिव्‍या भी तैयार हो गईं. मैने इलाहाबाद ( अब प्रयागराज) में रहते  समय कई बार वहां का संग्रहालय देखा था, लेकिन वह छोटा संग्रहालय है. इधर और विकसित हुआ हो तो नहीं कह सकता. खैर हम लोगों ने ग्‍यारह बजे निकलने का तय किया लेकिन आधाघंटा लेट हो गए. बेटे ने हमें वैशाली मेट्रो तक गाड़ी से छोड़ दिया. मेट्रो से केंद्रीय सचिवालय पहुंचे. वहां से ऑटो कर संग्रहालय गए और टिकट लेकर अंदर पहुंचे. 

प्रवेशद्वार  के सामने ही मन की मुराद पूरी हुई. एक पत्‍थर की चट्टान जैसी दिखी तो वहां गए. वहां बताया गया था कि यह गिरनार से मिला अशोक का शिला लेख है. यह कई टुकड़ों मं लिखा गया है लेकिन चैट्टान एक ही है. गिरनार से लाने में जहां टूट गई है,उसे सीमेंट से जोड़ दिया गया है. उसमें कई ( मैने गिना तो नहीं लेकिन लगता है कि अशोक के सभी 14 शासनादेश वहां हैं. वे बहुत ही सुरक्षित स्थिति में है. यह काली पत्‍थर की चट्टान पर खुदे हैं और मजबूत चट्टान होने के कारण उनका क्षरण नहीं हुआ है. कुछ अक्षर ही खराब स्थिति में हैं. मैं चूंकि अब ब्राह्मी पढ़ने लिखने लगा हूं तो मैने जब एक अभिलेख पढ़ा जिसमें लिखा था- अयं धमलिपि देवानं पियेन पियदसिन राझो लेखा पिता अस्ति एव---  दिव्‍या ने कहा—पापा मेरे लिए तो यह लिखा अबूझ है. आप जो भी कह देंगे वह सही ही होगा. लेकिन मैं रोमांचित था. मुझे लग रहा था कि जिसे कभी अशोक ने अपने लिपिकरों से लिखाया होगा,उसे मैं पढ़ रहा हूं. ( बाद में घर आकर देखा तो यह अशोक का 14 वां अभिलेख था. इसमें अशोक ने धम्‍मलेख लिखाने का आशय व्‍यक्‍त किया है. ) ढाई हजार साल पहले के इतिहास को अपनी आंखों से देखना बहुत ही सुखद था. 

हम लोग अंदर गए. संग्रहालय में तीन तल हैं. हम लोग लगभग तीन घंटे भूमि तल पर ही विभिन्‍न कक्षों में घूमते रहे. हडप्‍पा और मोहनजोदड़ों काल की वस्‍तुओं से लेकर 20 वीं सदी की सामग्री देखने को मिली. कई ऐसे अवशेष अंदर भी दिखे जो भरहुत स्‍तूप के थे और जिसमें उसी तरह दान देने वाले का नाम अंकित था जैसे सांची में हैं और जिनकी मदद से जेम्‍स प्रिंसेप ने इस लिपि को पढ़ने का उपक्रम किया. 

संग्रहालय बहुत ही साफ सुथरा है. चीजें सलीके से लगी हैं. हर कक्ष में सीआइएसएफ के जवान चौकसी करते हैं. अंदर प्रवेश करते समय और बाहर निकलते समय गहन जांच हो रही थी. रविवार को चूंकि पर्यटक अधिक आते हैं,इसलिए संग्रहालय खुला रहता है और सोमवार को बंद रहता है. लेकिन जब हम लोग थक गए और भूख लगी तो वहां की कैंटीन में गए तो वह बंद थी. बाद में बुद्ध गैलरी के पास कैफे में कुछ नाश्‍ता किया गया.

 बुद्ध गैलरी मुख्‍य बिल्डिंग से हट कर है. वहां बुद्ध के जीवन से जुड़ी चीजें हैं. मुख्‍य भवन में भी उनसे जुड़ी चीजें हैं,लेकिन यह गैलरी इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि यहां बुद्ध की अस्थियां है. ये अस्थियां कुशीनगर के पिपरहवा नामक स्‍थान में 1898 में अंग्रेज अधिकारी विलियम क्‍लाक्‍सटन पेप्‍पे को मिली थीं जो उस क्षेत्र का एस्‍टेट मैनेजर था. उसे पिपरहवा स्‍तूप से बड़ी मात्रा में सोने के आभूषण और रत्‍न के साथ बुद्ध की अस्थियां मिलीं थी. लगभग एक साल तक ये अस्थियां उसके आवास पर रखी रहीं और बाद में उन्‍हें स्‍याम( आज का थाईलैंड) के शासक को दे दी गईं. उसने इन अस्थियों को दुनिया के कई देशेां में बांटा और उन्‍हीं मे से कुछ अस्थियां देश को आजाद होने के बाद भारत को मिलीं जो दिल्‍ली संग्रहालय के बुद्ध गैलरी में सम्‍मान के साथ रखी गई हैं. उन्‍हें सुनहली  मंदिरनुमा आकृति में रखा गया है. इनकी कड़ी सुरक्षा की जाती है और किसी को स्‍पर्श नहीं करने दिया जाता. 

