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पूर्ण शराबबंदी का अभिमन्यु बिहार में कितने दिन जीवित रहेगा?

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पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए- यह महान उक्ति आम लोगों से लेकर फ़िल्मी गानों तक में मशहूर है, लेकिन अब बहाना चाहे कितना ही महान क्यों न हो, बिहार में एक बूंद शराब भी नहीं मिलने वाली. यानी देसी ठर्रा से लेकर विलायती और ग़रीबों का टॉनिक समझी जाने वाली ताड़ी बनाने-बेचने पर भी टोटल बैन लग गया है. नतीज़ा- बेतिया के मेरे हमउम्र शमशुद्दीन को दो दिनों से ठर्रा नहीं मिला तो वह पागलों की तरह घर में रखे साबुन खाने लगे. पूर्वी चंपारण जिले के कुंडवा चैनपुर थाने में तैनात दारोगा रघुनंदन बेसरा (उम्र 50 वर्ष) शरीर में शराब की कमी के चलते कोर्ट में गश खाकर गिर पड़े और उन्हें जीप में लादकर मोतिहारी के सदर अस्पताल ले जाना पड़ा. सीवान के नशामुक्ति केंद्र में पिछले 5 दिनों के दौरान ऐसे 54 तरल-गरलप्रेमी दाख़िल कराए जा चुके हैं, जिनमें से दो की हालत नाज़ुक होने पर उन्हें पटना के पीपीएमसीएच रेफर करना पड़ा. अफ़वाह तो यहां तक उड़ गई है कि जिसके घर में 5 किलो से ज़्यादा महुआ पाया गया, उसे पुलिस पकड़ ले जाएगी. यह सब देखते हुए फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े बिहार के मेरे एक मित्र धनंजय कुमार ने टिप्पणी की कि वीणा के तार इतने मत कसो कि वे टूट ही जाएं. पूर्व सीएम जीतनराम मांझी इस बात को लेकर ख़फा हैं कि जिस ‘ताड़ी’ का उन्होंने 12 वर्ष तक लगातार पान किया, उसे नीतीश ने बनवास दे दिया है!...और पूर्व में बीफ खाने के समर्थन में ट्वीट कर चुके किसी ज़माने के यूथ आइकॉन ऋषि कपूर साहब ने ट्वीट की झड़ी लगाकर कहा- ''वाह नीतीश! शराब के लिए दस साल की सज़ा और हथियार रखने के लिए पांच साल? इस तरह बिहार को फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा होगा. अवैध शराब का धंधा बढ़ेगा. दुनिया भर में शराबबंदी फेल रही है. जागो, आपको 3000 करोड़ रुपए रेवन्यू का भी नुकसान होगा.” शराबबंदी के विरोध में रेवेन्यू के नुकसान का तर्क नया नहीं है. नीतीश कुमार ने ख़ुद माना है कि इस निर्णय से राज्य को सालाना 4000-5000 करोड़ रुपयों का नुकसान होगा. लेकिन इसे नीतीश और उनके मंत्रिमंडल का साहस भरा क़दम माना जाना चाहिए, जो सही और नैतिक दिशा में उठा है. यक्षप्रश्न इसकी सफलता और असफलता का है. गुजरात, नागालैंड और मिजोरम को छोड़ दिया जाए तो देश के कई राज्य अपने यहां पूर्ण अथवा आंशिक शराबबंदी लागू करके कई बार अपने हाथ जला चुके हैं. ख़ुद बिहार में समाजवादी दिग्गज कर्पूरी ठाकुर ने 1977-78 के दौरान शराबबंदी लागू करने की कोशिश की थी लेकिन पियक्कड़ों और शराब माफ़िया ने उनके इरादों पर पानी फेर दिया था. आशंका इसलिए भी जताई जा रही है कि पूर्ण शराबबंदी दुनिया में आजतक कहीं कामयाब नहीं हुई. अध्ययनों से भी यह साबित हुआ है कि इससे शराब के अवैध उत्पादन और तस्करी को बढ़ावा मिलता है तथा कमाऊ पर्यटन उद्योग को ज़ोर का झटका बड़े ज़ोर से लगता है. अमेरिका जैसे उदार, आधुनिक और प्रगतिशील लोकतांत्रिक देश ने 20वीं सदी की शुरुआत में अपने यहां एल्कोहल की बिक्री प्रतिबंधित की तो पूरे यूएसए में ख़तरनाक शराब माफ़िया का उत्थान हुआ और शराब तस्करी चरम पर पहुंच गई. हार कर अमेरिकी सरकार को प्रतिबंध वापस लेना पड़ा था. स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी और पहले पीएम नेहरू