चीनी मिल खोलने में कितना खर्चा आता है, यहां गन्ने से कैसे बनती है चीनी?
Sugar Mill Cost: देश में चीनी की कीमतों में उछाल देखने को मिला है. इसी बीच आइए जानते हैं कि एक चीनी मिल को खोलने में कितना खर्चा आता है.

- चीनी मिल स्थापना में क्षमतानुसार 3 करोड़ से 400 करोड़ तक खर्च।
- आधुनिक मिलें इथेनॉल, बिजली उत्पादन से निवेश 50-100 करोड़ बढ़ाती हैं।
- लाइसेंसिंग और पर्याप्त भूमि मिल स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक।
Sugar Mill Cost: देश में चीनी की कीमतों में अचानक उछाल आया है. वैसे तो खेत में पहुंचने पर गन्ना एक सामान्य फसल की तरह लग सकता है, लेकिन इसे दुकानों में बिकने वाले सफेद क्रिस्टल में बदलने के लिए भारी मशीनरी, बॉयलर, वैक्यूम सिस्टम और सेंट्रीफ्यूज से जुड़े एक बड़े औद्योगिक सेटअप की जरूरत होती है. गन्ने को तोड़ने से लेकर रस निकालने, क्रिस्टल बनाने और अंत में चीनी पैक करने तक की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है. आइए जानते हैं कि एक चीनी मिल के सेटअप में कितना खर्चा आता है.
चीनी मिल स्थापित करने में कितनी लागत आती है?
निवेश को तय करने वाले सबसे बड़े कारक मिल की टीसीडी क्षमता है. ज्यादा गन्ने की प्रोसेसिंग करने में सक्षम संयंत्र को काफी ज्यादा भूमि, मशीनरी, भंडारण और बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है. लगभग 100 से 500 टीसीडी की क्षमता वाली एक मिनी चीनी मिल या फिर खांडसारी संयंत्र को मशीनरी, भूमि और पूरे सेटअप के आधार पर लगभग 3 करोड़ से 15 करोड़ के निवेश की जरूरत हो सकती है.
लगभग 5000 से 10000 टीसीडी की क्षमता वाली एक बड़ी कमर्शियल चीनी मिल को लगभग 150 करोड़ से 400 करोड़ या ज्यादा की जरूरत हो सकती है. आधुनिक स्वचालित सुविधाओं में उनकी प्रौद्योगिकी और एकीकृत संचालन के आधार पर और भी ज्यादा निवेश शामिल हो सकता है.

इथेनॉल और बिजली उत्पादन से निवेश बढ़ता है
आधुनिक चीनी मिलें सिर्फ चीनी का उत्पादन करने का बजाय एकीकृत संयंत्र के रूप में भी काम कर रही हैं. खोई, रस निकालने के बाद बचा हुआ रेशेदार पदार्थ, भाप और बिजली उत्पन्न करने के लिए बॉयलर में जलाया जा सकता है. इथेनॉल का उत्पादन करने के लिए मिलें गुड और दूसरी चीनी उद्योग उप-उत्पादों को भी संसाधित कर सकती हैं. इन सुविधाओं को जोड़ने से क्षमता और प्रौद्योगिकी के आधार पर परियोजना निवेश लगभग 50 करोड़ से 100 करोड़ तक बढ़ सकता है.

