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तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री बने करूणानीधि आज अपनी जमीन तलाश रहे हैं !

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नई दिल्ली: युवा भारत जब राजनीति में बढ़ती उम्र के नेताओं पर बहस कर रहा था उस समय 92 साल के मुथुवेल करुणानिधि अपने राज्य की जनता से चुनाव में एक आखिरी मौका देने की गुजारिश कर रहे थे. करुणानिधि मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने जीते जी राज्य की बागडोर अपने छोटे बेटे स्टालिन को सौंपना चाहते थे. लेकिन तमिलनाडु के लोगों ने 68 साल की जयललिता पर फिर से भरोसा करना बेहतर समझा. इस साल चुनाव मैदान में जब मुथुवेल करुणानिधि व्हील चेयर पर आकर अपनी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के प्रचार अभियान की शुरुआत की तो ये अपने आप में एक तरह का रिकॉर्ड भी था. ज्यादा उम्र होने की वजह से करुणानिधि के लिए आक्रामक चुनाव प्रचार करना मुश्किल था. इसलिए उन्होंने चुनाव की कमान अपने युवराज एमके स्टालिन को सौंपी थी. स्टालिन अपने पिता का संदेश लेकर पूरे प्रदेश का दौरा करते और लोगों के बीच ये समझाने की कोशिश करते कि करुणानिधि की वापसी तमिलनाडु में क्यों जरूरी है. डीएमके ने पूर्ण शराबबंदी, लोकायुक्त की स्थापना से लेकर दूध की कीमत में कटौती करने तक के वादे किये लेकिन जनता ने डीएमके पर भरोसा नहीं किया. तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से करुणानिधि और जयललिता के आसपास घूमती रही है. करीब तीन दशकों से डीएमके और एआईडीएमके बारी-बारी से सत्ता में रही हैं. एक बार डीएमके जीतती है तो अगली बार जनता एआईएडीएमके को चुनती है पर इस बार ऐसा नहीं हुआ. इसकी बड़ी वजह करुणानिधि का पिछला कार्यकाल माना जा रहा है. करुणानिधि पर परिवारवाद को बढ़ावा देने से लेकर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंखें मूंदने तक का आरोप लगता रहा है जिसे जनता भूलने को अब तक तैयार नहीं है. करुणानिधि ने भारतीय राजनीति को करीब 6 दशक से बेहद करीब से देखा है. करुणानिधि जब पहली बार विधायक बने उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे. जब करिश्माई करुणानिधि तमिलनाडु के पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उस समय भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं. करुणानिधि जब तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे. करुणानिधि जब चौथी बार मुख्यमंत्री बने तो भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव थे. करुणानिधि जब पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने तो भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे. करुणानिधि जब छठी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए चुनाव मैदान में उतरे उस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. साल 2011. तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव में करुणानिधि के डीएमके का सूपड़ा साफ हो गया था. 234 विधानसभा सीट की असेंबली में करुणानिधि की पार्टी महज 41 सीटों पर सिमट कर रह गई. अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बुरी हार झेलने वाले डीएमके अध्यक्ष और मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने कहा कि तमिलनाडु की जनता ने उन्हें सही आराम दिया है. तब 87 साल के करुणानिधि ने संकेत दिया कि जनता ने बूढ़े होते कंधों से काम का बोझ हटा लिया..... लगता है करुणानिधि ये बात नहीं समझ सके कि जनता इस बार भी अपना इरादा नहीं बदलने वाली है. सत्ता नहीं रहने पर जब नेता अंधेरे में खो जाते हैं ऐसे नेताओं से अलग करुणानिधि अपने लिए नई राह बनाते हैं. खुद की अहमियत बनाए रखने के लिए कभी वो हिंदी-विरोध का मुद्दा उठाते हैं तो कभी