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15 महीने की लड़ाई और युद्ध विराम का एलान, इजरायल-हमास की सुलह पर अब भी सस्पेंस

युद्ध और मानवीय त्रासदी से ग्रसित दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्र ‘पश्चिम एशिया’ में शांति स्थापति होने की प्रबल संभावनाएं बनने लगी हैं. खबरों के अनुसार 7 अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इजराइल के ऊपर किये गए आतंकी हमले के जवाब में  शुरू किये गए 15 महीने से जारी विनाशकारी युद्ध के बाद अब इजराइल और हमास युद्ध विराम समझौते पर पहुंच गए हैं. इस युद्ध विराम को लेकर अमरीका, क़तर और मिस्र द्वारा लम्बे समय से मध्यस्थता की जा रही थी, लेकिन इजराइल और हमास दोनों ही अपने-अपने पक्ष और अपनी-अपनी मांगो को लेकर बिलकुल भी झुकने को तैयार नहीं थे. अब लगता है कि बदलते हुए भू-राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए दोनों ही पक्षों ने अपनी मांगों में ढील देने के रवैये को अपना लिया है. 

समझौता तीन चरणों में होगा

हमास द्वारा अनुमोदित किया गया यह समझौता, जो रविवार 19 जनवरी 2025 से शुरू होगा, इसकी तीन चरणों में क्रियान्वित होने की उम्मीद है. तीन महीने की अवधि वाले इस समझौते के तहत मानवीय सहायता में वृद्धि होगी, इजरायली सेना की क्रमिक वापसी होगी, तथा फिलिस्तीनी कैदियों के बदले में इजरायली बंदियों की रिहाई होगी. कतर, मिस्र और संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता से हुए इस समझौते में फिलिस्तीनी क्षेत्र में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण प्रयासों के बारे में भी बात की गई है, जहां 7 अक्टूबर 2023 से लगातार इजरायली बमबारी में 60 प्रतिशत से अधिक इमारतें नष्ट और क्षतिग्रस्त हो गई हैं. हालांकि, इस लेख के लिखे जाने तक ऐसी ख़बरे भी आ रही हैं कि युद्धविराम और बंधकों की रिहाई के समझौते की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही इजरायल ने गाजा पर फिर से हवाई हमला किया है. एक ओर जहां फिलिस्तीन में इसको लेकर आशा, ख़ुशी और जश्न का माहौल है, वहीं इस युद्ध विराम को लेकर इजराइल में विरोध भी देखने को मिल रहा है. इजराइल के दक्षिणपंथी इसको एक हार के रूप में देख रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि इजराइल को हमास के सम्पूर्ण खात्मे तक युद्ध जारी रखना चाहिए था. दूसरा प्रश्न यह उठाया जा रहा है कि चूंकि हमास अभी भी ख़त्म नही हुआ है तो भविष्य में यह संभावनाएं बनी हुई हैं कि कुछ समय के बाद हमास इजराइल पर पुनः कोई आतंकी हमला कर सकता है.

हालांकि, यह युद्ध विराम पुरे विश्व के लिए लाभकारी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से डेढ़ वर्ष के अन्दर-अन्दर इस युद्ध का दायरा इजराइल और फिलिस्तीन से बढ़ कर सीरिया, लेबनान और यमन तक पहुंच गया था, ऐसी संभावाएं जताई जा रही थी की अगर युद्ध विराम नहीं होता है तो ईरान भी इसी जद में आ जाएगा और फ़ारस की खाड़ी, जो की वैश्विक उर्जा आयात की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण जल मार्ग है,  से व्यापार करना बहुत मुश्किल हो जाता, इसी लिए यह युद्ध विराम पूरे विश्व के लिए एक शुभ समाचार के रूप में उपस्थित हुआ है.

अमरीका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनका प्रशासन और 20 जनवरी के बाद अमरीका के राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने वाले डोनाल्ड ट्रंप दोनों ही इस युद्धविराम का श्रेय लेना चाहते हैं, लेकिन बाइडेन प्रशासन के ऊपर यह प्रश्न उठना तो स्वाभाविक है कि यदि इस समझौते का खाका काफ़ी दिन पहले तैयार हो गया था, जैसा कि ह्वाइट हाउस द्वारा कहा जा रहा है तो इसको अमली जामा पहनाने में इतना वक्त कैसे लग गया? वही दूसरी ओर ट्रंप यह कहते आए हैं कि 20 जनवरी (जिस दिन वो राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे) के पहले वो इस युद्ध को खत्म होते हुए देखना चाहते हैं. यह जानकारी भी सामने आई है कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ इजरायल और हमास के बीच गाजा युद्ध विराम समझौते के लिए मध्यस्थता करने के प्रयासों में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं. पारंपरिक कूटनीति में अपरंपरागत, उनके व्यवसाय-प्रथम दृष्टिकोण ने वार्ता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दा और भारत

भारतीय विदेश मंत्रालय ने सीजफायर समझौते पर खुशी जताई है. विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘हम बंधकों की रिहाई और गाजा में युद्ध विराम के लिए समझौते की घोषणा का स्वागत करते हैं. हमें उम्मीद है कि इससे गाजा के लोगों को मानवीय सहायता की सुरक्षित, निरंतर आपूर्ति हो सकेगी. हमने लगातार सभी बंधकों की रिहाई, युद्ध विराम और बातचीत और कूटनीति के रास्ते पर लौटने का आह्वान किया है.’ इस पूरे संघर्ष के दौरान भारत ने इजराइल का खुल कर विरोध तो नहीं किया, लेकिन समय-समय पर उसको अमानवीय कार्यों को रोकने के लिए ज़रुर चेताया. इसके साथ-साथ भारत ने कई बार गाजा में विस्थापित फिलिस्तीनियों को मानवीय सहायता भी पंहुचाई. गौरतलब है कि पश्चिम एशिया भारत का विस्तृत पड़ोस (एक्सटेंडेड नेबरहुड) है जहां बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं. ये लोग भारत में बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भी भेजते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है. ऐसे में यदि इस क्षेत्र में अशांति होती है तो उसका सीधा दुष्परिणाम भारत को झेलना पड़ता है.

