ई-रिक्शा और ई-बस का बढ़ता क्रेज, क्या वाकई बच रहे हैं आपके पैसे?
यदि चार्जिंग बिल की कीमत आपके घर के बिजली दर के हिसाब से हिसाब लगाएं तो मात्र 50 से 70 रुपये में यह रिक्शा फुल चार्ज हो जाता है और एक बार चार्ज होने पर 80 से 100 किलोमीटर तक का सफर तय कर लेता है.

जहां पहले सड़कों पर पेट्रोल और डीजल की गाड़ियां गाड़ियों ही चला करती थी. लेकिन अब समय बदल चूका है और अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों का जमाना आ गया है. अब पर्सनल कारें ही नहीं बल्कि कमर्शियल काम के साथ डेली सवारी ढोने के लिए भी EV गाड़ियों का ही यूज़ हो रहा है. जबकि सरकार भी इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की सब्सिडी और छूट दे रही है.
इन सबके बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई इन इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चलने से आपके पैसे बच रहे हैं या फिर शुरुआती बचत के बाद आगे चलकर इसमें ज्यादा खर्च करना पड़ता है. इस खबर में हम आपको बहुत ही आसान भाषा में ई-रिक्शा और ई-बसों के खर्च, कमाई और बचत का पूरा गणित समझाने वाले हैं ताकि आप इसकी असलियत को अच्छी तरह समझ सकें.
ई-रिक्शा की कीमत
अगर आप एक नया ई-रिक्शा बाजार में खरीदने जाते हैं तो यह आपको लगभग 1.20 लाख रुपये से लेकर 1.80 लाख रुपये तक की कीमत में आसानी से मिल जाता है. पेट्रोल या डीजल ऑटो के मुकाबले इसकी शुरुआती कीमत काफी कम होती है. इसके अलावा रोजाना के खर्च की बात करें तो एक ई-रिक्शा को फुल चार्ज करने में लगभग 6 से 8 यूनिट बिजली खर्च होती है.
यदि चार्जिंग बिल की कीमत आपके घर के बिजली दर के हिसाब से हिसाब लगाये तो मात्र 50 से 70 रुपये में यह रिक्शा फुल चार्ज हो जाता है और एक बार चार्ज होने पर 80 से 100 किलोमीटर तक का सफर तय कर लेता है. पेट्रोल ऑटो के मुकाबले रोजाना के ईंधन खर्च में सीधे तौर पर 300 से 400 रुपये तक की भारी बचत होती है.

यह भी पढ़ें: नई Kawasaki Versys 900 में Radar टेक्नोलॉजी, और क्या है नया?
मेंटेनेंस का कितना आता है खर्च?
बात करें अगर ई-रिक्शा के मेंटेनेंस खर्च की तो इसमें पेट्रोल और डीजल गाड़ियों की तरह स्पार्क प्लग, इंजन ऑयल या गियर बॉक्स का रोजाना का मेंटेनेंस लगभग खत्म हो जाता है. लेकिन इसमें सबसे बड़ा खर्च बैटरी का होता है जो हर 2 से 3 साल के बाद बदलनी पड़ जाती है.
एक अच्छी क्वालिटी की बैटरी को बदलने में लगभग 30000 रुपये से 50000 रुपये तक का खर्च आ जाता है. अगर ड्राइवर हर महीने अपनी कमाई से बैटरी के लिए थोड़ा-थोड़ा पैसा अलग बचाता रहे तो यह खर्च भारी नहीं पड़ता है. इसके अलावा टायर और ब्रेक पैड का साधारण रखरखाव ही इसमें करना पड़ता है जिससे कुल मिलाकर सर्विसिंग का खर्च बहुत कम हो जाता है.

ई-बसों में कितनी है बचत?
आपको बता दें कि शहरों के भीतर सफर करने वाले आम यात्रियों के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही ई-बसों ने ट्रांसपोर्ट को पूरी तरह से बदल दिया है. आम डीजल बसों के मुकाबले ई-बसों को चलाना काफी सस्ता साबित हो रहा है. क्योंकि इसमें प्रति किलोमीटर का फ्यूल खर्च बहुत कम आता है. डीजल बसों में जहां प्रति किलोमीटर का खर्च बहुत ज्यादा बैठता है.
वहीं इलेक्ट्रिक बसें कम लागत में लंबा सफर तय कर लेती हैं. इसके अलावा इन बसों मेंटेनेंस का खर्च भी डीजल इंजन की तुलना में लगभग आधा रह जाता है. सरकार और बस ऑपरेटर्स का मानना है कि लंबे समय तक इन गाड़ियों को चलाने से प्रदूषण घटने के साथ-साथ सरकारी खजाने और ट्रांसपोर्ट कंपनियों के भारी पैसे बच रहे हैं. यात्रियों को भी कई शहरों में किफायती और आरामदायक सफर का लाभ मिल रहा है.
क्या सचमुच हो रही है बचत?
अब कुल मिलाकर देखें तो ई-रिक्शा और ई-बसें सच में आपके और देश के पैसे बचाने में पूरी तरह कारगर साबित हो रही हैं. अगर आप कम दूरी की सवारी ढोना चाहते हैं या रोजाना का कमर्शियल काम करते हैं तो पेट्रोल-डीजल ऑटो के मुकाबले ई-रिक्शा से आपकी महीने की बचत 8000 से 12000 रुपये तक हो सकती है.
हालांकि यह बचत तभी पूरी तरह सफल मानी जाएगी जब आप गाड़ी की नियमित देखभाल करें और बैटरी के खर्च के लिए पहले से प्लानिंग करके चलें. अगर सही तरीके से हिसाब लगाया जाए और लोकल चार्जिंग की सुविधा का सही इस्तेमाल किया जाए तो इलेक्ट्रिक वाहन आपके बजट को सुधारने में बहुत बड़ा मददगार साबित हो सकते हैं.
यह भी पढ़ें: Off-Roading के लिए चाहिए दमदार मशीन? इन 5 ATVs पर डालें नजर






