इन अस्थियों का दर्शन करने दुनिया भर के बौद्ध आते हैं. जब हम वहां थे तो संभवत: वियतनाम के बौद्ध यात्री पहुंचे थे. वे सब उन अस्थियों को जो स्‍वर्ण मंजूषा में रखी गई थी सिर जमीन पर रखकर प्रणाम कर रहे थे. इसके पहले श्री लंका के यात्री आकर जा चुके थे. लौटते समय मैने टिकट विंडो पर पूछा कि रोज कितने लोग यहां आते हैं तो अंदर मौजूद कर्मी ने बताया कि लगभग एक हजार आ जाते हैं जिनमें विदेशी तीन सौ के आसपास होते हैं. जब हम लोग बाहर निकले तो पर्यटकों की लगभग एक दर्जन बसें बाहर खड़ी थीं. 

अंदर मौजूद सीआइएसएफ के सुरक्षाकर्मियों जयपुर के पूरणबली यादव और उत्‍तराखंड के धनवीर सिंह पुंडीर से बात हुई तो उन्‍होंने बताया कि यहां आने वालों में वियतनाम, थाईलैंड, श्री लंका और नेपाल के लोग अधिक होते हैं. अंदर सभी सुरक्षाकर्मी सजग और सहयोगी भाव के थे. 

अंदर के कक्षों में एक सज्‍ज्‍न बहुत ही गंभीरता से अवशेषों और कलाकृतियों को देख रहे थे. उन्‍होंने फोन पर किसी से पूछा भी कि यह मोहनजोदड़ो ( मोइन जो दडो- मुर्दों का टीला) कहां है. उधर से बताया गया कि वह पाकिस्‍तान में है. फिर उन्‍होंने पूछा और हड़प्‍पा, बताया गया कि वह भी पाकिस्‍तान में ही है. भारत की प्राचीनतम संस्‍कृति से जुड़े ये दो पुरातात्विक महत्‍व के स्‍थल विभाजन के बाद पाकिस्‍तान के हिस्‍से में चले गए. बाद में जब वे सज्जन पुन: एक कक्ष में टकराये तो उनसे बातचीत हुई. वह महाराष्‍ट्र पुलिस में अधिकारी थे. वह किसी आधिकारिक काम से दिल्‍ली में थे और मौका मिलते ही संग्रहालय चले आए थे. वह जहां भी जाते हैं, वहां के ऐतिहासिक स्‍थल औार संग्रहालय जरूर जाते हैं. 

संग्रहालय अच्‍छा होने के बाद भी कुछ कमियां दिखीं. जब हम बारह निकलने वाले थे और कुछ खाने पीने की सोच रहे थे तो दिव्‍या ने एक सुरक्षाकर्मी से पूछा की कैंटीन किधर है तो उसने बुद्ध गैलरी की तरफ इशारा किया. वहां कोई संकेतन नहीं था. वहीं पास के मैदान में अशोक की एक विशाल लाट लगी है जिसमें भी ब्राह्मी में अभिलेख है,लेकिन उनकी स्थिति अच्‍छी नहीं है. लोग अंदर प्रदर्शित चीजें ही देख कर चले जा रहे थे और वहां कोई जा ही नहीं रहा था. वह तो अचानक दिव्‍या की नजर पड़ गई और वह उधर चली गई. उसके दिमाग में अशोक स्‍तंभ की बात थी क्‍यों कि मैं कई दिनों से उसे देखने की बात कह रहा था. वहीं पास में दो विशाल तोरणद्वार भी थे. उनको भी देखने कोई नहीं जा रहा था और न ही उनके बारे में कोई जानकारी दी गई थी. 

दूसरी बात देश के सबसे बड़े संग्रहालय में कोई ऐसा स्‍थान नहीं था जहां वहां प्रदर्शित चीजों के बारे बताने वाली पुस्‍तकें हों. इसके कैटलॉग के साथ ही यदि वहां प्राचीन इतिहास और पुरातत्‍व तथा मूर्तिविज्ञान से जुड़ी किताबें हो तो लोग उन्‍हें खरीदना चाहेंगें. मैं खुद ऐसी पुस्‍तकों की तलाश में था. जब हम लोग बुद्ध गैलरी में जा रहे थे तो वहीं एक छोटे से कमरे में कुछ पुस्‍तकें जरूर थीं लेकिन वे अपर्याप्‍त थी. पूछने पर बताया गया कि जो कुछ हैं,यही पुस्‍तकें हैं. दिव्‍या में बुद्ध के जीवन चरित पर एक सचित्र पुस्‍तक खरीदी जो चार सौ की थी. 

पैर थक गए थे. हम लोग बीच-बीच में कक्षों में रखी बेंचों पर बैठ कर आराम भी कर रहे थे लेकिन थकान बढ़ गई तो साढ़े चार बजे चलने का विचार किया गया. छह बजे तक घर पहुंचे लेकिन दिन में जो मानसिक खुराक मिली,उसने कॉफी संतोष दिया.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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