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भारत-चीन बातचीत की मेज पर पलट चुका है शर्तों का पासा, जानें क्या है दोनों देशों की मांग?

पेंगोंग झील के इलाके में रणनीतिक बिसात पर पहले ही ऊंचाई के मोर्चे ले चुका भारत अब बराबरी के दबाव पर मोलभाव कर रहा है.

नई दिल्ली: लद्दाख में पेंगोंग झील के दक्षिणी मोर्चे पर मिले करारे झटके ने चीन की हेकड़ी निकाल दी है. दिखावे के लिए चीन भले ही त्यौरियां चढ़ा रहा हो, लेकिन गलवान घाटी के बाद पेंगोंग के करीब पहाड़ी मोर्चों पर मिली शिकस्त ने उसके सैन्य तंत्र को झकझोर दिया है. इतना ही नहीं ब्रिगेडियर स्तर बातचीत के दौरान भी भारत अब चीन की शर्तों पर राजी होने की बजाय अब अपने मुद्दे मनवाने पर है.

सूत्रों के मुताबिक, चुशूल इलाके में बीते चार दिनों से जारी ब्रिगेडियर रैंक अधिकारियों की वार्ताओं में चीनी खेमा भारत के साथ समाधान का रास्ता निकालने में नाकाम रहा है. हालांकि, इसकी बड़ी वजह चीन की ज़िद है. क्योंकि वो भारत से तो पहाड़ी खाली करवाना चाहता है. लेकिन अपने सैनिकों को पीछे लेने को तैयार नहीं है.

पेंगोंग झील के इलाके में रणनीतिक बिसात पर पहले ही ऊंचाई के मोर्चे ले चुका भारत अब बराबरी के दबाव पर मोलभाव कर रहा है. वहीं अपने सरकारी बयानों में भारत पर एलएसी लांघने और ज़मीन लेने का आरोप लगा चुके चीन पर यह दिखाने का दबाव ज़्यादा है कि उसने मामले को सुलझा लिया है.

सूत्र बताते हैं कि बैठक के लिए हर दिन पहुंच रहे भारतीय अधिकारी साफ कर चुके हैं कि चीनी सेना के अग्रिम मोर्चों से पीछे हटने और अपना सैनिक जमावड़ा कम करने से कम की सूरत में कुछ भी मंजूर नहीं. बताया जाता है कि चुशूल से रेचिन ला के इलाके में 29-30 अगस्त की रात और फिर 31 अगस्त को हुई भारत की कार्रवाई के बाद वेस्टर्न थियेटर कमांड के इलाके में तैनात कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को बीजिंग तलब किया गया है. ज़ाहिर तौर पर चीन के लिए भारत के साथ सैन्य तनाव के दौरान तीन महीनों में मिला यह दूसरा बड़ा झटका है.

गलवान घाटी में आक्रामक तेवरों के साथ आगे बढ़ने के बावजूद सीधे संघर्ष में चीन की सेना ने भारत से अधिक सैनिक खोए. भारतीय सैनिक आंकलन के मुताबिक गलवान घाटी में 15 जून की रात हुए टकराव में चीन के करीब 35 सैनिक मारे गए, जबकि इस लड़ाई में भारत के एक कमांडिंग अफसर समेत 20 सैनिक शहीद हुए थे. स्वाभाविक तौर पर गलवान में चीन ने खोया ज़्यादा और पाया कुछ नहीं.

हालांकि, लद्दाख के मोर्चे पर दबाव की सैन्य बिसात का पूरा प्लान लेकर आए चीन ने सोचा नहीं होगा कि अबकी बार मुक़ाबले में उसे अपने सैनिक भी खोने पड़ेंगे और 1962 में हथियाई ज़मीन के हिस्से भी खोने पड़ेंगे. दरअसल, चीन की चाल चुशूल इलाके में भी दबाव का नया मोर्चा बनाने की थी. लेकिन अबकी बार उसकी योजना मात खा गई. चीनी बख्तरबंद गाड़िया और सैनिक आगे बढ़ते इसके पहले ही भारतीय सैनिक स्पांगुर गैपक के करीब उनका रास्ता रोकने के लिए तैयार थे. इतना ही नहीं भारतीय सैनिकों के क़ई पहाड़ियों पर पोजीशन लेने के बाद चीन के पास कदम पीछे कर, अपने कैम्प में लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था.

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