के बीच भी देश में शराबबंदी को लेकर लंबी बहस चली थी. लेकिन तब भी इसी रेवन्यू वाले तर्क की जीत हुई थी. नेहरू जी का तर्क था कि शराब की बिक्री से सरकारों को भारी आमदनी होती है जिसे समाज की भलाई करने, स्कूल-कॉलेज खोलने और लोगों को चिकित्सा सुविधाएं देने में ख़र्च किया जा सकता है. राजगोपालाचारी कहते थे कि आय तो होती है लेकिन शराब पीने से लाखों लोगों और परिवारों की ज़िंदगी भी तबाह होती है. यही राजगोपालाचारी जब 1952 में मद्रास स्टेट (तटीय आंध्र एवं रायलसीमा शामिल) के सीएम बने तो उन्होंने स्टेट में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी थी. हालांकि यह के. कामराज के ज़माने तक ही जारी रह सकी, अर्थात जब तक सीएम कांग्रेस के बनते रहे. शराबबंदी तो नए बने आंध्र प्रदेश में भी कई बार लागू हुई लेकिन आख़िरकार 1997 में तत्कालीन सीएम चंद्रबाबू नायडू ने यह तर्क देते हुए राज्य से शराबबंदी उठा ली थी कि सीमावर्ती राज्यों से उनके यहां भारी मात्रा में शराब की तस्करी हो रही है. यानी तस्करी के चलते यहां भी असफलता ही हाथ लगी. करुणानिधि ने 1969 में तमिलनाडु का सीएम बनते ही शराबबंदी उठाने की कवायद शुरू कर दी थी. इसके लिए उन्होंने भी यही तर्क दिया था कि ज़हरीली शराब राज्य का बेड़ा गर्क कर रही है और तस्करी के चलते आर्थिक नुकसान हो रहा है. गुजरात, नागालैंड और मिजोरम में पूर्ण पाबंदी भले लागू है लेकिन गुजरात और नागालैंड का हाल बहुत उत्साहजनक नहीं है. गुजरात की सीमा पर शराब बनाने और पीने वालों की मौज है. मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में सीमावर्ती दमन की बिना ड्यूटी वाली अवैध शराब धड़ल्ले से बिकती है. 1 मई 1960 को गुजरात और महाराष्ट्र के जन्म के साथ ही बाम्बे प्रोहीबीशन एक्ट लागू हो गया था. लेकिन गुजरात ने इसे अक्षरशः अपनाया और महाराष्ट्र शराब की दूकानें और बार खोलने के लाइसेंस बांटने लगा. महाराष्ट्र में ज़हरीली शराब पीने से अब तक हज़ारों जाने जा चुकी हैं लेकिन आज राज्य में उदारता इतनी बढ़ चुकी है कि हर किमी में बीयर शॉप दिख जाएगी, जगह-जगह वाइन शॉप मिल जाएगी. जबकि उसी एक्ट में संशोधन करके साल 2009 में गुजरात भारत का अकेला ऐसा राज्य बना, जहां अवैध शराब बनाने, रखने, पीने और बेचने वालों के लिए मृत्युदंड की सज़ा तक का प्रावधान है. यह बात और है कि गुजरात में शराब की कालाबाज़ारी ज़ोरों पर है. कोई सुराप्रेमी वहां से ‘सूखा’ नहीं लौटता. ‘ऑन डिमांड’ सप्लाई करने वाले को स्थानीय कूट भाषा में वहां ‘फोल्डर’ कहा जाता है. केरल और केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप वर्ष 2014 से अपने यहां चरणबद्ध तरीक़े से शराबबंदी लागू करने की राह पर चल रहे हैं. मणिपुर में भी शराबबंदी कोई झटके में नहीं लगी. अप्रैल 1991 में आरके रणवीर सिंह की सरकार ने इम्फाल ईस्ट, इम्फाल वेस्ट, थाउबाल और बिशुनपुन पुर ज़िलों में इसे आयद किया था. वर्ष 2002 में इकराम इबोबी सिंह की सरकार ने चंदेल, चूड़चंद्रपुर, सेनापति, तामेंगलोंग़ और उखरूल ज़िलों से यह प्रतिबंध हटा लिया था. आंशिक शराबबंदी के बावजूद वहां स्थानीय दारू अशाबा और अतिम्बा आज भी बिकती है और अधिकारी नज़रें घुमा लेते हैं. पूर्ण शराबबंदी वाले नागालैंड का भी कमोबेश यही हाल है. नागालैंड लिक़र टोटल प्रोहीबीशन एक्ट लागू होने के बावजूद दीमापुर में सैकड़ों अवैध बार खुले मिल जाएंगे. यहां पड़ोसी राज्य असम से शराब की बड़े पैमाने पर तस्करी होती है. कुल मिलाकर तस्वीर यही बनती है कि