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Explained : कोरोना से लड़ने के लिए बन रहीं दवाइयां, इन 6 वैक्सीन पर टिकी है पूरी दुनिया की नज़र!

दुनिया के अधिकांश देशों ने कोरोना से बचने के लिए लॉकडाउन लगाया और अब वो धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. लेकिन पूरी दुनिया की नज़र अब भी इस बात पर है कि कब इस वायरस से बचाव की वैक्सीन बनेगी?

पूरी दुनिया में कोरोना के अब तक दो लाख 60 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. करीब 37 लाख मामले अब तक सामने आ चुके हैं और इनमें से 12 लाख से ज्यादा लोग ठीक होकर अपने घर जा चुके हैं. ये सिर्फ आंकड़ा है. और ये आंकड़ा हर रोज बढ़ता जा रहा है. कोरोना पॉजिटिव का आंकड़ा, कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा, कोरोना से ठीक होने वालों का आंकड़ा. और इसी वजह से पूरी दुनिया की नज़र अब सिर्फ और सिर्फ इस वायरस की वैक्सीन पर टिकी हुई है. कभी इजरायल दावा कर रहा है कि उसने कोरोना की वैक्सीन बना ली है, तो कभी इटली की फर्म कह रही है कि उसने कोरोना की वो वैक्सीन खोज ली है, जो कोरोना वायरस को इंसान के शरीर में घुसने के साथ ही खत्म कर देगी.

लेकिन हकीकत ये है कि अब भी कोई भी देश और दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक पूरे यकीन के साथ नहीं कह पा रहा है कि उसके पास अब कोरोना वायरस की वैक्सीन है. उनके पास सिर्फ और सिर्फ दावे हैं. और ऐसे दावे दुनिया के 100 से ज्यादा रिसर्च इंस्टीट्यूट ने किया है. 10 से ज्यादा रिसर्च इंस्टीट्यूट का दावा है कि उन्होंने अपने वैक्सीन की टेस्टिंग इंसानों पर शुरू कर दी है. उन्हीं दावों के आधार पर हम आपको ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वो कौन-कौन सी वैक्सीन हैं, जिनसे उम्मीद की जा सकती है कि वो कोरोना को रोकने में कामयाब हो पाएंगी.

1. mRNA-1273 ये शुरुआती वैक्सीन है, जिससे उम्मीदें ज्यादा हैं. 16 मार्च को ही जब दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन नहीं लगा था, अमेरिका ने इस वैक्सीन के दूसरे चरण का ट्रायल शुरू कर दिया था. यह अमेरिका की ओर से डेवलप की जा रही पहली वैक्सीन है, जिसे कैंब्रिज की मॉडर्ना थेरेप्टिक्स ने अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज़ के साथ मिलकर बनाया है. कोरोना के असर के महज 42 दिनों के अंदर बनाई गई ये वैक्सीन RNA पर आधारित है. इसमें लैब में बनाए गए कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड के एक छोटे से हिस्से को इंसान में इंजेक्ट किया जाता है. इंसान के शरीर में पहले से कम कर रही रोग प्रतिरोधक क्षमता इसके खिलाफ काम करती है और शरीर कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. ये थ्योरी है और इसी के प्रैक्टिल के लिए अब इसकी टेस्टिंग का फेज दो शुरू किया गया है, जिसमें इंसानों के एक छोटे से समूह पर इस वैक्सीन की टेस्टिंग की जा रही है.

2. Ad5-nCOV वैक्सीन इस वैक्सीन को बनाने की शुरुआत उस चीन ने की है, जहां से कोरोना का वायरस पूरी दुनिया में फैला है. चीन ने भी 16 मार्च को ही इस वैक्सीन की टेस्टिंग शुरू कर दी थी. इसे बनाया है कैंसिनो बॉयोलॉजिक्स ने, जिसमें उसकी मदद की है चीन के इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नॉलजी औऱ चाइनीज एकेडमी ऑफ मिलिट्री मेडिकल साइंसेज ने. इस वैक्सीन के काम करने का तरीका अमेरिकी वैक्सीन mRNA-1273 से अलग है. इस वैक्सीन को वेक्टर की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो कोशिका की उस प्रोटीन को ऐक्टिव कर देता है, जिससे शरीर में एंटीबॉडी बनती हैं. ये वैक्सीन भी अप्रैल के शुरुआती दिनों में ही अपने फेज 2 में पहुंच चुकी है. हालांकि इस वैक्सीन के फेज 2 के रिजल्ट आने में कम से कम छह महीने का वक्त लग सकता है और तब तक लोगों को इसका इंतजार करना ही होगा.

