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नेपोटिज्म बॉलीवुड में सपनों को रौंदता ही तो है

सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने एक बार फिर इन सवालों को उठा दिया है कि बॉलीवुड में भाई भतीजावाद का बोलबाला है. अक्सर देखा गया है कि नेपोटिज्म का शिकार वे लोग होते हैं जिनके परिवार वाले प्रभुत्व वाले नहीं हैं.

एक स्टार अभिनेता की मौत ने बॉलीवुड में एक ऐसे मसले पर चर्चा छेड़ दी है जिससे हर कोई बचना चाहता है. यह चर्चा नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद पर है. इंटरनेट पर ऐसे वीडियो खूब चल रहे हैं जिसमें सुशांत सिंह राजपूत ने नेपोटिज्म पर बातचीत की है. हालांकि बहुत खुलकर नहीं, फिर भी बोले जरूर हैं कि नेपोटिज्म की वजह से प्रतिभाशाली लोगों को मौका नहीं मिलेगा तो पूरी इंडस्ट्री भरभराकर गिर जाएगी.

सुशांत को मौका तो मिला था- वरना, टीवी के छोटे परदे से निकलकर फिल्मों के बड़े परदे तक पहुंचने का बहुतों का सपना टूटकर रह जाता है. टीवी प्रसिद्धि दिलाता है, पैसा भी- सो, लोग उसी से तसल्ली करके रह जाते हैं. सीरियल, टैलंट हंट शोज़ जब तक टीआरपी की ऊंची पायदान पर रहे, तब तक दुरुस्त. फिर कोई दूसरा करियर देखकर चुपचाप इंस्टा स्टोरी बनाते रहते हैं. सुशांत खुशकिस्मत भी थे कि सीरियल्स के बाद फिल्में कीं और वाहवाही भी बटोरी. ‘काय पो चे से लेकर ‘छिछोरे तक, लोगों ने उनकी खूब तारीफ की. हां, ये बात जरूर थी कि इंडस्ट्री में भी वे रहे ‘बाहर वाले’ ही. बताया जा रहा है कि ‘बाहर वाले’ के तौर पर बर्ताव होने के चलते भी वह मानसिक दबाव में रहे. जैसा कि प्रकाश राज जैसे सीनियर ऐक्टर ने ट्विट किया है- मैं इससे सर्वाइव कर गया, हालांकि मेरे जख्म मेरी देह में गहरे धंसे हैं, पर यह बच्चा सर्वाइव नहीं कर सका.

नेपोटिज्म पर कई बार उठ चुके हैं सवाल दिक्कत यह है कि अपने करियर के उठान के वक्त कोई जब नेपोटिज्म पर सवाल खड़े करता है, तो दरकिनार कर दिया जाता है. कंगना रनौत ने इसके खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी है. इसका नतीजा यह है कि उनके साथ काम करने के लिए कोई बड़ा कलाकार तैयार नहीं. उनकी सभी पिछली फिल्मों में उनके अलावा कोई बड़ा सितारा नहीं था. 2019 में ‘जजमेंटल है क्या’ में राजकुमार राव और ‘मणिकर्णिका’ में जीशू सेनगुप्ता थे. इस साल रिलीज हुई ‘पंगा’ में जस्सी गिल थे. चूंकि 2017 में करण जौहर के एक शो में उन्होंने उन पर नेपोटिज्म करने का आरोप लगाया था. इस एपिसोड में सैफ अली खान भी मेहमान थे. जाहिर सी बात है, सैफ की बेटी सारा भी उन दिनों फिल्मों में आने की प्लानिंग कर रही थीं, तो इशारा उनकी तरफ भी था. कुल मिलाकर, कंगना ने इस बहस में बहुतों को घसीट लिया था.

इसके बाद एक चैट शो में ‘गली बॉय’  फेम सिद्धांत चतुर्वेदी ने अपने संघर्ष की कहानी बयां की थी- साथ में अनन्या पांडे थीं जिन्होंने कहा था- संघर्ष मैंने भी किया है. इस पर खूब सारे मीम बने, पर सिद्धांत साफ साफ नहीं कह पाए कि स्टार किड्स के लिए कैसा संघर्ष!! इसमें सिद्धांत ने किसी पर कोई आरोप नहीं लगाए थे. आखिर उन्हें भी इंडस्ट्री का हिस्सा बनना है. हां, रणवीर शौरी जैसे सजग कलाकार खुलकर बोल रहे हैं कि अधिकतर फिल्मी अवॉर्ड फंक्शन पारिवारिक कार्यक्रम जैसे ही होते हैं.

