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लखनऊ, एबीपी गंगा: लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के साथ-साथ यूपी की सत्ता का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र भी है। प्रदेश की विधायिका और कार्यपालिका का सेंटर भी लखनऊ ही है। लखनऊ की हमेशा से पहचान एक वीआईपी इलाके की रही है। लखनऊ की एक पहचान नवाबों से भी जुड़ी है, इसे नवाबों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। यहां सिर्फ तहजीब ही नवाबी नहीं है, राजनीतिक माहौल में भी ये नवाबी खूब नजर आती है।

राष्ट्रीय स्तर पर हो पहचान

लखनऊ की राजनीति को लंबे समय से बेहद करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल का कहना है कि जिस तरह के खालिस नेता 60 और 70 के दशक में लखनऊ में हुआ करते थे वो अब कहीं देखने को नहीं मिलते। लाल कहते हैं कि लखनऊ ने अपना प्रतिनिधित्व हमेशा ऐसे शख्स के हाथों में सौंपा है जिसकी नेशनल लेवल पर एक पहचान रही है। 1991 के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी यहां से जीते तो उसके बाद से ही लखनऊ के लोगों ने मानो ये तय कर लिया कि अब जिसे भी यहां से संसद भेजेंगे वो ऐसा व्यक्ति होगा जिसकी राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक हैसियत हो, यहीं वजह रही है कि पहले पांच बार लखनऊ ने अटल जी को यहां से जिता कर लोकसभा भेजा फिर लालजी टंडन को और अब राजनाथ सिंह को।

नहीं चला सांप्रदायिक एजेंडा

रतनमणि लाल कहते हैं कि लखनऊ ने हमेशा ऐसे राजनेता को पसंद किया है जिसकी छवि कभी सांप्रदायिक न रही हो। लखनऊ में जो आबादी है वो मिक्स पॉप्यूलेशन है यहां हिंदू भी हैं तो मुसलमान भी अच्छी खासी संख्या में हैं। लखनऊ ने हमेशा साफ और जाति धर्म से परे राजनीति करने वाले शख्स को ही मौका दिया है, यहां कभी सांप्रदायिक एजेंडा नहीं चला। नवाबों का शहर विकास की बात करता है। लखनऊ में रहने वाले संविधान के जानकार डॉ पीएम त्रिपाठी का कहना है कि लखनऊ गंगा जमुनी तहजीब का शहर है, यहां के लोग शांतिप्रिय हैं और ऐसे ही नेता को वो पसंद भी करते हैं।

दूसरे शहरों से अलग है लखनऊ की फिजा

लखनऊ में  अन्य दलों का जो प्रतिनिधित्व होना चाहिए वो नहीं दिखता है। कई चुनावों से बीजेपी के अलावा दूसरे दल यहां अपना खाता नहीं खोल पाए हैं जाहिर है शायद नवाबों के शहर ने ऐसे लोगों को मौका नहीं दिया जो लखनऊ के नेचर से मैच ने खाते हों। लखनऊ की फिजा यूपी के दूसरे शहरों से अलग है। यहां सर्व समावेशी और गंगा जमुनी विचारधारा वालों को ही सफलता मिलती है। तोड़ने की राजनीति करने वाले यहां सफल नहीं होते हैं, इसकी एक वजह ये भी है कि यहां शहरी आबादी ज्यादा है।

विवादों को नहीं मिली हवा

ईरान के बाद शियाओं के धर्म स्थल के मामले में लखनऊ का पूरी दुनिया में दूसरा नंबर आता है। यहां कभी हिंदू-मुस्लिम के बीच धार्मिक मामलों को लेकर विवाद की बात सामने नहीं आई है। पीएम त्रिपाठी कहते हैं कि हालांकि पिछले कुछ सालों में यहां राजनीतिक शून्यता जरूर नजर आई है और सियासतदान राजनीति को जाति-धर्म के आधार पर बांटने में जुटे नजर आ रहे हैं।

साफ सुथरी राजनीति चाहता है लखनऊ

लखनऊ को साफ सुथरी और ईमानदार राजनीति पसंद है। यहां के लोगों को स्कैंडल करने वाले लोग पसंद नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणिलाल कहते हैं कि भले ही अंबेडकर पार्क ने लखनऊ की शान को बढ़ाया हो लेकिन जब इसमें पैसों की हेर-फेर की बात सामने आई तो शहर के लोगों ने इसे पसंद नहीं किया और शायद यही वजह रही कि बीएसपी अपने सबसे बेहतर समय में भी यहां कभी जीत हासिल नहीं कर पाई। पीएम त्रिपा कहते हैं कि लखनऊ को ऐसी राजनीति चाहिए जहां सबकी बात हो, अगर विकास हो तो सबका हो। जाति धर्म के आधार पर इसमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

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