श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा. उनकी ये नीति हमेशा उन्हें चर्चा के केंद्र में बनाए रखती है. तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके एम करुणानिधि को उनके चाहने वाले कलाईनार कहकर बुलाते हैं. तमिल में कलाईनार का मतलब तमिल कला का विद्वान होता है. करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तमिलनाडु के तिरुक्कुवलइ में हुआ था. उनका बचपन का नाम दक्षिणमूर्ति था. वे तमिल सिनेमा जगत के एक नाटककार और पटकथा लेखक भी हैं. राजनीति में इन्हें जितनी शोहरत मिली उतनी ही लोकप्रियता इन्हें फिल्मों की कहानी लिखने में मिली. एम करुणानिधि ने अपने राजनीतिक सफर की उड़ान 14 साल की उम्र से ही कर दी थी. जस्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर उन्होंने हिंदी विरोधी आंदोलन में भाग लिया. हिंदी विरोधी आंदोलन ने उनके अंदर के नेता को जगा दिया था. इस आंदोलन के दौरान करुणानिधि को जेल भी जाना पड़ा था. एक जमाने में दक्षिण में हिंदी विरोधी आंदोलन का असर कुछ ऐसा हुआ कि तमिलनाडु के स्टेशनों और बस स्टैंडों का नाम हिंदी से बदल कर तमिल में लिखा जाने लगा. तमिल फिल्मों में काम करने की वजह से करुणानिधि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री  एमजी रामचंद्रन के करीब आ गए. रामचंद्रन तमिलनाडु के जाने माने अभिनेता थे और उन्हें एमजीआर के नाम से जाना जाता था. करुणानिधि के लिखे डायलॉग एमजीआर इस अंदाज के साथ बोलते थे कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे. ठीक वैसे ही जैसे सलीम-जावेद के लिख डायलॉग उत्तर भारतीय दर्शकों को अपनी ओर खींचते हैं. फिल्मों के जरिए दिए गए सामाजिक संदेश की वजह से डीएमके का  सामाजिक आधार मजबूत हुआ और एमजीआर बहुत बड़े हीरो बन गए. करुणानिधि अभिनेता एमजीआर को राजनीति में लाए थे लेकिन जब उन्हें ये अहसास हुआ कि एमजीआर पार्टी कार्यकर्ताओं में उनसे ज़्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं तो करुणानिधि ने उनका कद छोटा कर दिया. इसकी वजह से डीएमके में विभाजन हुआ और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम या एआईएडीएमके का जन्म हुआ जिसकी मुखिया अब जयललिता हैं.करुणानिधि और जयललिता के बीच तब से राजनीतिक दुश्मनी चली आ रही है. सत्ता में रहते हुए जयललिता ने कलाईनार को भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल भिजवा दिया था. करुणानिधि में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ संबंध बनाए रखने की अदभुत क्षमता है. जयललिता जहां कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से ही मिलती हैं वहीं करुणानिधि अपने कार्यकर्ताओं से रोज मिलते हैं. करुणानिधि का परिवार विवादों से घिरा रहा. उनकी बेटी कनिमोड़ी पर 2 जी घोटाले के आंच आए. करुणानिधि पर वंशवाद का आरोप लगता है. उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में अपने बेटे स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी बनाया है. तमिलनाडु की राजनीति में 60 साल से सक्रिय करुणानिधि अक्सर अपने बयानों की वजह से विवादों में रहे हैं. सेतुसमुद्रम विवाद के जवाब में करूणानिधि ने हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के वजूद पर ही सवाल उठा दिए थे. उनके बयान पर खासा बवाल हुआ था. तमिलनाडु में करुणानिधि को एक तमिल विद्वान के रूप में काफी इज्जत दी जाती है. अपनी वैज्ञानिक सोच के लिए भी वो जाने जाते हैं. करुणानिधि खुद को नास्तिक कहते हैं पर कहते हैं बृहस्पति ग्रह को शांत करने के लिए वो पीला वस्त्र पहनते हैं. क्या इत्तफाक है जिस दिन चुनाव परिणाम आए वो गुरुवार का दिन था लेकिन शायद गुरु को सत्ता में उनकी वापसी मंजूर नहीं थी.
Published at : 19 May 2016 05:57 PM (IST)
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