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अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी वाले NDA में क्या है अंतर? खिंच गया गठबंधन का नया खाका

NDA Alliance New Graph: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में पिछले कुछ सालों से हुए बदलाव के बाद इसे दो युगों में बांटा जाने लगा. एक अटल-आडवाणी और दूसरा मोदी-शाह का युग.

NDA Alliance: देश की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) किसी समय अपनी पहचान बताने के लिए जद्दोजहद करती नजर आती थी. बीजेपी की जब भी बात होती है तो इसे दो युगों में बांटकर देखा जाने लगा है. एक अटल-आडवाणी और दूसरा मोदी-शाह का युग. अटल-आडवाणी युग में पार्टी ने पैर जमाने शुरू किए और गठबंधन की राजनीति की. हालांकि ये राजनीति मोदी-शाह के युग में भी हो रही है लेकिन इसके पीछे कोई मजबूरी नहीं है.

ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि साल 2014 से देश की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया. कई सालों बाद देश की जनता ने एक पार्टी को पूरा जनादेश दिया और इसी वजह से बीजेपी की ताकत बढ़ती चली गई. इसी क्रम में एनडीए गठबंधन में शामिल दलों की ताकत कम होती गई. हाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो तमिलनाडु में एआईएडीएमके ने बीजेपी को झटका तो जरूर दिया लेकिन इसके पीछे भी बीजेपी की ही रणनीति बताई जा रही है.

एनडीए में बीजेपी की ताकत

दक्षिण भारत में एक तरफ तमिलनाडु में एआईएडीएमके ने एनडीए से बाहर आने का विकल्प चुना तो वहीं कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) जेडीएस एनडीए की सहयोगी बन गई. साल 2019 में महाराष्ट्र में शिवसेना ने एनडीए का साथ तो छोड़ दिया लेकिन ये पार्टी दो धड़ों में बंट गई. एक उद्धव ठाकरे की सेना बनी तो दूसरी एकनाथ शिंदे की. एकनाथ शिंदे ने एनडीए में रहने का रास्ता चुना और 56 में से 39 विधायक लाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने हुए हैं.

इसके अलावा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जो कभी एनडीए का हिस्सा नहीं रही, वो इस साल बंट गई और अजित पवार का गुट एनडीए में शामिल हो गया और सत्ता सुख भोग रहा है.

‘छोटी पार्टियों को सता रहा है डर’

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा भी है कि उन इलाकों में जहां पर बीजेपी शक्तिशाली हो गई है वहां पर कुछ सहयोगियों को खतरा महसूस हो रहा है. इनको इस बात का डर है कि बीजेपी उनकी जगह खा रही है और अधिक से अधिक वोट भी पा रही है. बीजेपी के अंदरूनी सूत्र ने उदाहरण देते हुए कहा, “अब उद्धव ठाकरे को ही देख लो. चूंकि महाराष्ट्र में लोगों ने बीजेपी को अपनी पसंद बना लिया था और इसी वजह से उन्होंने अपनी पार्टी की विचारधारा बदल ली और वजूद बचाने के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लिया लेकिन वो पार्टी को एकजुट नहीं रख सके औऱ विधायकों का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास आ गया.”

क्षेत्रीय दलों का समान सहयोगी होना बीते जमाने की बात

पूरे देश के स्तर पर देखा जाए तो चाहे वो उत्तर हो, पश्चिम हो या फिर मध्य भारत इन सभी इलाकों में क्षेत्रीय दलों का समान सहयोगी होना अब अतीत की बात हो गई है. फिर चाहे महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) को पकड़ लें या फिर बिहार में जेडीयू को. बीजेपी इन सभी से बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. इन राज्यों में बीजेपी का वजूद बनने के बाद पूर्व सहयोगियों के साथ तनाव कि स्थिति देखी ही जा रही है.

महाराष्ट्र में बीजेपी ने जिन 164 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ा था उनें से 105 सीटें जीतीं. वहीं, शिवसेना को 124 में से सिर्फ 56 सीटें मिल पाईं. ऐसे ही बिहार में बीजेपी और जेडीयू ने गठबंधन में चुनाव लड़ा जिसमें बीजेपी ने 110 औऱ जेडीयू 111 सीटों पर लड़ी लेकिन बीजेपी ने 74 तो जेडीयू ने सिर्फ 43 सीटें जीतीं.

बीजेपी का छोटे दलों के साथ असमान गठबंधन

बीजेपी के गढ़ कहे जाने वाले इलाकों में पार्टी ने छोटी पार्टियों से गठबंधन किया जो सिर्फ जातिगत समीकरण को पूरा करता है. उदाहरण के तौर पर देखें तो यूपी में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, संजय निषाद की निषाद पार्टी, और उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (सोनेलाल). बिहार में जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और उनके चाचा पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी. महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले). हरियाणा में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी और गोपाल कांडा की हरियाणा जनहित पार्टी भी एनडीए के साथ हैं.

राजनीतिक पंडितों का भी यही कहना है कि अटल-आडवाणी युग में बीजेपी अपने से छोटे सहयोगियों के रूप में क्षेत्रीय दलों को अपने से ऊपर दर्जा देने के लिए तैयार रहती थी. वहीं, मोदी-शाह के युग में पार्टी अब अपने से छोटे दलों के सामने छोटा बनने के लिए तैयार नहीं है.

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