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छत्तीसगढ़ का विजय फैक्टर

छत्तीसगढ़ में करीब 32 फीसद आदिवासी आबादी है. छह लाख से ज्यादा लोग तेंदुपत्ता तोड़ने का काम करते हैं.

छत्तीसगढ़ एयरपोर्ट के बाहर जो टैक्सी ली वह मोहम्मद नाम के युवक की थी. आठ सालों से टैक्सी चला रहा है मोहम्मद. रायपुर में मुख्यमंत्री रमनसिंह के विकास के कामों से कमोबेश खुश है मोहम्मद. कहने लगा कि शहर में सफाई रहती है, सड़कें भी अच्छी हो गयी हैं, बारिश में यहां वहां अब उतना पानी नहीं भरता, नाले उतने नहीं छलकते लेकिन जब मोहम्मद से किसकी बनेगी सरकार का सवाल पूछा गया तो कहने लगा कि सबकुछ ठीक ही है लेकिन बहुत हो गये 15 साल, अबकी बार बदलाव चाहिए. ऐसा विरोधाभासी स्वर छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में सुनने को मिलता है. एक अन्य ऐसा वर्ग है जो बीजेपी सरकार से खुश है लेकिन रमन सिंह सरकार के मंत्रियों की खुशहाली से खफा है. उसका कहना है कि विकास राज्य का तो हुआ है लेकिन उससे ज्यादा विकास बीजेपी के नेताओं का हुआ है. कांग्रेस भी कांटे के मुकाबले में इन दो मुद्दों पर ही ज्यादा जोर दे रही है. बदलाव चाहिए के बहाने एक मौका हमें भी दो और सत्तापक्ष के नेताओं के विकास की जगह आम जनता का विकास करेंगे. उधर रमनसिंह सरकार को अपने विकास कार्यों पर और मोदी सरकार की उज्जवला, पीएम आवास योजना और आयुष्मान योजना पर भरोसा है.

डॉ रमनसिंह के साथ दक्षिण के चार जिलों बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जाने का मौका मिला. रास्ते में हैलिकाप्टर में उनसे बात हुई तो कहने लगे कि बदलाव की बात करने वाले मतदान वाले दिन बदल जाएंगे और विकास कार्यों को याद करके बीजेपी के पक्ष में ही वोट करेंगे. रमनसिंह की चार चुनावी सभाओं में गये तो वहां हर सभा में वह अपनी चाउर वाले बाबा की छवि की याद दिलाते नजर आए. वह आदिवासी इलाकों में आदिवासियों और किसानों को याद दिलाना नहीं भूलते कि एक रुपए प्रति किलो चावल देने की योजना उनके ही समय में शुरु हुई थी. रमनसिंह ऐसा कहकर जनता से हाथ उठाने को कहते हैं और जनता हाथ उठाकर उनकी बात का समर्थन करती भी दिखती है. हवा में तने हाथ देखकर रमनसिंह मुस्कराते हैं. रमनसिंह याद दिलाना नहीं भूलते कि पहली बार बीजेपी सरकार ही उन्हें डेढ़ लाख रुपये में घर पीएम आवास योजना के तहत दे रही है. बीजेपी सरकार ने ही करीब 36 लाख परिवारों को उज्जवला के तहत गैस चूल्हा दिया है. बीजेपी सरकार ने ही पांच लाख तक के मुफ्त इलाज की पहल आयुष्मान योजना के तहत की है . तालियां बजती हैं और डॉ रमनसिंह प्रसन्न मुद्रा में हाथ उठाकर विदा लेते हैं. हैलिकाप्टर उपर उठता है. धूल उड़ती है. हाथ हिला रही भीड़ धूल के कारण मुहं फेर कर खड़ी हो जाती है. हैलिकाप्टर में बैठे मुख्यमंत्री अगली सभा के लिए अपने भाषण को अंतिम रुप देने में लग जाते हैं.

दरअसल, रमनसिंह को अगर चौथी बार छत्तीसगढ़ जीतना है तो हर हाल में बस्तर पर कब्जा करना है. पहले दौर की जिन 18 सीटों पर चुनाव हो रहा है उनमें से 12 सीटें अकेले बस्तर से आती हैं. पिछली बार कांग्रेस ने 8 और बीजेपी ने सिर्फ चार जीती थी. इस बार रमनसिंह पूरा जोर लगा रहे हैं . एक दो जगह अजीत जोगी–मायावती–सीपीआई मोर्चे के गठबंधन पर उन्हें भरोसा है जो कांग्रेस की एक दो सीटें हथिया सकता है. इसका लाभ बीजेपी को ही मिलना है. छत्तीसगढ़ में करीब 32 फीसद आदिवासी आबादी है. छह लाख से ज्यादा लोग तेंदुपत्ता तोड़ने का काम करते हैं. रमनसिंह ने अर्जुनसिंह की अस्सी के दश्क की पहल को आगे बढ़ाते हुए तेंदुपत्ता वालों को बोनस देना शुरु किया है. एक मानन बोरा के 1800 की जगह 2400 रुपये दे रहे हैं. बोनस सीधे बैंकों में न देकर सीधे नकद भी दिया जा रहा है. रमनसिंह दावा करते हैं कि कुल मिलाकर छह सौ करोड़ से ज्यादा का बोनस इस तरह आदिवासियों और किसानों को दिया जा रहा है. धान पर भी तीन सौ रुपए क्विंटल बोनस देने की शुरुआत हुई है. गौरतलब है कि 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद बोनस देने का प्रावधान खत्म कर दिया गया था लेकिन चुनावी साल में इसे फिर शुरु कर दिया गया है. एक नवंबर से धान की सरकारी खरीद शुरु होनी है. रमनसिंह कहने लगे कि उसी दिन किसानों को शाम तक धान के पैसे मिलने का भी इंतजाम किया जा रहा है और ऐसा भारत में पहली बार हो रहा है .

