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शांति वार्ता के लिए यूक्रेन का आमंत्रण अच्छी बात, लेकिन हमें रूस और दूसरे पक्षों को भी देखने की है जरूरत

यूक्रेन की उप विदेश मंत्री एमीन झापरोवा भारत की चार दिवसीय दौरे पर हैं. नई दिल्ली पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत हुआ. इस मौके पर उन्होंने कहा कि, मुझे लगता है कि एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में भारत वास्तव में दुनिया का विश्वगुरु है. मूल्यों और न्याय के लिए लड़ते हुए हमने यूक्रेन में यही महसूस किया है. उन्होंने भारत को  यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की के 10 बिंदुओं वाले शांति प्रस्ताव और ग्रेन फ्रॉम यूक्रेन इनिशिएटिव के लिए आमंत्रित किया है. ऐसे में सवाल है कि इस पर भारत का क्या रूख हो सकता है. क्या वह यूक्रेन के इस प्रस्ताव पर अमल करेगा?

यह अच्छी खबर है, लेकिन यह हमें देखना होगा कि यह जो आमंत्रण है उसका बैकग्राउंड क्या है. हमारी जो विदेश नीति है वो अभी के मुताबिक रूस और यूक्रेन में जो युद्ध चल रहा है, उस पर भारत ने किसी का पक्ष नहीं लिया है. हम न्यूट्रल हैं. ये पोजिशन तो हमारा एक दम क्लीयर है. मुझे ये लगता है कि ये जो प्रपोजल उन्होंने दिया है वो हमारे न्यूट्रल स्टेटस के विपरीत है. एक तो ये हिंदुस्तान कर नहीं सकता. इसलिए हमें पहले इसके डिटेल को देखना होगा. इससे पूर्व चीन ने भी रूस-यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की पहल की थी. लेकिन उसके बारे में भी युक्रेन ने कुछ नहीं कहा, इसलिए यह समझना आवश्यक हो जाता है कि जो यूक्रेन सरकार है ये दृष्टि उनकी अपनी है या फिर ये किसी एक व्यक्ति या संस्था का दृष्टिकोण है. अगर यह प्रस्ताव सरकार से सरकार तक है तब यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. इसके बाद हमें  इस पर सोच-समझकर रिप्लाई देना चाहिए.

हमारी जो अपनी विदेश नीति है, उसमें हमने चीजों को सपष्ट कर रखा है कि हम किसी एक का समर्थन नहीं करते हैं. लेकिन हम इसके साथ-साथ वैश्विक शांति बनी रहे उसके लिए भी प्रयास कर रहे हैं. भारत ने एक-दो बार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से भी युद्ध को बंद करने के लिए हर संभव प्रयास करने का आग्रह किया है. दूसरी बात यह कि ये जो स्टेटमेंट यूक्रेन की डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर ने नई दिल्ली में सोमवार को दिया है,  क्या उस शांति वार्ता में यूनाइटेड नेशन की भी कोई भूमिका रहेगी क्या? क्योंकि पहले जब रूस और यूक्रेन के बीच एग्रीमेंट हुआ था, उसमें जो गारंटर थे वो फ्रांस और जर्मनी थे. इसके लिए यूनाइटेड नेशन से स्वीकृति मिली थी. लेकिन वो नाकाम हो गया. क्योंकि यह जो मुद्दा है वो बहुत ही गंभीर है.

भारत की जो अंतरराष्ट्रीय हैसियत है, इज्जत है वो ये है कि हम एक शांतिपूर्ण देश हैं और अगर इस तरह की मध्यस्थता करना है तो हमें पहले यह देखना पड़ेगा हमें इसके लिए वास्तविक तौर पर किसने आमंत्रित किया है. उसका टर्म ऑफ रेफरेंस क्या है और हिंदुस्तान के अलावा और कौन से देशों की सहभागिता रहेगी. कोई भी देश अपनी विदेश नीति के तहत काम करता है. उसमें हम अपना राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हैं. रूस के साथ जो हमारा संबंध है वह पुराना है. उसके साथ संबंध होने से जो हमें सुविधाएं मिल रही हैं, वो शायद हमें कहीं और से नहीं मिले. चूंकि जब देशों के बीच संबंध स्थापित होते हैं तो भुगतान करने की भी बात होती है और उसे किस तरह से निभाया जाए वो भी बहुत महत्वपूर्ण होता है. मुझे लगता है कि यूक्रेन द्वारा विश्वगुरु कहने और इस तरह से शांति वार्ता के लिए भारत को आमंत्रित करने की बात कहने का अभी कुछ ज्यादा महत्व नहीं है.

हमारा जिस तरीके से राष्ट्रहित की पूर्ति होगी हमें उसी पर चलना चाहिए. ये नहीं कि कोई आया कुछ कह दिया और हम उस दिशा में पहल शुरु कर दें. हम अमेरिका से भी मिलिट्री सामान खरीदते हैं, इंग्लैड से भी खरीदते हैं, इजरायल से भी लेते हैं और हर देश से कुछ न कुछ खरीदते हैं. लेकिन हम पारंपरिक तौर पर रूस पर काफी हद तक निर्भर हैं. उससे हमें बहुत फायदा भी हुआ है. हमारा जो उसके साथ मिलिट्री अफेयर्स है उससे हमें काफी आत्मनिर्भरता मिली है. उसकी मदद से हमलोग अपने देश में ही काफी कुछ चीजें बनाने लगे हैं. कुछ हद तक अब निर्यात भी कर रह रहे हैं और ये सारी चीजें कोई एक-दो दिनों में नहीं होती है. यह एक लंबे समय के संबंधों को स्थापित करने के लिए किया जाता है. रूस के साथ हमारा संबंध बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन हम किसी के अधीन नहीं हैं. हमारी जो खासियत है वो यह कि हम अपने विदेश नीति को लेकर स्वतंत्र रहे हैं. हमने अब तक इसे लेकर कभी भी समझौता नहीं किया है. मुझे लगता है कि यूक्रेन के मंत्री के इस बयान से रूस के प्रति जो हमारी परंपरा रही है, उस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है)

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