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पूर्वांचल में ऐसे बदली बीजेपी की किस्‍मत, एक शख्स ने बदल दिए सियासी समीकरण

मंदिर आंदोलन की वजह से बीजेपी की किस्मत बदल गई। चुनावों में पहली बार बीजेपी 120 सीटों के साथ लोकसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में सामने आई थी। गोरक्षपीठ के सहारे गोरखपुर संसदीय सीट पर बीजेपी का जो दबदबा बना वह तब तक जारी रहा, जब तक बीते वर्ष उपचुनाव में सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद जीत नहीं गए।

गोरखपुर, एबीपी गंगा। पूर्वांचल में बीजेपी का ग्राफ लगातार आगे बढ़ा है। आखिर वो कौन से कारण थे जिसकी वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को संजीवनी मिली। तो चलिए यही जानने के लिए फ्लैश बैक में चलते हैं और बात करते है 1991 के उस दौर की, जब एक तरफ मंडल कमीशन को लेकर विरोध की प्रचंड बयार बह रही थी तो दूसरी ओर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन चरम पर था।

बीजेपी का दांव

यहां आपको यह बताना बेहद जरूरी है कि मंदिर निर्माण की अगुवाई तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्य नाथ कर रहे थो जो उन दिनों हिंदू महासभा से गोरखपुर के सांसद भी थे। इसी क्रम में बीजेपी राम मंदिर को लेकर खुलकर समर्थन में आ गई थी, लिहाजा उसने महंत अवेद्यनाथ को अपना प्रत्याशी बनाने का फैसला लिया।

बीजेपी के गढ़ में ऐसे लगी सेंध

राम मंदिर को लेकर मंशा स्पष्ट थी, लिहाजा महंत अवेद्यनाथ ने भी प्रस्ताव को स्वीकार किया और बीजेपी के टिकट पर जीत भी हासिल की। इसी चुनाव के बाद से पीठ के सहारे गोरखपुर संसदीय सीट पर बीजेपी का कब्जा बना जो 2018 में सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद के जीतने तक जारी रहा।

संतों का आग्रह किया स्वीकार

1991 में जो परिस्थितियां थीं यदि उनकी बात करें तो उन दिनों महंत अवेद्यनाथ रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष थे। इतना ही नहीं अवेद्य नाथ नौ साल के संन्यास के बाद आंदोलन की अगुवाई के क्रम में ही संतों के आग्रह पर सक्रिय राजनीति में वापस लौटे थे।

सामाजिक समरसता के लिए भी किया कार्य

महंत अवेद्यनाथ ने समाज के सभी वर्गों के लिए कार्य किए। संन्यास के दौरान उन्होंने सामाजिक समरसता के लिए देश के तमाम हिस्सों का दौरा किया। इसी क्रम में उन्होंने हर वर्ग के दिल में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। इसी का फायदा उनको चुनाव में भी मिला था।

मंदिर आंदोलन ने बदली सूरत

मंदिर आंदोलन की वजह से बीजेपी की किस्मत बदल गई। चुनावों में पहली बार बीजेपी 120 सीटों के साथ लोकसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में सामने आई थी। गोरक्षपीठ के सहारे गोरखपुर संसदीय सीट पर बीजेपी का जो दबदबा बना वह तब तक जारी रहा, जब तक बीते वर्ष उपचुनाव में सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद जीत नहीं गए। 2018 में हुए उपचुनाव से पहले तक योगी आदित्यनाथ ने भी गोरखपुर संसदीय सीट पर अपना वर्चस्व कायम रखा। लेकिन उपचुनाव में बीजेपी को मिली हार का नतीजा गठबंधन के रूप में यूपी की जनता के सामने है और अब चुनौती बड़ी भी है।

गोरक्षपीठ

गोरखपुर संसदीय सीट बीजेपी के लिए बड़ी तो है लेकिन इसके पीछे गोरक्षपीठ का महत्व सबसे अधिक है। 1991 में महंत अवेद्यनाथ के सहारे पार्टी को पहली बार यह सीट मिली और उसके बाद उन्होंने ही यह सिलसिला 1996 तक जारी रखा। 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में बीजेपी को विजयश्री दिलाने की जिम्मेदारी योगी आदित्यनाथ संभालते रहे। अब वक्त 2019 के लोकसभा चुनाव का है और गठबंधन ने यहां के समीकरण बदल दिए हैं।

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