क्या लाइसेंस और भूमि की जरूरत है?
एक चीनी मिल को कई नियामक अनुमोदन और मंजूरी की जरूरत होती है. परियोजना की प्रकृति और जगह के आधार पर जरूरतों में एफएसएसएआई पंजीकरण, फैक्ट्री लाइसेंसिंग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमोदन या सहमति शामिल हो सकती है. भूमि की जरूरत भी क्षमता और लेआउट के मुताबिक अलग-अलग होती है. एक बड़ी सुविधा के लिए 5 से 15 एकड़ या उससे ज्यादा की जरूरत हो सकती है. खासकर जब भारी मशीनरी, गन्ना भंडारण, परिवहन और दूसरे बुनियादी ढांचे के लिए जगह पर विचार किया जाता है.
यह भी पढ़ेंः घर में 100 किलो चीनी खरीदकर रख ली तो क्या सजा मिलेगी? जानें कानून
गन्ने से चीनी कैसे बनती है?
जब गन्ना ट्रैक्टर या फिर ट्रक में कारखाने में आता है तो पहला कदम आने वाले गन्ने का वजन करना होता है. इसके बाद इसे मैकेनिकल या फिर हाइड्रोलिक सिस्टम का इस्तेमाल करके कन्वेयर पर उतार दिया जाता है. प्रोसेसिंग क्षेत्र में भेजने से पहले मिट्टी, पत्तियों और दूसरी गैर जरूरी चीजों को हटाने के लिए गन्ने को साफ किया जाता है.
बड़े घूमने वाले चाकू गन्ने के छोटे टुकड़े करते हैं. किसी के साथ फाइबराइजर जैसे उपकरण गन्ने की संरचना को तोड़ देते हैं. तैयार गन्ना फिर भारी रोलर्स या फिर मिलों से गुजरता है जो चीनी युक्त रस निचोड़ते हैं. पीछे बचे सूखे रेशेदार पदार्थ को खोई कहा जाता है. त्यागने के बजाय इसे आमतौर पर कारखाने के लिए भाप और बिजली बनाने के लिए बॉयलर ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.
ताजे गन्ने के रस में मिट्टी के कण, पौधों की सामग्री और दूसरी अशुद्धियां होती हैं और यह क्रिस्टलीकरण के लिए तैयार नहीं होता. रस को गर्म किया जाता है और चूने जैसे रसायनों के साथ उपचारित किया जाता है. इसमें मिलों के बीच सटीक स्पष्टीकरण प्रक्रिया अलग-अलग होती है. कुछ फैक्ट्रियां सल्फिटेशन आधारित प्रकिया का इस्तेमाल करती हैं. अशुद्धियां एक गंदगी बनाती हैं जिसे साफ रस से अलग किया जा सकता है.
स्पष्टीकरण के बाद भी गन्ने के रस में भारी मात्रा में पानी होता है. इस वजह से स्पष्ट किए गए रस को बहू प्रभाव वाले इवेपरेटर का इस्तेमाल करके केंद्रित किया जाता है. भाप गर्मी देती है जबकि वेक्यूम की स्थिति पानी को कम तापमान पर वाष्पित होने देती है. यह धीरे-धीरे पतले रस को बिना ज्यादा गर्म किया ज्यादा गाढ़ी चाशनी में बदल देता है.
इसके बाद कंसंट्रेटेड सिरप एक वैक्यूम पैन में डाला जाता है. जहां कंट्रोल्ड क्रिस्टलीकरण होता है. छोटे चीनी क्रिस्टल, जिन्हें बीज क्रिस्टल के रूप में जाना जाता है बड़े क्रिस्टल बनाने के लिए घुले हुए सुक्रोज को प्रोत्साहित करने के लिए पेश किए जाते हैं. जैसे-जैसे ज्यादा सुक्रोज बढ़ते क्रिस्टल से जुड़ता है मैसेक्यूइट नाम का एक गाढ़ा मिश्रण बनता है.
मैसेक्यूइट को उच्च गति सेंट्रीफ्यूज मशीनों में बदला भेजा जाता है. सेंट्रीफ्यूज तेजी से घूमता है, चीनी क्रिस्टल को गुड़ नामक गहरे तरल पदार्थ से अलग करता है. भारी तरल टोकरी से होकर गुजरता है और चीनी क्रिस्टल पीछे रह जाते हैं.
अभी-अभी अलग किए गए चीनी के क्रिस्टल में थोड़ी सी नमी होती है और वह गर्म होते हैं. इस वजह से उन्हें कंट्रोल किए गए एयर फ्लो वाले सुखाने वाले सिस्टम से गुजारा जाता है. सूखने के बाद चीनी को क्रिस्टल के साइज और क्वालिटी के हिसाब से छांटा जा सकता है. इसके बाद इसे तोला जाता है और जरूरी साइज के बैग में पैक किया जाता है.
यह भी पढ़ेंः मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में क्या लिखा, कितना सच्चा राहुल गांधी का दावा?





















