स्मार्टफोन बैटरी की अगली पीढ़ी है Silicon-Carbon? जानें Lithium-Ion से कितना अलग
स्मार्टफोन में अब 10,000mAh तक की बैटरी देखने को मिल रही है. इसके पीछे Silicon-Carbon टेक्नोलॉजी की जरूरी मानी जाती है. जानें यह Lithium-Ion बैटरी से कितनी अलग है और इसके क्या फायदे हैं.

- सिलिकॉन के फैलाव से बैटरी क्षमता घटने की चुनौती है.
फोन में फीचर्स जितने बढ़ रहे हैं, उतनी ही जरूरत ऐसी बैटरी की महसूस हो रही है, जो कम जगह में ज्यादा पावर स्टोर कर सके और जल्दी चार्ज भी हो जाए. इसी जरूरत को पूरा करने के लिए स्मार्टफोन कंपनियां Silicon-Carbon बैटरी टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं. इस तकनीक की मदद से अब फोन में 8,000mAh और 10,000mAh तक की बैटरी क्षमता देना संभव हो रहा है, हालांकि Silicon-Carbon बैटरी को Lithium-Ion से पूरी तरह अलग तकनीक समझना सही नहीं है. यह पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरी का ही नया रूप है. इसमें बैटरी के अंदर इस्तेमाल होने वाली एक जरूरी चीज को बदल दिया जाता है. तो आइए जानते हैं कि दोनों टेक्नोलॉजी में क्या अंतर है और Silicon-Carbon बैटरी स्मार्टफोन के लिए क्यों चर्चा में है.
स्मार्टफोन बैटरी की अगली पीढ़ी है Silicon-Carbon?
पारंपरिक Lithium-Ion बैटरी में आमतौर पर ग्रेफाइट का इस्तेमाल एनोड के रूप में होता है. वहीं Silicon-Carbon बैटरी में सिलिकॉन और कार्बन को मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है. सिलिकॉन ज्यादा लिथियम आयन स्टोर कर सकता है, जबकि कार्बन बैटरी का स्ट्रक्चर और बिजली के प्रवाह को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है. इससे कम जगह में ज्यादा एनर्जी स्टोर करने की संभावना बढ़ जाती है.
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Lithium-Ion से कितनी अलग है यह टेक्नोलॉजी?
यह दोनों बैटरियां लिथियम-आयन तकनीक पर आधारित हैं. इनमें मेन अंतर एनोड में इस्तेमाल होने वाले सामान का है. पारंपरिक बैटरी में ग्रेफाइट की क्षमता सीमित होती है, जबकि सिलिकॉन ज्यादा एनर्जी स्टोर कर सकता है. इसी वजह से कंपनियां छोटे साइज में बड़ी बैटरी देने की कोशिश कर रही हैं. यह तकनीक खासतौर पर पतले स्मार्टफोन और फोल्डेबल फोन के लिए यूजफुल हो सकती है.
ज्यादा बैटरी और फास्ट चार्जिंग का फायदा
Silicon-Carbon टेक्नोलॉजी से फोन में ज्यादा क्षमता वाली बैटरी फिट करने में मदद मिल सकती है. वहीं इस तकनीक का इस्तेमाल बड़े बैटरी पैक के साथ फास्ट चार्जिंग को बेहतर बनाने के लिए भी किया जा रहा है, हालांकि फोन कितनी देर चलेगा, यह उसके प्रोसेसर, डिस्प्ले, नेटवर्क और इस्तेमाल पर भी निर्भर करता है. इस टेक्नोलॉजी की एक बड़ी चुनौती सिलिकॉन का फैलना और सिकुड़ना है. चार्जिंग और डिस्चार्जिंग के दौरान ऐसा होने से समय के साथ बैटरी की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
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