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मणिपुर चुनाव: पांच साल पहले का करिश्मा इस बार भी दोहरा पाएगी बीजेपी?

Manipur Assembly Election 2022: अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-दुनिया में मशहूर पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में दोबारा भगवा लहराने के लिए बीजेपी ने वहां तोहफे भरे वादों की बारिश कर दी है. पार्टी ने आज जारी अपने घोषणा-पत्र में हर आयु वर्ग के वोटरों को लुभाने के लिए कई तरह की सौगात देने का ऐलान किया है. 60 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में सरकार बनाने का सारा दारोमदार छोटे क्षेत्रीय दलों पर ही रहता है, लिहाज़ा कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ही प्रमुख दलों को अपनी सरकार बनाने के लिए इन छोटे दलों की बैसाखी का ही सहारा लेना पड़ता है. राज्य में 28 फरवरी और 5 मार्च को दो चरणों में मतदान होना है.

लगातार 15 साल तक कांग्रेस की सत्ता वाले इस मजबूत गढ़ में पिछले चुनाव में बीजेपी ने सेंध लगा दी थी. साल 2017 में हुए चुनाव में स्पष्ट बहुमत किसी भी पार्टी को नहीं मिला था, लेकिन 28 सीटें लेकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सरकार नहीं बना पाई थी. तब बीजेपी को 21 सीटें मिली थीं, लेकिन उसने सियासी समीकरणों की ऐसी गोटी बैठाई कि क्षेत्रीय दलों के सहयोग से अपनी सरकार बना ली. हालांकि अब बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर के इस किले को बचाने की बड़ी चुनौती है, क्योंकि इस बार कांग्रेस के साथ ही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी उसे कड़ी टक्कर देती दिख रही है.

वैसे उससे पहले साल 2012 के चुनाव में टीएमसी को 7 सीटें मिली थी और वह विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बन गई थी. वही ताकत पाने के लिए ममता इस मर्तबा भी अपना पूरा जोर लगा रही हैं, ताकि बीजेपी को पांच साल पहले वाला करिश्मा दोहराने से हर हाल में रोका जा सके. लिहाज़ा वहां कड़ा त्रिकोणीय मुकाबला होने के पूरे आसार हैं. हालांकि इस बार बीजेपी की चुनावी रणनीति छोटी पार्टियों की बैसाखी को छोड़कर खुद अपने दम पर बहुमत लाने की है, इसलिये पांच साल पहले तक जिस पार्टी से जुड़ने के लिए लोग तैयार नहीं थे, अब उसी बीजेपी का टिकट पाने के लिए स्थानीय नेताओं में होड़ भी देखी गई थी.

म्यांमार यानी बर्मा की सीमा से लगते इस प्रदेश को अशांत और संवेदनशील माना जाता है, इसलिये वहां उग्रवाद से लड़ने के लिए अफस्पा यानी (Armed Forces (Special Powers) Act) लागू है. इस कठोर कानून को वापस लेने की मांग अब वहां एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है. मुख्य विपक्षी कांग्रेस समेत बीजेपी सरकार में शामिल दोनों सहयोगी दलों ने इस कानून वापसी की मांग को लेकर अपनी आवाज उठानी शुरु कर दी है, लिहाजा बीजेपी को इस मुद्दे पर अब अपना रुख साफ करना पड़ेगा.

वैसे मणिपुर की राजनीति जोड़तोड़ व दल बदलने के लिए पहचानी जाती है और अक्सर चुनावों से पहले नेता पाला बदलते रहे हैं. हर पांच साल में छोटी पार्टियां भी अपना फायदा देखकर सत्ता की मलाई खाने को तैयार रहती हैं. इसलिये राष्ट्रीय दल भी उन पर ज्यादा भरोसा करने की हैसियत में नहीं होते. यही वजह है कि मणिपुर में बीजेपी के लिए अपनी सरकार बचाने से ज्यादा बड़ी चुनौती ये है कि वो अपने दम पर सत्ता कैसे हासिल करे.

हालांकि बीजेपी ने इस बार 40 सीटों पर जीत का लक्ष्य तय किया है, लेकिन पूर्वोत्तर की राजनीति के जानकार मानते हैं कि ये लक्ष्य पाना उतना भी आसान नहीं है. क्योंकि कांग्रेस भले ही पहले की अपेक्षा कमजोर हुई है, लेकिन ममता ने अपनी जमीन मजबूत करने के लिए बेहद खामोशी से मेहनत की है. इसलिये बीजेपी के लिए कांग्रेस के साथ ही टीएमसी भी एक बड़ी चुनौती होगी.

उसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए ही बीजेपी ने एक तेज-तर्रार महिला नेता ए शारदा देवी को प्रदेश की कमान सौंपी है. बीजेपी ने बेहद सोच-समझकर ये फैसला लिया है, क्योंकि मणिपुर के आम जनजीवन में महिलाओं की भूमिका बेहद खास है और राजनीति की दशा-दिशा तय करने में भी उनका अहम रोल रहता है. बीजेपी एक महिला चेहरे के जरिये ही ये बाजी जीतना चाहती है. वैसे मणिपुर एक छोटा राज्य है और वहां एक विधानसभा क्षेत्र में औसतन करीब 30 हजार वोटर ही होते हैं. इसलिए वहां की चुनावी रणनीति की तुलना यूपी या पंजाब से नहीं की जा सकती.

वैसे पांच साल पहले मणिपुर में बीजेपी ने जो कुछ किया वो किसी चमत्कार से कम नहीं था. हालांकि उससे पहले हुए दो विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी अपनी किस्मत आजमा चुकी थी, लेकिन उसका खाता तक नहीं खुला था. उसने 2017 के चुनावों से चार महीने पहले ही कांग्रेस  के पुराने दमदार नेता एन बीरेन सिंह को बीजेपी में शामिल कर लिया था. उस समय अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. उन्होंने बीरेन सिंह के दम पर ही बेजान पड़ी बीजेपी को प्रदेश में एक मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में खड़ा कर दिया.

एन बीरेन सिंह ने अपने जनाधार का इस्तेमाल कर बीजेपी को मजबूत बनाया और 21 सीटें जीत कर उसे दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बना डाला. अपने पुराने संपर्कों के चलते वे दोनों क्षेत्रीय दलों को बीजेपी के पाले में लाकर अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गए. महज चार महीने की मेहनत करके 15 साल से कायम कांग्रेस की सत्ता को उखाड़ फेंकने को अगर करिश्मा नहीं तो और क्या कहेंगे? क्या बीजेपी वही करिश्मा दोहरा पाएगी? 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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