भारत ने अपनी स्वतंत्रता के बाद से ही फिलिस्तीन का समर्थन किया और दशकों तक इजराइल से दूरी बना कर रखी. लम्बे समय तक जारी रही इस नीति के पीछे भारत की सामरिक मजबूरी के अलावा वोट बैंक की राजनीति भी एक प्रमुख कारण मानी जाती थी. हालांकि, नब्बे के दशक से भारतीय विदेश नीति में व्यापक बदलाव देखने को मिला. 1992 से भारत ने न सिर्फ अधिकारिक रूप से इजराइल से अपने सम्बन्ध स्थापति किये, बल्कि कई मोर्चों पर इजराइल का सहयोग भी लिया. वैसे, तब भी फिलिस्तीन के एक संप्रभु राष्ट्र में स्थापित किये जाने का का मुद्दा भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख स्तम्भ बना रहा. 2014 के बाद से सत्ता में आई मोदी सरकार ने भी इस नीति को अधिकारिक रूप से जारी तो रखा, लेकिन इसके अन्दर कुछ व्यापक बदलाव भी किये, जिसमे सबसे महत्वपूर्ण था दोनों देशों से अपने सम्बन्ध को स्वतंत्र रूप से बनाए रखना, जिसको विदेश नीति के जानकर भारत की ‘डी-हायफ़नेशन’ नीति का नाम देते हैं. एक ओर जहां हमास द्वारा इजराइल के ऊपर किये गए आतंकी हमलो की आलोचना करने में प्रधानमंत्री मोदी सबसे आगे रहे, वहीं समय-समय पर भारत ने युद्ध को रोके जाने की अपील भी की.

भारत की दृष्टि से देखें तो यह युद्धविराम उसके सामरिक और आर्थिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. कूटनीतिक लिहाज़ से देखें तो यह युद्धविराम भारत के लिए बेहद ज़रूरी था क्योंकि जिस तरह से इजराइल गाजा के लोगों के ऊपर लगातार बमबारी कर रहा था (जिसमे काफ़ी आम नागरिकों के जान-माल को भी भारी नुक्सान हो रहा था), भारत जैसे लोकतान्त्रिक और विश्व शांति के पक्षधर देश के लिए इजराइल के पक्ष में खड़े रहना मुश्किल होता जा रहा था. इसके अलावा अगर वास्तव में दोनों पक्ष इस समझौते को मान कर शांति स्थापित करते हैं तो भारत अपनी महत्वाकांक्षी IMEEC (इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकनोमिक कॉरिडोर) योजना को पुनः प्रारभ करने की दिशा में सोच सकता है. सनद रहे कि यह योजना भारत द्वारा 2023 में ‘जी20 शिखर सम्मलेन’ की मेज़बानी के दौरान घोषित की गयी थी. इस योजना की सफलता के लिए इजराइल और सऊदी अरब के बीच संबंधों का सामान्यीकरण और पश्चिम एशिया में शांति दो सबसे ज़रूरी पहलु थे. परन्तु इजराइल हमास जंग के शुरू होने से इसका भविष्य अधर में लटक गया था. अब इसके ऊपर दोबारा काम करने की दिशा में सोचा जा सकता है.

कितना सफल होगा यह युद्ध विराम

हमसा और इजराइल के बीच ये कोई पहला युद्ध विराम नहीं है. और न ही यह आखिरी होगा. अपने अद्वितीय सैन्य, अमरीका द्वारा दिए गए ‘अनकंडीशनल सपोर्ट’ और सामरिक क्षमता के बावजूद यदि इजराइल हमास को समाप्त नहीं कर पाया तो यह बहुर गहरे सवाल पैदा करता है. हमास द्वारा 2023 में इजरायल के ऊपर किए गए आतंकी हमले के पहले तक पूरा विश्व इस गफलत में जीने लगा था कि फिलिस्तीन के मुद्दे को भुला कर के ये क्षेत्र अब बहुत आगे निकल चुका है. इस अतिरिक्त अरब देशों ने भी फिलिस्तीन को एक संप्रभु राष्ट्र बनाने के विषय के बजाए इजरायल से मधुर संबंधन रख कर अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया था. परंतु एक ही घटना ने यह पुनः स्थापित कर दिया कि फिलिस्तीन के मुद्दे को सुलझाए बिना इस क्षेत्र में लंबे समय तक के लिए शांति लाना लगभग असंभव है. आज इजराइल को उसी हमास से वार्ता करनी पद रही है जिसको वो आतंकी संगठन मान कर पूर्णतः समाप्त करने की कोशिश में लगा हुआ था, लेकिन जिसमे वो नाकामयाब हो गया. जब तक इजराइल एवं उसके सबसे बड़े सहयोगी अमरीका द्वारा भारत समेत पूरे विश्व द्वारा समर्थित द्वि-राष्ट्र सिद्धांत यानि ‘टू स्टेट्स सलूशन’, जिसके अंतर्गत इजराइल और फिलिस्तीन के रूप में दो संप्रभु राष्ट्र अस्तित्व में आ सकें, को माना नहीं जाता तब तक यह कह पाना बहुत मुश्किल है की पश्चिम एशिया में पूर्ण शांति का दौर कब आएगा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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