नेपोटिज्म कहां नहीं? यूं नेपोटिज्म कहां नहीं है. आप जिस क्षेत्र में देखना चाहें, आपको भाई भतीजावाद मिल जाएगा. राजनीति तो इसकी मिसाल है. सभी बड़े दलों में पिता राजनेता रहा है तो बेटा या बेटी, राजनीति में उतरेंगे ही- पिता की कुर्सी तक संभालना चाहेंगे. कुर्सी चाहे बड़ी हो या छोटी. 2019 में इंडिया स्पेंड ने 1952 की पहली संसद से 4,807 सांसदों के बायोग्राफिकल प्रोफाइल्स को खंगाला. 1999 में 13वीं लोकसभा के दौरान कांग्रेस के 8% सांसद या तो पूर्व सांसदों के वंशज थे, या उनसे विवाहित थे. ऐसे बीजेपी के 6% सांसद थे. 2009 में कांग्रेस और बीजेपी में पूर्व सांसदों के वंशज या उनसे विवाहित सदस्यों की दर क्रमशः 11% और 12% थी. आधुनिक राजनीति में यह संख्या लगातार बढ़ रही है. 17वीं लोकसभा में 30% सांसद डायनेस्ट हैं, यानी पूर्व सांसदों के वंशज. इनमें बिहार और पंजाब के सांसदों की संख्या सबसे अधिक है. कांग्रेस अब भी सबसे ज्यादा डायनेस्ट है, पर बीजेपी भी उससे कदम मिला रही है.

वैसे राजनीति में यह बहुत अधिक है, ठीक जैसे हिंदुस्तानी सिनेमा में. और वह भी दुनिया भर की राजनीति में. अमेरिका से लेकर जापान और फिलीपींस और इंडोनेशिया तक में. 2018 में हार्वर्ड यूनिवर्स्टी के स्कॉलर सिद्धांत जॉर्ज और डॉमिनिक पोनातू की एक स्टडी लाइक फादर लाइक सन- द इफेक्ट ऑफ पॉलिटिकल डायनेस्टीज़ ऑन इकोनॉमिक डेवलपमेंट कहती है कि मेडिसिन और कानून जैसे क्षेत्रों के मुकाबले, अगर किसी व्यक्ति का पिता राजनेता हो तो उसकी राजनीति में आने की 110 गुना ज्यादा संभावना है.

फिर भी भाई भतीजावाद प्रतिभाओं को रौंदकर ही पनपता है बेशक, नेपोटिज्म का शिकार वे लोग होते हैं जिनके परिवार वाले प्रभुत्व वाले नहीं हैं. खास तौर से, फिल्म इंडस्ट्री में. वे इंडस्ट्री में ‘आउटसाइडर’ बने रहते हैं. उन्हें बड़ी फिल्मों में बड़े रोल नहीं मिल पाते. सुशांत को छोड़ दें तो टीवी के ज्यादातर कलाकर बाद में दूसरा कोई करियर चुन लेते हैं. इन दिनों वेबशोज़ का जमाना है तो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर नजर आ जाते हैं. कई अभिनेत्रियां शादी करके घर परिवार बसा लेती हैं. दूसरी तरफ पॉपुलर फिल्मी कलाकारों के बेटे या बेटी का करियर चल निकलता है. भले ही ऐक्टिंग के मामले में वे फिसड्डी ही क्यों न हों. इनका करियर फलता फूलता है तो किसी न किसी प्रतिभाशाली कलाकार के सपनों को रौंदने के कारण ही. 2019 में बेंगलूर की क्रिस्टू जयंती कॉलेज की एमए की एक छात्रा ने एक पेपर लिखा था जिसमें श्रीदेवी की 'मॉम' और जाह्वनी कपूर की 'धड़क' के बीच तुलना की गई थी. उनके कंटेंट और प्रमोशन का विश्लेषण किया गया था और बताया गया था कि स्टार किड होने की वजह से जाह्वनी पर जितना ध्यान दिया गया, उतना न्यूकमर्स पर कम ध्यान दिया जाता है.

जैसा कि अभिनव कश्यप जैसे डायरेक्टर ने सोशल मीडिया पर शेयर किया है, अक्सर न्यूकमर्स को बॉलीवुड में बुली किया जाता है. उन्हें पार्टियों में नहीं बुलाया जाता. वे टॉक ऑफ द टाउन नहीं होते. इसका खामियाजा यह होता है कि बड़े प्रॉजेक्ट्स पाने के लिए उन्हें पापड़ बेलने पड़ते हैं.अपशब्द ही नहीं, दूसरे कई तरह से किसी का शोषण किया जा सकता है- उसे इग्नोर करके, उसका मजाक उड़ाकर. उस पर फिकरे कसना. सुशांत सिंह या उसके जैसे अगर दूसरे लड़के या लड़कियां कोई बडा कदम उठाते हैं, तो इसके लिए पूरे सिस्टम से सवाल किया जाना चाहिए. मानसिक अवसाद कोई नजरंदाज करने वाली बात नहीं है. न अभी, न कभी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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