इसी तरह पहले दौर में ही राजनांदगांव में भी चुनाव है जहां से रमनसिंह खुद भी चुनाव लड़ रहे हैं. यहां की छह सीटों में कांग्रेस को पिछली बार चार मिली थी और बीजेपी के हिस्से सिर्फ एक आई थी. इस तरह हम कह सकते हैं कि पहले दौर की 18 सीटों में से बीजेपी को पिछली बार सिर्फ 6 मिली थीं. इस बार कहानी पलटे बिना बीजेपी का काम बनने वाला नहीं है. राजनांदगांव में कांग्रेस ने अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को उतार कर रमनसिंह की घेरेबंदी की कोशिश की है. रमनसिंह चाहकर भी करुणा शुक्ला के खिलाफ कुछ बोल नहीं पा रहे. वह उन्हें बहिन बताते हैं तो करुणा शुक्ला पूछती हैं कि यह रिश्ता चुनाव के समय ही क्यों याद आ रहा है.

वैसे दिलचस्प तथ्य है कि राजनांदगांव हिंदी के विद्रोही कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का कर्मक्षेत्र भी रहा है. यहां एक कॉलेज के परिसर में उनके संग्रहालय में जाने का मौका मिला. कमरे का वह कौना देखा जहां बैठकर मुक्तिबोध कविताएं रचते थे. कमरे में एक कोने में गोलाकार चक्करदार सीढ़ी भी है जिसका जिक्र मुक्तिबोध ने किया है. मुक्तिबोध का तकियाकलाम था... तुम्हारी पालिटिक्स क्या है कामरेड. वहां उनकी मूर्ति के आगे खड़े होकर सोचा कि आज अगर वह होते तो आज की पालिटिक्स को देखकर क्या कहते. आज तो पालिटिक्स ही पालिटिक्स है. पालिटिक्स में पालिटिक्स है. खैर, राजनांदगांव में रमनसिंह के खिलाफ बोलने वाले विरले ही मिलते हैं लेकिन उनके मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ लोग खुलकर बोलते हैं. उनका मानना है कि पैदल चलने वाले नेता आज इनोवा गाड़ियों में घूमते हैं जबकि आम जनता सरकारी बस के लिए भी तरस जाती है.

छत्तीसगढ़ में इस बार एक करोड़ 85 लाख वोटर हिस्सा लेंगे. इसमें से करीब 24 लाख पहली बार वोट देंगे. ऐसे वोटर जो 18 साल के हुए हैं. ऐसे वोटरों ने काग्रेस का शासन देखा ही नहीं है. कुछ वोटरों से बात हुई तो कहने लगे कि एक मौका कांग्रेस को देना बनता है. हालांकि, विकास के कामों से खुश दिखाई देते हैं युवा. रोजगार की चिंता जरुर उन्हें चिंतित करती है. रमनसिंह सरकार ने 50 लाख महिलाओं को स्मार्ट फोन बांटे हैं. इनमें पांच लाख छात्रायें भी शामिल हैं. महिलाओं का कहना है स्मार्ट फोन तो ठीक है लेकिन गैस चूल्हे के 1100 रुपये देने पड़ रहे हैं जो उनके बस की बात नहीं है. कांग्रेस प्रवक्ता आर पी सिंह आंकड़े दिखाते हैं कि केवल 14 फीसद लोग ही सिलेंडर की रिफिलिंग करवा रहे हैं जिन्हें उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है. कॉलेज की छात्राएं कहने लगी कि स्मार्ट फोन मिला तो है लेकिन छह महीने बाद रिचार्ज तो जेब से करना पड़ रहा है. वैसे तो खुश हैं लेकिन जोड़ देती हैं कि साथ ही स्कॉलरशिप भी मिल जाती तो ज्यादा ठीक रहता.

अंत में सबकुछ अजीत जोगी पर आकर टिक गया है. पिछले चुनावों में बीजेपी को कांग्रेस से 0.72 फीसद वोट ही ज्यादा मिले थे. संख्या में देखा जाए तो सिर्फ 97000 मत ही ज्यादा थे. इस बार भी बीजेपी को उम्मीद है कि अजीत जोगी और मायावती कांग्रेस को हरवा देंगे. हालांकि रमनसिंह से पूछा गया तो कहने लगे कि चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि अजीत जोगी किसको नुकसान पहुंचाएंगे. कांग्रेस को या बीजेपी को. कांग्रेस का कहना है कि अजीत जोगी के कारण स्वर्ण लोग और सरकारी कर्मचारी कांग्रेस को वोट नहीं देते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. उधर बीजेपी को लगता है अजीत जोगी भले ही कमजोर हुए हों लेकिन मायावती अपना वोट उनको ट्रांसफर करने में कामयाब होगी और दो तीन चार हजार वोट से चार पांच सीटों में कांग्रेस को हरवा देगी. बस इतना भर ही बीजेपी चाहती भी है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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