चाहे जितनी पाबंदी लगा दी जाए, ‘देवता’ अपने ‘सोमरस’ का इंतजाम कर ही लेते हैं. जो इसका इंतजाम नहीं कर पाते वे दिमाग़ में नशा पैदा करने के लिए छिपकली तक मार कर खा जाते हैं. बिहार में पड़ोसी राज्यों झारखंड, यूपी और पश्चिम बंगाल के अलावा नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से शराब तस्करी की पूरी-पूरी आशंका है जिसे नीतीश कुमार ने यह युक्ति बताते हुए निर्मूल करने की कोशिश की है कि बिहार से होकर गुज़रने वाले शराब कंटेनरों पर डिजिटल लॉक की व्यवस्था की गई है जो राज्य की सीमा से बाहर जाने पर ही खोले जा सकेंगे. उनका यह भी दावा है कि पूर्ण शराबबंदी से बिहार को रेवन्यू का नुकसान नहीं बल्कि 8000 करोड़ रुपयों का फ़ायदा होगा. इसका गणित शायद वह बाद में समझाएं लेकिन एक बड़ा फ़ायदा तो स्पष्ट नज़र आता है कि शराबबंदी से चुनावों में वोटों की बिक्री पर थोड़ी लगाम लग सकेगी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी देश में पूर्ण शराबबंदी के पक्षधर थे. उनका कहना था कि शराब भ्रष्टाचार, अपराध और नैतिक पतन का मूल है. वह सशक्त राष्ट्र के लिए नशा एवं अपराधमुक्त समाज की कल्पना करते थे. इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि गांधी के चेले ही रेवन्यू के चक्कर में पड़ गए और राष्ट्र को भ्रष्टाचार एवं अपराध के दलदल में झोंक दिया. आज जब नीतीश कुमार ने गांधी जी की सोच पर अमल करने की कोशिश की है तो उसे सकारात्मक दृष्टि से देखने और उनकी पहल का समर्थन करने की ज़रूरत है. शराब से होने वाली आय के मुक़ाबले नशामुक्त समाज तैयार करना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है. अन्य राज्यों को भी इसका अनुसरण करना चाहिए. लेकिन विडंबना देखिए कि बिहार में 1 अप्रैल से शराबबंदी आयद हुई और इसी 1 अप्रैल से ‘चाल ,चरित्र और चेहरा’ की दुहाई देने वाली भाजपा की शिवराज सरकार ने एमपी में पिछले दरवाज़े से शराबख़ोरी को बढ़ावा देने का क़दम उठाते हुए 1 अप्रैल से ही बारों को लाइसेंस शुल्क में 50 हज़ार से लेकर 3.5 लाख रुपए की रियायत दे दी. क्या शिवराज सरकार रेवन्यू का संतुलन बनाने के लिए शराब से होने वाली आय की तुलना लोगों की ज़िंदगी से कर रही है? क्या इस आय की भरपाई का एमपी सरकार के पास और कोई विकल्प नहीं बचा है? क्या लोगों के स्वास्थ्य से क़ीमती है शराब से होने वाली आय? क्या शराब पीकर बीमार और तबाह हुए लोगों के ख़र्च से ज़्यादा बढ़कर है यह आय? दरअसल यह सोच का अंतर है. बिहार में पूर्ण शराबबंदी के फैसले को महज नीतीश के चुनावी वादे की पूर्ति नहीं देखा जाना चाहिए. राजनैतिक कुटिलताओं, व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, शराब माफ़िया और तस्करी के चक्रव्यूह में घिरा पूर्ण शराबबंदी का अभिमन्यु बिहार में कितने दिन जीवित रहेगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन मैं उस नज़ारे की कल्पना करके ही रोमांचित हो उठता हूं जब बिहार विधानसभा के अंदर सभी 243 विधायकों ने शराब से तौबा की होगी! डीजीपी पीके ठाकुर द्वारा पूरे राज्य के हज़ारों सिपाहियों और पुलिस अधिकारियों को शराब से दूर रहने की की भीष्म प्रतिज्ञा की होगी!! स्कूली बच्चों के अभिभावकों ने शपथ-पत्र पर दस्तख़त करके लिखा होगा कि अब से वे न तो ‘पिएंगे न पिलाएंगे’!!! https://twitter.com/VijayshankarC https://www.facebook.com/vijayshankar.chaturvedi
Published at : 07 Apr 2016 10:42 AM (IST)
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