3. INO-4800 वैक्सीन ये वो वैक्सीन है, जिसे बनाने में अप्रत्यक्ष तौर पर भारत का भी योगदान है. अमेरिका की बायोटेक कंपनी इनोवियो फार्मास्यूटिकल्स ने इस वैक्सीन को बनाया है, जिसकी रिसर्च पर कॉलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेर्डनेस इनोवेशन्स ने भी अपनी मुहर लगाई है. कॉलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेर्डनेस इनोवेशन्स की शुरुआत भारत, नार्वे और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने मिलकर की थी. इस वैक्सीन के काम करने का तरीका दूसरी दो वैक्सीन से अलग है. इसमें इंसान की कोशिकाओं में डीएनए इंजेक्ट किया जाएगा. एक बार जब डीएनए इंजेक्ट हो गया तो फिर ये डीएनए कोशिकाओं से एंटीबॉडी बनवाएगा और कोरोना से बचाव हो सकेगा. अमेरिका में इस वैक्सीन के फेज 1 ट्रायल की शुरुआत हो चुकी है. मई-जून 2021 तक फेज 1 के ट्रायल का रिजल्ट आने की संभावना जताई जा रही है.

4.LV-SMENP-DC वैक्सीन दुनिया की अब भी सबसे खतरनाक और लाइलाज बीमारी है एड्स. विज्ञान की भाषा में इसे एचआईवी कहते हैं. इसके लिए भी वायरस ही जिम्मेदार होता है, जिसे कहते हैं लेंटीवायरस. कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन बनाने में जुटे चीन के ही एक और इंस्टीट्यूट शेंज़ेन जीनोइम्यून मेडिकल इंस्टीट्यूट ने इसी लेंटीवायरस की मदद से एक वैक्सीन तैयार की है, जिसका नाम रखा है LV-SMENP-DC वैक्सीन. इसमें लेंटीवायरस से कुछ सहायक कोशिकाएं तैयार की जाती हैं और फिर उन्हें इंसानों के शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, जिससे कि इंसानी शरीर की कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाने लगती हैं. इस एंटीबॉडी की वजह से कोरोना वायरस का असर खत्म हो जाता है.

5.ChAdOx1 वैक्सीन इस वैक्सीन को डेवलप किया है ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टीट्यूट ने. ये इंस्टीट्यूट अपनी वैक्सीन को लेकर इतना आश्वस्त है कि उसने भारत के सीरम इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर सितंबर 2020 तक इसकी 10 लाख डोज एडवांस में बनाने का फैसला किया है. 23 अप्रैल से यूरोपीय देशों में इसका क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो चुका है. ये वैक्सीन एडिनोवायरस की वैक्सीन पर आधारित है. इसे ChAdOx1 वायरस से बनाया गया है, जो चिंपैजी में होने वाली सामान्य सर्दी का वायरस है. लेकिन अब इसमें ऐसा बदलाव किया गया है कि ये इंसान के शरीर में फिर से डेवलप न हो सके. कोरोना वायरस की कोशिका के प्रोटीन में कांटेदार बनावट है, जिससे वो इंसान की कोशिकाओं में दाखिल होता है. इस वैक्सीन से डॉक्टरों को उम्मीद है कि वो शरीर को इस लायक बना देगा कि कोरोना की कोशिका के कांटेदार प्रोटीन को समझकर शरीर प्रतिक्रिया देगा और कोरोना वायरस को इंसान के शरीर में घुसने से रोक देगा.

6. BT162 वैक्सीन ये कोई एक वैक्सीन न होकर वैक्सीन का एक समूह है, जिसे जर्मनी की बायोटेक कंपनी बायो एन टेक और अमेरिका की बायोटेक कंपनी फाइजर साथ मिलकर बना रहे हैं. इसमें चार अलग-अलग तरह के संभावित वैक्सीन को एक साथ मिलाया गया है, जो RNA पर आधारित है. इस वैक्सीन के जरिए डॉक्टर ये चाहते हैं कि इंसान का शरीर खुद से ही कोरोना वायरस की कोशिकाओं में बने नुकीले प्रोटीन की तरह का प्रोटीन बनाने लगे ताकि शरीर के अंदर बाहर ने इस तरह का प्रोटीन दाखिल न हो सके. और जब कोरोना का प्रोटीन दाखिल ही नहीं होगा तो फिर कोरोना का संक्रमण भी नहीं होगा. हालांकि अभी इस वैक्सीन की शुरुआती टेस्टिंग में कम से कम एक साल का वक्त लग सकता है.

इन छह वैक्सीन के अलावा चीन की एक प्राइवेट बायोफा़र्मा कंपनी सिनोवैक पीकोवैक नाम की वैक्सीन पर काम कर रही है. इस कंपनी ने अपने ट्रायल का फेज एक और दो दोनों एक साथ शुरू किया है. इसमें डॉक्टर बेकार हो चुके कोरोना वायरस को इंसान के शरीर के अंदर इंजेक्ट करना चाहते हैं ताकि शरीर खुद को इम्युन करके एंटीबॉडी बना ले. हालांकि एक तथ्य ये भी है कि दुनिया में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों का एक धड़ा अब इस बात को लेकर आश्वस्त नज़र आता है कि दुनिया को कोरोना वायरस की वैक्सीन शायद कभी नहीं मिल पाएगी.

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